शूल-रोग (पेट दर्द)
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पेट में शूल गड़ने जैसी वेदना को शूल-रोग या पेट दर्द कहते हैं। शूल-रोग अधिकतर अजीर्ण के कारण पैदा होता है। गुरुपाकी द्रव्यों का भोजन, अधिक भोजन तथा सामान्य भोजन का भी किसी कारण से पाक न होना आदि कारणों से या मन्दाग्नि के कारण जो वेदना होती है, उसे अजीर्ण-शूल कहते हैं। अम्लपित्त रोग में भी पेट दर्द होता है, जिसे अम्ल-शूल कहते हैं। भोजन के आधा घंटा बाद नियमित रूप से जो भयानक पेट दर्द होता है, उसको पक्तिशूल कहते हैं। वह वमन होते ही शान्त हो जाता है। यकृत् (लीवर) से एक नली पक्वाशय में आयी है। उसी नली द्वारा यकृत् से पित्त पक्वाशय में गिरकर भोजन को पकाने में सहायता करता रहता है। कभी-कभी वह पित्त सूखकर पत्थर जैसा कठिन हो जाता है और यकृत् के मुँह या नली के बीच आकर अटक जाता है, तब बड़ा भयानक शूल होता है। इस शूल में पित्त-वमन या जी-मिचली होती है। इसे पित्त-शूल कहते हैं। इसी तरह जो नली वृक्क (गुर्दे) से मूत्राशय में गई है, उसमें भी पथरी होकर भयानक दर्द होता है। वह दर्द वृक्क के स्थान (चूतड़ों के ऊपर पेट की तरफ) से उठकर जननेन्द्रिय तक जाता है। इस दर्द में भी कै होती है। साथ ही पेशाब में जलन और दस्त जाने की शंका रहती है और पेशाब ज़रा-ज़रा सा होता है। शूलों को स्थान-भेद से पहचानना चाहिए। पेट में कीड़ों के कारण या कब्जियत के कारण भी शूल होता है। भोजन के ३ घण्टे बाद नियम से होने वाले शूल को परिणामशूल कहते हैं।
चिकित्सा
शूल-रोग में कारण को अच्छी तरह जाने बिना चिकित्सा करने से कुछ भी लाभ नहीं होता। किसी भी प्रकार का शूल-रोग हो, बोतल में गर्म पानी भरकर सेंकना लाभदायक है। शूल-रोग की अवस्था की तरफ विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि प्राणहर अवस्था न हो, तो जल्दी करने की कोई आवश्यकता नहीं है, दो-चार घण्टे बाद खुद ही दर्द मिट जाता है। केवल रोगी के विश्वास के लिए कुछ मामूली दवा दे देनी चाहिए। किन्तु शूल फिर पैदा न हो, इसकी चिकित्सा करना आवश्यक है। मूल कारण नष्ट होने से फिर शूल पैदा नहीं होता, इसलिए मूल रोग की ही चिकित्सा विधेय है। शूल-रोग को तत्काल शान्त करने के लिए नीचे लिखी दवाएँ देनी चाहिए --
(१) ६१ मि.ग्रा. या १२१.५० मि.ग्रा. फूल पिपरमिन्ट जल या बताशे में डालकर खाने से पेट का दर्द आराम होता है। अमृतधारा की ५ से १० बूंद खाने से लाभ होता है।
(२) हरड़, बहेड़ा, आँवला और राई -- इन चारों का चूर्ण ६ ग्राम गर्म पानी के साथ देने से पेट दर्द आराम होता है। यह कब्जियत के लिए विशेष लाभकारी है।
(३) शंख भस्म, काला नमक, भुनी हुई हींग, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल -- इन ६ वस्तुओं का समभाग लेकर चूर्ण करें। ३ ग्राम की मात्रा में गर्म जल के साथ लेने से अजीर्ण-शूल बन्द हो जाता है।
(४) भीगे हुए पत्थर के चूने में समभाग अजवायन का चूर्ण मिलाकर एक ग्राम की गोलियाँ बना लें। ये पेट दर्द में बहुत फायदा करती हैं।
(५) पक्तिशूल में सज्जीक्षार या सोडा बाइकार्ब ३ से ६ ग्राम देने से लाभ होता है।
(६) ६ ग्राम सोंठ के चूर्ण में १ ग्राम नमक मिलाकर गर्म जल के साथ खाने से पित्तज-शूल में आश्चर्यजनक लाभ होता है। इससे मॉर्फिया के इन्जेक्शन की तरह फायदा होता है। सोडा बाइकार्ब भी ३ ग्राम गर्म पानी से खाना लाभदायक है।
(७) असली जवाखार १.५ ग्राम गर्म जल के साथ प्रत्येक घण्टे में देने से वृक्क-शूल (दर्द गुर्दा) आराम होता है। पेशाब उतारने वाली दवा से भी लाभ होता है। इसमें मूत्रकृच्छ्र रोग की दवा से बहुत फायदा होता है।
