मन्दाग्नि (अजीर्ण)
13 मिनट का पाठ
मन्दाग्नि का अर्थ है परिपाक-शक्ति का वैलक्षण्य होना। जिन-जिन कारणों से खाया हुआ भोजन पचता है, उन-उन कारणों में गड़बड़ी पैदा हो जाती है, जिससे भोजन का अच्छा पाक नहीं होता। इसी का नाम 'मन्दाग्नि' है। भोजन से शरीर की वृद्धि होती है। यदि शरीर को उन पदार्थों की जगह, जिनका काम-धन्धा करने से क्षय होता है, दूसरे खाद्य पदार्थों से पूर्ति न की जाय तो शरीर का क्षय होना निश्चित है। भोजन प्रतिदिन शारीरिक क्षय की पूर्ति करता है, परन्तु जब मन्दाग्नि के कारण भोजन का पाक नहीं होता तब शरीर धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है। इसका अभिप्राय यह नहीं समझना चाहिए कि भोजन न करने से ही शरीर क्षीण होता है, बल्कि चार-पाँच बार अच्छा स्वादिष्ट और बलकारक भोजन करने पर भी जब मन्दाग्नि के कारण भोजन का पाक नहीं होता, तब शरीर का क्षीण होना निश्चित है। आजकल मन्दाग्नि का रोग अधिक संख्या में फैला हुआ है। इसका खास कारण यही है कि बहुत लोगों ने प्राकृतिक सरल जीवन बिताना छोड़ दिया है। शहरों की गन्दी आबोहवा के साथ ही वर्तमान समय के लोगों को दिमागी काम भी बहुत करना पड़ता है। लोगों ने शारीरिक परिश्रम छोड़-सा दिया है। अंग्रेजों की देखा-देखी आजकल के शिक्षित भारतवासी भी चार-पाँच बार भोजन करना जरूरी समझते हैं। भारतवासियों के लिए तो दो बार का भोजन काफी है। तीसरी बार, सुबह का जलपान भी किसी तरह ठीक माना जा सकता है। किन्तु चार-पाँच बार भोजन करना तो बीमारी को न्योता देना है। फिर, आजकल शहरों में विशुद्ध खाद्य पदार्थों का मिलना भी मुश्किल हो गया है। घी, तेल, मक्खन, दूध, दही, आटा आदि सभी चीजों में मिलावट हो गई है। इससे भी मन्दाग्नि रोग की वृद्धि हुई है।
बुद्धिमान मनुष्य को यह समझना चाहिए कि उसका जीना सिर्फ चार-पाँच बार भोजन करने के लिए ही नहीं है, बल्कि जीवित रहने के लिए भोजन किया जाता है। यह भी समझना चाहिए कि भोजन के लिए जीवन नहीं है, बल्कि जीवन के लिए भोजन है। इस तरह की धारणा होने पर चटपटी मसालेदार और स्वादिष्ट पकवानों की कोई जरूरत नहीं रह जाती। जितनी भूख होती है, उतना भोजन खुद पेट माँग लेता है। भोजन को जबर्दस्ती पेट में उतारने वाले मसालों की क्या जरूरत है? जो भोजन बिना किसी सहायता के अपने-आप पेट में चला जाय, वही सच्चा भोजन समझना चाहिए। साग, दाल, चटनी आदि में मसाले आदि तरह-तरह की चीजें इसीलिए तो डाली जाती हैं कि उनकी सहायता से अधिक-से-अधिक भोजन पेट में पहुँच जाए। आवश्यकता से अधिक भोजन पेट में जाते रहने पर कुछ समय बाद निश्चित ही मन्दाग्नि की बीमारी पैदा हो जायगी। खाली दिमागी काम करके ही जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए। परमात्मा ने मनुष्य देह में सिर्फ दिमाग भर ही नहीं बनाया है, और भी बहुत-से अंग बनाये हैं। उन सब अंगों से भी काम लेना चाहिए। शारीरिक परिश्रम न करके सिर्फ दिमागी काम करनेवालों को बहुत जल्द मन्दाग्नि का रोग हो जाता है।
