आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशप्लीहा (तिल्ली बढ़ना)

प्लीहा (तिल्ली बढ़ना)

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तिल्ली बाएँ भाग की पसलियों के नीचे होती है। जब यह बढ़ती है तब बहुत बड़ी हो जाती है और पेट में पत्थर रक्खा हुआ है ऐसा मालूम होता है। प्रारम्भ में ज्वरभाव, शरीर रक्तशून्य और पाण्डुवर्ण, बदहजमी, कब्जियत, मुँह के मसूढ़ों का फूलना और उनसे रक्तस्राव होना आदि लक्षण देखे जाते हैं। अन्त में आँव, खून के दस्त, सारे शरीर में शोथ और जलोदर होकर रोगी की मृत्यु हो जाती है। तिल्ली बढ़ने का कारण अधिकतर मलेरिया बुखार होता है। मलेरिया बुखार में जब रोगी को ठण्ड लगती है तब उस समय रक्तकण टूटते हैं। उनको दुरुस्त करने में जो श्रम प्लीहा को करना होता है उससे उसका आकार बड़ा हो जाता है। कालाजार, बवासीर में रक्त का बन्द होना, मासिकधर्म का रुकना आदि कारणों से भी तिल्ली बढ़ जाती है। आजकल ल्यूकीमिया (रक्त का कैंसर) प्लीहावृद्धि का प्रमुख कारण है।

चिकित्सा

यदि मलेरिया बुखार वर्तमान हो और उसके कारण तिल्ली बढ़ गई हो तो मलेरिया की दवा करें। जब तक मलेरिया नहीं जाएगा तब तक तिल्ली अच्छी नहीं होगी।

(१) जवाखार ३ ग्राम गोमूत्र के साथ लेने से तिल्ली में लाभ होता है।

(२) ५८.३२ ग्राम नीबू के रस में शंख का चूर्ण ३ ग्राम डालकर पीने से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती है। यह मात्रा यदि अधिक मालूम हो तो कम लेनी चाहिए।

(३) अजवायन, चित्रकमूल की छाल, जवाखार, वच और दन्ती—इनका चूर्ण ३ से ६ ग्राम तक दही के पानी के साथ सेवन करने से प्लीहा छोटी हो जाती है।

(४) मदार (आक) के पत्तों को बराबर नमक के साथ हाँड़ियों में भर दें और गोयठों (उपलों) में रखकर फूंक लें। इसका चूर्ण ३ ग्राम जल के साथ खाने से तिल्ली आराम होगी।

(५) काँच या मिट्टी के पात्र में ९३३ ग्राम नीबू के रस में सुहागे का लावा ११६.६४ ग्राम और ४० कौड़ी डालकर मुँह बन्द करके जमीन में गाड़ दें, १५-२० दिन तक उसी तरह रहने दें। फिर उसे मथकर छान लें। इसमें से ५.८३ से ११.६६ ग्राम तक देने से तिल्ली में लाभ होता है।

(६) रोहितक (रुहेड़ा) वृक्ष की छाल का काढ़ा जवाखार मिलाकर पीने से तिल्ली में बहुत फायदा होता है।

(७) प्लीहारि वटी -- एलुआ (मुसब्बर), अभ्रक भस्म, कसीस, लहसुन—सबको सम भाग लेकर तीन पहर द्रोणपुष्पी (गूमा) के रस में घोंटकर ७२९ मि.ग्रा. के प्रमाण की वटी बना लें। इसका प्रातः-सायंकाल जल के साथ सेवन करने से प्लीहा, यकृत, गुल्म, अग्निमांद्य आदि रोग आराम होते हैं।

(८) बृहत् लोकनाथ रस -- शुद्ध पारा ११.६६ ग्राम, शुद्ध गन्धक २३.२ ग्राम और अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम—इनको घीकुआर के रस में खरल करें। फिर ताम्र भस्म २३.२ ग्राम, लोह भस्म २३.२ ग्राम और कौड़ी की भस्म १०५ ग्राम मिलाकर काकमाची (मकोय) के रस में घोंटकर एक गोला बना लें और इस गोले को शराव-सम्पुट में रखकर गजपुट में फूंक दें। इसमें से २४३ मि.ग्रा. की मात्रा शहद में चाटने से प्लीहा, यकृत और अग्निमांद्य रोग आराम होते हैं।

