आरोग्य-प्रकाश
पुस्तक के बारे में
आरोग्य-प्रकाशयकृतपीड़ा-जिगर (लीवर) की बीमारी

यकृत्-पीड़ा -- जिगर (लीवर) की बीमारी

8 मिनट का पाठ

प्राचीन ग्रन्थों में यकृत् रोग के विषय में अत्यन्त सूक्ष्म विवरण है। लिखा है कि प्लीहा के जैसे इस रोग के लक्षण और चिकित्सा समझनी चाहिए। वर्तमान समय में शहर और कस्बों के निवासी यकृत् रोग से बहुत पीड़ित रहते हैं। बहुत कम लोगों का यकृत् जैसा कार्य करना चाहिए वैसा करता है। अधिकतर लोगों का यकृत् पूर्ण कार्य करने की क्षमता नहीं रखता। प्राचीन समय में लोग देहातों में परिश्रमी जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें शुद्ध आहार, शुद्ध जल और शुद्ध हवा वहाँ मिलती थी। परन्तु इस वाणिज्य युग में न तो शुद्ध जल है, न शुद्ध आहार और न शुद्ध वायु ही। अनुमान है कि प्राचीन समय में यह रोग बहुत कम होता था, यही कारण है कि इसका विवरण अत्यन्त अल्प है। जिस प्रकार शरीर के बाएँ भाग की पसलियों के नीचे तिल्ली होती है, उसी तरह दाहिने भाग की पसलियों के नीचे यकृत् या जिगर है। मनुष्य शरीर में यकृत् जैसा बड़ा और उपयोगी यन्त्र दूसरा नहीं है। यकृत् रोग शुरू होते ही कम्प देकर बुखार आता है। बाद में बुखार तो शान्त हो जाता है, परन्तु यकृत् की बीमारी बनी रहती है। रोग जब धीरे-धीरे पुराना आकार धारण कर लेता है, उस समय यकृत् कठोर और पहले से बड़ा हो जाता है, परन्तु तिल्ली की तरह यह बहुत बड़ा नहीं होता, मामूली बड़ा होता है। यकृत् के स्थान को दबाने से दर्द करता है। परिश्रम करने से यकृत में वेदना होती है। अपने-आप भी बिना परिश्रम के दर्द होता रहता है। साथ-साथ मन्द-मन्द ज्वर या ज्वर जैसी मामूली गर्मी बनी रहती है। सिर-दर्द, सफेद मैल से ढकी हुई जीभ, दुर्बलता, रक्त की कमी, मन्दाग्नि, दाहिने स्कन्ध में वेदना, कीचड़ जैसी टट्टी, आँवयुक्त मल, मुँह का स्वाद खराब आदि लक्षण प्रकट होते हैं। कब्जियत रहना और पेट में वायु का जमा होना इस रोग के खास लक्षण हैं। रोग जब बढ़ता है तो भयानक आकार धारण कर लेता है और अन्त में यकृत का संकोचन होकर रोगी की मृत्यु हो जाती है। अमेबिक प्रवाहिका पुराना होने पर अमीबा रोगाणु यकृत् में पहुँच जाने से, पुराना मलेरिया बुखार, कुनैन या पारे का अपव्यवहार, अधिक मद्यपान, गर्म स्थान का निवास, अधिक मिठाई या मलाई, रबड़ी, भैंस का गाढ़ा दूध आदि का अधिक खाना आदि कारणों से यकृत रोग की उत्पत्ति होती है। आजकल शहरों में विशुद्ध खाद्य पदार्थों का मिलना मुश्किल हो गया है। अशुद्ध खान-पान और अनियमित जीवन ही इस रोग की उत्पत्ति का प्रधान कारण है। दो-तीन वर्ष से लेकर पाँच-सात वर्ष की अवस्था के भीतर बहुत-से बच्चों का यकृत् खराब हो जाता है, जिससे बच्चे पुष्ट नहीं हो पाते। बराबर रोगी बने रहते हैं। शरीर में खून कम हो जाता है। आँखें व चेहरा सफेद और रक्तहीन दिखाई देता है। यह याद रखने की बात है कि बच्चों का बड़ा यकृत् भी ठीक चिकित्सा से अच्छा हो जाता है। परन्तु बड़ी उम्रवालों को हो जाने से कठिनाई और सुचिकित्सा से अच्छा होता है।