मन्दाग्नि के साधारण लक्षण
समय-समय पर दस्त का ठीक नहीं होना, कभी कब्जियत होना और कभी पतला दस्त होना, भूख का मारा जाना, पेट फूलना, पेट में वायु का संचय होना, पेट दर्द, पेट का भारीपन, डकारें आना, जी मिचलाना, छाती में जलन, कै, मुख से पानी का छूटना, आलस्य भाव, प्रश्वास में दुर्गन्ध, छाती का धड़कना, सिर दर्द, अच्छी तरह नींद न आना आदि। मन्दाग्नि का रोगी धीरे-धीरे कमजोर और रक्तहीन हो जाता है।
चिकित्सा
मन्दाग्नि की चिकित्सा करना बिल्कुल व्यर्थ है, यदि नियम-पालन न किये जाएँ। सम्भव है कि कोई औषध मन्दाग्नि को दूर कर दे, परन्तु कुछ देर के लिए ही। इसलिए मन्दाग्नि के रोगी को औषध की अपेक्षा नियमों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। नियमों का पालन करते हुए यदि साथ-साथ दवा का सेवन भी किया जाय, तो रोग में जल्दी आराम हो जायगा। संग्रहणी अधिकार में लिखा नं० (१) नुस्खा मन्दाग्नि की उत्तम औषध है। संग्रहणी में लिखी पर्पटी भी मन्दाग्नि में बहुत फायदेमन्द है; इसलिए लौहपर्पटी आदि मन्दाग्नि में भी देना उचित है।
(१) लवणभास्कर चूर्ण -- विड् नमक, सेंधा नमक, धनिया, पीपल, पीपलामूल, स्याह जीरा, तेजपात, नागकेशर, तालीसपत्र और अम्लवेतस -- ये १० दवाएँ प्रत्येक २३.२ ग्राम; समुद्र नमक ९३ ग्राम; संचर (काला) नमक ५८.३ ग्राम; काली मिर्च, जीरा और सोंठ -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम; अनारदाना ४६.६ ग्राम; दालचीनी और बड़ी इलायची ६-६ ग्राम -- इन सब दवाओं का महीन चूर्ण करके नीबू के रस की भावना दें। इसी का नाम 'लवणभास्कर चूर्ण' है। यह खाने में बहुत स्वादिष्ट और अत्यन्त लाभकारी चूर्ण है। रोज भोजन के बाद यदि इसका सेवन किया जाय, तो किसी तरह का रोग उत्पन्न नहीं होगा। १ ग्राम से ३ ग्राम तक इसकी खुराक है; जरूरत के अनुसार ६ ग्राम तक दिया जा सकता है। मट्ठे में मिलाकर इसका सेवन सर्वोत्तम है। काँजी, दही का पानी या शरबत के साथ भी सेवन किया जा सकता है। रात को सोते समय गर्म पानी से लिया जाय तो सुबह पाखाना साफ हो जाता है। यदि समभाग पंचसकार चूर्ण मिलाकर रोगी को दिया जाय, तो दो-तीन दस्त खुलासा हो जाते हैं। यह मन्दाग्नि और संग्रहणी की अच्छी दवा है। प्रायः सभी लोग इसके गुणों को जानते हैं। (शा. सं.)