(९) शंखद्राव -- नौसादर, कलमीसोरा, फिटकिरी और यवक्षार सबका बराबर भाग लेकर रिटोर्ट या नलिकायन्त्र से अर्क निकालें। यह गुल्म, आफरा, शूल, यकृत दोष, प्लीहा, अश्मरी (पथरी) आदि को नष्ट करने में अत्यन्त लाभदायक है। ५ से १० बूँद तक चीनी या २९ से ५८ ग्राम तक जल में मिलाकर दिन में दो बार इसे पिलाना चाहिए। यह दवा दाँत में नहीं लगने पावे क्योंकि यह एक प्रकार का तेजाब है। दाँतों में लगने से दाँत गिर जाएँगे। अतः जल में मिलाकर पीने से इसका भय नहीं रहता।

(१०) लोहासव -- लोहे का बुरादा, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, अजवायन, वायविडंग, नागरमोथा, चित्रकमूल—इन ११ दवाओं में से प्रत्येक २३३ ग्राम, धाय का फूल १.१६ किलो, शहद ३.७३ किलो, गुड़ ५.८३ किलो, जल ३० किलो—इन सबको एक मिट्टी के घड़े में भरकर एक महीना रखें, फिर छानकर बोतल में भर लें। मात्रा—१४.६३ से २९ ग्राम तक भोजन के बाद बराबर जल मिलाकर पिएँ। यह अग्नि को दीपन करने और खून को बढ़ाने वाला है तथा तिल्ली, यकृत, पाण्डु, शोथ, गुल्म आदि रोगों को नष्ट करता है।

मलेरिया, आँव, कालाजार, मन्दाग्नि, पाण्डुरोग आदि के बाद शरीर का खून कम हो जाता है। उस हालत में यह बड़ा फायदा करता है।

-- भै० र०

पुनर्नवाष्टक क्वाथ

पुनर्नवा की जड़, हरड़, नीम की अन्तर्छाल , दारूहल्दी, कुटकी, पटोलपंचांग, गिलोय और शुण्ठी बराबर-बराबर लेकर जौकुट कर रख लें। इसमें से ११.६६ ग्राम लेकर १८६·५६ ग्राम पानी में पकावें, ४६.४ ग्राम शेष रहने पर कपड़े से छान लें उसमें १२ या २३ ग्राम गोमूत्र मिला कर पिलावें। ऐसी २-३ मात्रा दिन में दें। यह क्वाथ यकृत और प्लीहा की वृद्धि में, शोथ (सूजन) में, उदर रोग और सन्निपात में प्रयोग किया जाता है। सर्वांगशोथ या जनरल ऐनासार्का में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।

आचार्य यादवजी अपने सुप्रसिद्ध सिद्धयोगसंग्रह (बैद्यनाथ प्रकाशन) में पुनर्नवा की जड़ और कुटकी को २-२ भाग लेने और रोहीतक वृक्ष की अन्तर्छाल शरपुंखा की जड़ तथा अफसन्तीन १-१ भाग और मिलाने के लिए लिखते हैं तथा इसका नाम पुनर्नवादि क्वाथ देते हैं। उनका कथन है कि इस क्वाथ को पुनर्नवादिमण्डूर या आरोग्यवर्धिनी के अनुपान के रूप में देना चाहिए।

सन्धिवात और आमवात में वे इसमें चोपचीनी, विधारा, उशबा, सुरंजान तलख, अण्डी की जड़, सोनापाठा की छाल, इन्द्रायण की जड़, हरमल तथा रास्ना १-२ भाग और मिलाकर शृंगभस्म १-२ ग्राम के साथ देने के लिए निर्देशित करते हैं।