(८) जामुन का सिरका -- पके हुए जामुन से घड़ा भरकर ४६७ ग्राम नमक डालकर अच्छी तरह हिलाकर रख दें। फिर दूसरे दिन उसका रस निकालकर बोतल में भर लें। इन बोतलों का मुँह बन्द करके धूप में रखें और रोज एक बार मोटा कपड़ा मुँह पर लगाकर दूसरी बोतल में बदल दें। १५-२० दिन बाद सिरका तैयार हो जायगा। चूने के फर्श पर डालने से जब तेजाब की तरह बुलबुला उठने लगे, तब समझना चाहिए कि सिरका तैयार हो गया है। इसी तरह अंगूर, ईख आदि हरेक वस्तु का सिरका तैयार किया जा सकता है। ५.८३ या ११.६६ ग्राम सिरका जल के साथ मिलाकर देने से पेट दर्द में बहुत लाभ होता है।
(९) कुचले का चावल -- कुचले को पानी और बालू में ७ रोज भिगोकर ऊपर का छिलका व भीतर की जीभ निकाल डालें और चाकू या छुरी से महीन चावल बनाकर घी में सेंक लें। ये चावल पेट दर्द या मन्दाग्नि में बहुत लाभ पहुँचाते हैं। पुराना हो जाने से चावल इतने सख्त हो जाते हैं कि पेट में गलते नहीं, वैसे ही पाखाने से निकल जाते हैं। इसलिए महीन चूर्ण करके समभाग चीनी मिला दी जाय तो कुछ आपत्ति न रहेगी।
(१०) शूलवज्रिणी वटी -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और लौह भस्म या शंख-भस्म प्रत्येक २३.२ ग्राम; शुद्ध सोहागा, शुद्ध हींग, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता, तालीसपत्र, जायफल, लौंग, अजवायन, जीरा और धनिया प्रत्येक ११.६६ ग्राम। सबका चूर्ण कर आँवले के रस में घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें।
अनुपान -- बकरी का दूध या ठंडा पानी। इससे सब तरह के शूल आराम होते हैं। हमारा अनुभव है कि जिन रोगियों को मन्दाग्नि के कारण पेट में मन्द-मन्द दर्द बना रहता है, उन्हें ये गोलियाँ विशेष लाभ करती हैं। हम भोजन के बाद अजवायन अर्क या गर्म पानी के साथ इस वटी को देते हैं।
(११) सामुद्रादि चूर्ण -- पाँचों नमक, जवाखार, सज्जीखार, दन्तीमूल, लौह भस्म, मण्डूर भस्म, त्रिवृत् (निशोथ) और जमीकन्द -- इन बारह वस्तुओं के प्रत्येक ११.६६ ग्राम को गोमूत्र, दही और दूध -- इन तीनों द्रव्यों में अच्छी तरह भिगोकर मन्द-मन्द अग्नि से पकाएँ। चूर्ण की तरह हो जाने पर नीचे उतारकर रख लें। १.५ से ३ ग्राम तक की मात्रा में गर्म जल के साथ दें। शास्त्र में इस चूर्ण को शूल-रोग की महौषधि बतलाया है। हमारे अनुभव में भी यह बहुत उत्तम गुणकारी सिद्ध हुआ है। परिणाम-शूल की यह उत्तम दवा है।
(१२) अग्नितुण्डी वटी भी लाभ करती है।
(१३) शिवाक्षार पाचन चूर्ण -- छोटी हरड़ का चूर्ण, सज्जीक्षार या सोडा बाइकार्ब (खाने का सोडा) प्रत्येक को एक-एक भाग लेकर मिलाकर रख लें। उदरशूल, अजीर्ण, आनाह (अफारा), उदर वात वृद्धि (पेट में गैस बढ़ना) आदि में यह उत्तम गुणकारी सुपरीक्षित योग है। -- आ० नि० मा०
मात्रा और अनुपान -- २ से ४ ग्राम तक चूर्ण को सुबह-शाम अथवा भोजन के बाद सुखोष्ण जल के साथ लें। सुखोष्ण जल एक कप में आधे कागजी नीम्बू का रस निचोड़कर उसके साथ लेने से विशेष लाभ करता है।
(१४) शान्तिवर्द्धक चूर्ण -- सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, बड़ी इलायची, लौंग प्रत्येक ११.६६ ग्राम लें; गैरिक (गेरू) ३५ ग्राम, नौसादर ४६.४ ग्राम, नीबू का सत्व ११.६६ ग्राम, चीनी ३५ ग्राम, सूखा पुदीना १९.६६ ग्राम -- इन सबको कूटकर मिलाकर रख लें। पेट दर्द, अजीर्ण, उदर वात वृद्धि, अरुचि आदि में इसके सेवन से बहुत अच्छा लाभ होता है। अम्लपित्त रोग में होने वाली अन्नप्रणाली की जलन (प्रदाह) और खट्टी डकारों में भी यह लाभकारी है।
मात्रा और अनुपान -- २ से ४ ग्राम तक चूर्ण को जल के साथ सेवन करें या चुटकी से थोड़े-थोड़े चूर्ण को मुँह में डालकर खाएँ।
पथ्यापथ्य
जब तक पेट दर्द अच्छी तरह शान्त न हो जाय, तब तक खाने को कुछ न देना चाहिए। सोडावाटर पीना अच्छा है। दर्द शान्त होने पर बहुत जल्दी हजम होने वाला पथ्य खाना चाहिए। परिणाम-शूल में आमाशय के रस को कम बनाने वाला आहार देना उचित है। इसके लिए अम्लपित्ताधिकार देखें।