(२) हिंग्वाष्टक चूर्ण -- सोंठ, काली मिर्च, पीपल, सेंधा नमक, स्याह जीरा, सफेद जीरा, अजमोद (अजवायन) -- इन सात दवाओं को समभाग लेकर महीन चूर्ण करें। बाद में घी में भुनी हुई हींग आठवाँ भाग और मिला दें। इसी का नाम 'हिंग्वाष्टक चूर्ण' है। इसकी मात्रा ३ ग्राम की है। भोजन के समय पहले ग्रास में इस चूर्ण को घी में मिलाकर खाएँ, तदुपरान्त भोजन करें। इससे वायु-प्रधान मन्दाग्नि अच्छी हो जाती है। पेट में वायु का जमा होना, डकार आना, भूख न लगना आदि की यह उत्तम दवा है।
(३) संजीवनी वटी -- वायविडङ्ग, सोंठ, पीपल, हर्रे, आँवला, बहेड़ा, वच, गिलोय, शुद्ध भिलावा और शुद्ध विष -- इन १० दवाओं का महीन चूर्ण करके तीन दिन तक गोमूत्र दे-देकर खूब घोटें। फिर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यही 'संजीवनी वटी' है।
अनुपान -- अदरक का रस। १ गोली की खुराक अजीर्ण और वायुगोला के लिए, २ गोलियों की खुराक हैजा के लिए, ३ गोलियों की खुराक साँप के विष के लिए और ४ गोलियाँ एक साथ सन्निपात में देनी चाहिए। ये गोलियाँ हर गृहस्थ के घर में रहनी चाहिए, बहुत काम की दवा हैं। (शा. सं.)
(४) गन्धक वटी -- शुद्ध गन्धक २३.२ ग्राम, सेंधा नमक २३.२ ग्राम और सोंठ ४६.४ ग्राम -- इन तीनों चीजों का महीन चूर्ण करके तीन दिन तक नीबू के रस में खूब घोटें। फिर चने के बराबर गोलियाँ बना लें। इसी का नाम 'गन्धक वटी' है और इसी को 'राजवटी' भी कहते हैं। रोज दिन-रात में १-१ करके ४-५ गोलियाँ खाएँ। अनुपान की जरूरत नहीं है। खाने में यह बहुत स्वादिष्ट होती है। (यो. चि.)
(५) शंख वटी -- २३३ ग्राम नीबू के रस में इमली का क्षार ४६.४ ग्राम और पाँचों नमक ४६.४ ग्राम डालकर रखें। फिर उत्तम शंख के टुकड़े ४६.४ ग्राम को खूब गर्म करके उसमें डालें। इस तरह चार-पाँच बार गर्म करके डालने से शंख गल जायगा। इस शंख के टुकड़ों का महीन चूर्ण कर लें। फिर भुनी हुई हींग, सोंठ, काली मिर्च और पीपल सब मिलाकर ४६.४ ग्राम; शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और शुद्ध विष प्रत्येक चार-चार ग्राम उसमें मिला दें। बनाने की विधि: पहले पारा और गन्धक की कज्जली करें, बाद में सब चीजें मिलाकर इमली के क्षार और पाँचों नमक मिले हुए नीबू के रस में (जिसमें कि शंख भी डाला गया है) खूब घोटें। यदि वह रस कम हो जाय, तो और नीबू का रस मिला दें। फिर चने के बराबर (१२१.५ मि.ग्रा.) की गोलियाँ बना लें। इसी का नाम 'शंख वटी' है। यह संग्रहणी, अजीर्ण, पेट-दर्द, वायुशूल और पक्तिशूल (परिणामशूल) में बहुत फायदेमन्द है। ताजा या गरम जल के साथ भोजन के बाद शंख वटी खानी चाहिए।
(६) अग्निवर्धक वटी -- काला नमक, नौसादर, काली मिर्च और आक के फूलों की लौंग (आक के फूलों के भीतर जो चतुष्कोणाकार भाग होता है उसी को आक के फूलों की लौंग कहते हैं) -- इन चारों को समभाग लेकर जल के संयोग से चने के बराबर की गोलियाँ बना लें। भोजन के बाद दो से तीन गोली तक खाएँ। यह मन्दाग्नि में बहुत अच्छा फायदा करती है। (सि. भै. म.)