चिकित्सा

पहले कहा गया है कि यकृत् से पित्त निकलकर भोजन के पाक में सहायता करता रहता है। परन्तु यकृत् की शक्ति कम होने से भोजन का पाक अच्छी तरह नहीं होता। इसलिए यकृत् रोग में मन्दाग्नि का खान-पान और मन्दाग्नि की दवा से अच्छा फायदा होता है। यकृत रोगी के मल की परीक्षा कराके निश्चय करना चाहिए कि उसके मल में आँव तो नहीं आता है? यदि आँव हो तो धान्यपंचक क्वाथ को पकाकर ११.६६ ग्राम की मात्रा में निरन्तर सेवन करना चाहिए। साथ ही आँव-दस्त प्रकरणोक्त आहार-विहार भी करना चाहिए।

यकृत् रोग में नीचे लिखी दवाएँ लाभदायी हैं:--

(१) पाण्डु रोग में लिखित 'वर्धमान पिप्पली' इस रोग में बहुत लाभ करती है।

(२) जवाखार ३ ग्राम जल या मट्ठे के साथ खाना अति लाभदायक है।

(३) कबर ४ भाग, कासनी बीज ४ भाग, मकोय २ भाग, कासमर्द १ भाग, अर्जुन की छाल २ भाग, बिरंजासिफ १ भाग, झाऊ क्षार १ भाग और मण्डूर भस्म २ भाग लेकर कूट कपड़छान कर घृतकुमारी के स्वरस तथा मूली पत्र रस में ३ दिन घोंट २५० मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। २ गोली दिन-रात में ३ बार तक दें। यह यकृत् की समस्त बीमारियों को दूर करती है। यकृत् शोथ, यकृद्दाल्युदर (सिरोसिस), अंग्रेजी दवाओं के विष से पीड़ित यकृत ठीक हो जाता है तथा शरीर भार में वृद्धि होकर अमित स्वास्थ्य लाभ होता है।

(४) पुराने यकृत् रोग में पेट में वायु बहुत संचित होती है। जब तक वह गुदा के मार्ग से निकल नहीं जाती तब तक बेचैनी बनी रहती है। अगर वह डकारों के रूप में ऊपर को होती है, तो और भी खराब है। इसके लिये चित्रकमूल की छाल ३ ग्राम और सोंठ ३ ग्राम १२ घण्टे तक नीबू के रस में भिगोकर चटनी की तरह पीसकर कल्क करके सेवन करना अति लाभदायक है।

(५) यकृदरि लौह -- लोह भस्म ४६.४ ग्राम, अभ्रक भस्म २३.२ ग्राम, ताम्र भस्म ११.६६ ग्राम, जम्बीरी नीबू की जड़ की छाल ४६.४ ग्राम और अन्तर्धूम से भस्म किया हुआ कृष्णसार मृग का चर्म भस्म ४६.४ ग्राम—इन सबको एकत्रित करके जल के साथ २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह पीपल और मधु के साथ सेवन करने से यकृत् रोग में अत्यन्त लाभदायक है।

-- भै० र०

(६) आरोग्यवर्द्धिनी वटी -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोह भस्म, अभ्रक भस्म और ताम्र भस्म—ये सब प्रत्येक ११.६६ ग्राम, त्रिफला ७० ग्राम, शिलाजीत ३५ ग्राम, शुद्ध गुग्गुलु ४६.४ ग्राम, चित्रकमूल ४६.४ ग्राम, कुटकी १५६.४ ग्राम—सब काष्ठ दवाओं के महीन चूर्ण को खरल में डाल दें तथा उसमें पारा-गन्धक की कज्जली को मिलाकर दो दिन तक नीम के पत्तों के स्वरस में अच्छी तरह घोंटकर बेर के बराबर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह गुटिका यकृत् रोग में बहुत लाभ करती है। शास्त्र में कुष्ठ रोग में यह गुटिका लिखी है, लेकिन सभी वैद्य यकृत की विकृति में इसको देते हैं और पूर्ण लाभ उठाते हैं।

-- र० र० सं०

(७) क्षारागद -- देवदारु, निशोथ, दन्ती, कुटकी, पीपल, पीपलामूल, चव्य, सोंठ, सज्जीक्षार, यवक्षार, बड़ी हरड़, पाठा, जीरा, कूठ, नाई (नाकुली)—ये सब औषधियाँ २३.२ ग्राम, सेंधा नमक, काला नमक, विड् नमक, समुद्र नमक प्रत्येक ४६.४ ग्राम—इन सबको कूट कर घृत, तेल और दही में मिलाएँ। घृत, तेल और दही उतने ही परिमाण में लेना चाहिए, जिससे चूर्ण गीला हो जाय। फिर एक हाँड़ी में भरकर ढक्कन लगाएँ और कपड़मिट्टी कर दें। चूल्हे पर चढ़ाकर इसमें तब तक आँच लगाते रहें, जब तक कि हाँड़ी नीचे से लाल वर्ण की दिखने लग जाय। इसके बाद आँच बन्द कर दें और शीतल होने पर हाँड़ी के भीतर से क्षार निकाल लें। इसकी मात्रा १ ग्राम से ३ ग्राम तक है। यकृत वाले रोगी को तक्र के साथ खिलाने से आराम होता है। अवस्थानुसार गोमूत्र तथा आसवारिष्टादि के साथ भी इसे दे सकते हैं। यह क्षार गुल्म, अपस्मार, उन्माद, उदर रोग और अश्मरी आदि में भी अच्छा लाभ पहुँचाता है। परीक्षित है।