(७) लहसुन वटी (रसोनादि वटी) -- छिलका निकाला हुआ लहसुन २३.२ ग्राम, स्याह जीरा, सफेद जीरा, शुद्ध गन्धक, सेंधा नमक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, घी में भुनी हुई हींग -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम -- इन सबको तीन दिन तक नीबू के रस में घोंटकर ३६४ मि.ग्रा. की गोली बना लें। इसके खाने से मन्दाग्नि, उदर-वायु, पेट-दर्द आदि शीघ्र अच्छे होते हैं। यह उत्तम दीपन, पाचन और वायुनाशक है।
(८) चित्रकादि वटी -- जम्भीर वटी (सिद्धयोग संग्रह में देखें)।
(९) अग्नितुण्डी वटी -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, अजमोद, हरड़, बहेड़ा, आँवला, सज्जीखार, सेंधा नमक, काला नमक, चीते (चित्रक) की जड़ की छाल, जीरा, वायविडङ्ग, सोंठ, काली मिर्च, पीपल और समुद्र नमक -- इन दवाओं को समभाग लें और इन सबके बराबर ही शुद्ध कुचले का चूर्ण डालें। पारा और गन्धक को पहले घोंटकर कज्जली करें, फिर सब दवाइयाँ मिला दें। फिर जम्बीरी नीबू के रस में घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ मन्दाग्नि में बहुत फायदा करती हैं। भोजन के बाद एक गोली जल के साथ खानी चाहिए। इसके सेवन से भूख लगती है, खाया हुआ अन्न अच्छी तरह पच जाता है, पेट की वायु शान्त होती है और बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है। कुचला जठराग्नि बढ़ाने की बहुत ही उत्तम औषधि है। इसके संयोग से बनी हुई ये गोलियाँ बहुत अच्छी हैं। मन्दाग्नि के लिए शायद ही इससे उत्तम कोई दूसरी दवा हो। (शा. सं.)
(१०) अग्निमुख चूर्ण -- भुनी हुई हींग १ भाग, वच २ भाग, पीपल ३ भाग, सोंठ ४ भाग, अजवायन ५ भाग, हर्रे ६ भाग, चित्रकमूल की छाल ७ भाग और कूठ ८ भाग -- इनका महीन चूर्ण करके तक्र (मट्ठा), दही का जल या गर्म पानी के साथ ३ ग्राम से ६ ग्राम तक सेवन करें। इससे मन्दाग्नि और अजीर्ण में बहुत लाभ होता है। (यो. र.)
(११) रामबाण रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध बच्छनाग, लौंग -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, काली मिर्च २३.२ ग्राम, जायफल ५.८ ग्राम -- इनका महीन चूर्ण करके इमली के पके फलों के रस में घोंटकर मूंग के बराबर गोली बना लें। यदि इसमें बिजौरा, सन्तरा, अनार, आक के फूल और अदरक के रस की एक-एक भावना और दे दी जाय, तो यह औषध अधिक प्रभावशाली बन जाती है। यह उत्तम दीपन, पाचन और ग्राही है। मन्दाग्नि के कारण पतले दस्त हों, तो विशेष लाभदायक है। (भै. र.)
(१२) अग्निकुमार रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, आग पर फुलाया हुआ सुहागा -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, शुद्ध बच्छनाग ३५ ग्राम, कौड़ी और शंख भस्म २३.२ ग्राम, काली मिर्च ९३ ग्राम -- इन सबको नीबू के रस में तीन दिन तक घोटकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह रस मन्दाग्नि, अजीर्ण और पेट-दर्द की उत्तम दवा है। अनुपान में नीबू का रस या तक्र देना चाहिए। (भै. र.)
(१३) क्रव्याद रस -- शुद्ध पारा ४६.४ ग्राम, शुद्ध गन्धक ९३ ग्राम, ताम्र भस्म और लौह भस्म २३.२ ग्राम -- पहले पारा और गन्धक की कज्जली बनाकर फिर ताम्र और लौह भस्म डालकर खूब महीन पीसना चाहिए। इसके बाद पर्पटी की तरह गलाकर एरण्ड के पत्तों पर पर्पटी बनाएँ और इस पर्पटी का चूर्ण बनाकर एक लोहे के पात्र में डालकर उसमें ५१.३ किलो जम्बीरी नीबू का रस डाल दें। यदि पात्र कलई किया हो तो अधिक अच्छा है। इस रस को मन्द-मन्द आँच से जलावें। जब गाढ़ा हो जाय, तब इसमें पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक और सोंठ के क्वाथ से ५० भावना और अम्लवेतस के क्वाथ से ५० भावना दें और घोंटकर सुखा लें। सूखने पर भुना हुआ सुहागा १८७ ग्राम, विड् नमक ९३ ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण १८७ ग्राम -- इसमें मिलाकर चणकाम्ल (चने के खार) के रस में सात भावना देकर सुखाएँ और शीशी में भर लें। अब यह क्रव्याद रस तैयार हो गया।
इसकी मात्रा २४३ मि.ग्रा. है। इसे सेंधा नमक मिले हुए मट्ठे के साथ भोजन के अन्त में लेना चाहिए। यह रस गरिष्ठ-से-गरिष्ठ भोजन को अधिक मात्रा में खा लेने पर भी ६ घण्टे में पचा देता है। इसके सेवन करने वाले को दूध, फल वगैरह अच्छी मात्रा में सेवन करना चाहिए। यह रस अग्निमांद्य के साथ-साथ और भी अनेक रोगों को दूर करता है। (इसकी मात्रा मूल पाठ में ३ ग्राम लिखी गई है, किन्तु आजकल २४३ मि.ग्रा. की खुराक काफी है।) (यो. र.)
पथ्यापथ्य
संग्रहणी के रोगी की तरह मन्दाग्नि के रोगी को भी जलवायु का बदलना बहुत उत्तम है। भोजन हल्का और पुष्टिकारक होना चाहिए। दूध या दही का भोजन सर्वोत्तम है। अन्न बहुत कम या बिल्कुल न खाना चाहिए। ऋतु के शाक सिर्फ उबालकर और नमक मिलाकर खाना चाहिए। हरी पत्तियों का शाक बहुत अच्छा है। फलों का खाना भी बहुत अच्छा है। मौसम के अनुसार जो भी फल मिले, उन सबको खाना अच्छा है। परन्तु फलों का ताजा होना जरूरी है। कच्चे या सड़े हुए फल भूलकर भी न खाना चाहिए। वे लाभ की जगह बहुत नुकसान करते हैं। फलों में भी सन्तरा, मौसमी का सेवन सर्वोत्तम है। कच्चा या पका पपीता भी बहुत फायदेमन्द है। तेल, खोवा (मावा), मसाला, अचार, मिर्च, मिठाई, गुड़, शराब, गाँजा, भाँग, तम्बाकू आदि छोड़ देना चाहिए। घी डेढ़ तोला से ज्यादा न खाना चाहिए। मोटे आटे की रोटी और बिना माँड़ निकाले चावल का भात खाना हितकारी है। नीबू, अदरक, हरा पुदीना या धनिया खाना लाभकारी है। बीच-बीच में उपवास करके पाकस्थली को विश्राम देना भी जरूरी है। जो कुछ भी खाया जाय, खूब धीरे-धीरे अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए। भोजन के समय पानी ज्यादा न पीना चाहिए। भोजन के आधा-एक घण्टे बाद जब प्यास लगे, तब ताजा जल पीना चाहिए। मन्दाग्नि के रोगी को खाने का लोभ बिल्कुल नहीं करना चाहिए। उसको स्मरण रखना चाहिए कि खाया हुआ पदार्थ शरीर के लिए तब उपयोगी होता है, जब वह अच्छी तरह पच जाता है। अगर खाया हुआ अन्न पचता नहीं है, तो वह भोजन नाना प्रकार की व्याधियों को उत्पन्न कर देता है। इसलिए हमेशा भूख से कम खाना चाहिए। मन्दाग्नि के रोगी को दाँतों की परीक्षा जरूर करा लेनी चाहिए, क्योंकि मन्दाग्नि वालों को प्रायः दन्त-रोग हो जाता है या दन्त-रोग होकर मन्दाग्नि हो जाती है।