(८) वज्रक्षार -- काँच नमक, जवाखार, समुद्र नमक, संचल नमक, सेंधानमक, सुहागा और सज्जीखार—ये ७ चीजें सम भाग लेकर मदार (आक) और सेहुँड (स्नूही) के दूध की ३ भावना देकर इन्हें सुखा लें। हाँड़ी में नीचे मदार के पत्ते रखकर दवा को रखें और उस पर फिर मदार के पत्ते रखकर मुँह बन्द कर दें और ९.३३ किलो गोयठों (उपलों) में रखकर फूंक दें। सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, जीरा, हल्दी, चित्रक—इन ९ चीजों का सम भाग लेकर चूर्ण करें। जितना वजन उस फूँके हुए ऊपर वाले नमक का हो, उसका आधा इन चीजों का चूर्ण मिला दें। इसमें ६ ग्राम की मात्रा में पानी या गोमूत्र के साथ देने से यकृत्, प्लीहा, वायुगोला आदि अच्छे होते हैं।

-- र० सा० सं०

(९) कुमार्यासव -- सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, लौंग, दालचीनी, तेजपत्ता, बड़ी इलायची के बीज, नागकेशर, चित्रकमूल की छाल, पीपलामूल, वायविडंग, गजपीपल, चव्य, हाऊबेर, धनियाँ, सुपारी, कुटकी, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आँवला, रास्ना, देवदारु, हल्दी, दारूहल्दी, मूर्वामूल, मुनक्का, मुलेठी, दन्ती, पोहकरमूल, बला, नागबला, कौंच के बीज, गोखरू, सौंफ, हिंगुपुत्री, अकरकरा, उटंगन के बीज, पुनर्नवा सफेद, पुनर्नवा लाल, सोनामक्खी—इन सब दवाओं में से प्रत्येक २३.२ ग्राम और धाय के फूल १५६.४८ ग्राम—इनका एकत्रित चूर्ण करें। फिर घीकुमारी का रस ११.६६ किलो, गुड़ ४.६७ किलो, शुद्ध लोहे का चूर्ण २.३३ किलो और शहद २.३३ किलो—सबको एक घड़े में डालकर मुँह बन्द करके जमीन में या धान के ढेर में रख दें। एक महीना बाद छानकर रोगी को दें। इसकी मात्रा २३.२ से ५८.३२ ग्राम तक की है। इससे सब तरह के उदर रोग नष्ट होते हैं। यह यकृत और प्लीहा में विशेष फायदा करता है। यह शोथशामक एवं बल तथा रक्तवर्द्धक है। परीक्षित है।

-- शा० सं०

पथ्यापथ्य

मुझे ५-६ वर्ष तक यकृत् रोग रह चुका है। एलोपैथिक, होमियोपैथिक, हकीमी, आयुर्वेदीय आदि दवाएँ खाते-खाते नाक में दम हो गया था। दवाई सेवन से लाभ होता था; परन्तु महीने-दो महीने बाद फिर वही हालत हो जाती थी। स्वास्थ्यप्रद स्थान में रहने से स्वास्थ्य अच्छा रहता था परन्तु कलकत्ते आते ही फिर वही हालत हो जाती थी। इस प्रकार बहुत कष्ट उठाने एवं खर्च करने के बाद प्रकृति की शरण ली। प्रातःकालीन चार-पाँच मील का भ्रमण, अल्प वेग से धावन आदि व्यायाम तथा खान-पान के नियमों में परिवर्तन किया। आरोग्यदायक सभी नियम दृढ़ता के साथ पालन किये। फलस्वरूप आज मेरी तन्दुरुस्ती बहुत अच्छी है। यकृत् के रोगी को जहाँ तक हो सके घी और चीनी बहुत कम खाना चाहिए। बाजार की मिठाई से तो एकदम परहेज रखना जरूरी है। मन्दाग्नि के रोगी की तरह आहार-विहार रखना चाहिए।