कोष्ठबद्धता (कब्जियत)
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बहुत तरह के कारणों से कब्ज रहता है। कब्ज अनेक रोगों के लक्षणों में गिना जाता है। कुछ आदमियों की प्रकृति ही ऐसी हो जाती है कि उनको दस्त साफ नहीं होता, दो-दो चार-चार रोज में दस्त साफ होता है। असल में कब्जियत नाम भी इसी का है। किसी विशेष कारण से एक-दो रोज दस्त का कब्ज होना कोई कब्जियत नहीं है। निरन्तर कोष्ठ साफ न होना ही कब्जियत की गणना में आता है। कब्जियत होने से मन में ग्लानि, आलस्य भाव, मुँह से जल तथा दुर्गन्ध का आना, ज्वरभाव, अरुचि, सिर-दर्द आदि लक्षण प्रकट होते हैं। निरन्तर कब्जियत रहने से बवासीर और गृध्रसी-वात उत्पन्न हो जाते हैं।
किसी प्रकार का शारीरिक परिश्रम न करना, निकम्मा बैठे रहना, दिमागी काम में अधिक व्यस्त रहना, गुरुपाकी चीजों का भोजन, काफी या चाय का अधिक पीना, यकृत् या तिल्ली की बीमारी, शोक, चिन्ता, भय आदि का होना -- इन कारणों से दस्त की कब्जियत उत्पन्न हो जाती है। जो लोग साधारण स्वास्थ्य के नियमों का पालन नहीं करते, वे ही इस बीमारी के जाल में अधिक फँसते हैं। खाये हुए अन्न का अच्छी तरह पाक न होने से कब्जियत का होना या पतले दस्तों का होना निश्चित है। अर्थात् कब्जियत का असल कारण भोजन का पाक न होना ही है।
चिकित्सा
कब्जियत की चिकित्सा सर्वसाधारण को सीधी-सादी यह जान पड़ती है कि मामूली या तेज जुलाब लेकर पेट साफ कर लिया जाय। बहुत-से रोगी तो रोग का विवरण कहना भी अनावश्यक समझकर चिकित्सक से या बाजार से जुलाब की दवा ले लेते हैं। बराबर कब्जियत रहने वाले रोगी को जुलाब देना भयंकर भूल है। इससे बहुत नुकसान होता है। एक तो कब्जियत की बीमारी रहती ही है, दूसरी दवा खाने की एक बीमारी और हो जाती है। यानी बिना दवा के दस्त होता ही नहीं। निरन्तर दस्तावर दवाओं को खाकर पेट साफ करने से प्राकृतिक शक्ति जो अंतड़ियों में होती है, वह भी मारी जाती है। दस्तावर दवाएँ स्वभावतः गर्म और उत्तेजना पैदा करने वाली होती हैं। उनके सेवन से बवासीर, धातु का पतलापन, स्वप्नदोष आदि अनेक विकार पैदा हो जाते हैं। इसलिए जहाँ तक हो सके कब्जियत को निर्मूल करने के लिए दवाएँ न खाई जाएँ, प्रकृति की सहायता से ही कब्जियत का रोग दूर करना चाहिए। किस कारण से कब्जियत रहती है -- इसका भली-भाँति विचार करें। जब मूल कारण मालूम हो जाय, तो फौरन उसकी चिकित्सा करके उसे हटा दें -- कब्जियत आप ही आप दूर हो जायगी। यकृत् और तिल्ली की बीमारी के कारण होने वाले कब्ज में यकृत् और तिल्ली की चिकित्सा करनी चाहिए, दस्तावर दवा खाने से कुछ लाभ नहीं। यकृत और तिल्ली ठीक होने से कब्जियत खुद मिट जायगी। विशेष करके बदहजमी के कारण लोगों को कब्ज होता है। उसके लिए खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसमें मन्दाग्नि की औषध और आहार-विहार बहुत लाभ पहुँचायेगा। इस प्रकरण का पथ्यापथ्य भी बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। यदि कोष्ठ साफ करने की पूर्ण आवश्यकता हो, तो गर्म पानी में साबुन मिलाकर उसे डूस (douche) की सहायता से गुदाद्वार के भीतर पहुँचाएँ। इससे बृहदन्त्र का सम्पूर्ण मल निकल जायगा और आँतें धुलने से साफ और ताकत वाली हो जाएँगी। यह क्रिया भी हफ्ते में एक बार से अधिक न करनी चाहिए; वरना यह भी जुलाब की तरह अवगुण करेगी। डूस या एनिमा लेना कुछ कठिन काम नहीं है, बहुत सरल है। जिससे इसे खरीदें, वही बतला देगा या पास के वैद्य अथवा डॉक्टर से पूछ सकते हैं।
यह कब्जियत का प्रकरण है, इसलिए स्वभावतः ही लोग दस्तावर दवा इसी प्रकरण में खोजेंगे और बहुत-से रोगों में जुलाब देना भी आवश्यक हो जाता है। इसलिए नीचे जुलाब की दवाएँ लिखी जाती हैं, परन्तु कब्जियत के शिकार रहने वाले रोगी इन दवाओं का सेवन न करें, तो उनके लिए अच्छा रहेगा।
(१) रेंडी का तेल २९ से ५८ ग्राम तक, गर्म चाय या गर्म दूध में मिलाकर पीने से दो-चार दस्त हो जाते हैं। अन्य सभी जुलाब रूक्ष हैं; परन्तु यह स्निग्ध है। इसलिए शास्त्र में इसकी बहुत प्रशंसा लिखी है। यह पेट साफ करने के लिए बहुत उत्तम है। रेंडी का तेल पतला और निर्गन्ध (Castor oil) शोधित व्यवहार होता है, लेकिन अनुभव से देखा गया है कि इस तेल की अपेक्षा घाणी से निकाला हुआ तेल बहुत अधिक लाभ करता है। इसलिए गन्ध का ख्याल न करके घाणी का तेल ही पीना उचित है। दस्त-कब्जियत के पुराने अभ्यस्त रोगी, जिनके मल की गाँठ बँध जाती है, सोते समय १ चम्मच एरण्ड तेल लेते रहें तो २-४ मास में पूर्ण लाभ सम्भव है।
(२) आजकल सनाय से वैज्ञानिक विधि से उसका मरोड़ लाने वाला अंश निकालकर गोलियाँ बनाई जाती हैं, उनसे बिना मरोड़ १-२ बार साफ दस्त आता है।
(३) छोटी हरड़ और काला नमक समभाग मिलाकर चूर्ण करें। ११.६६ ग्राम या ५.८३ ग्राम गर्म पानी के साथ लेने से दो-चार दस्त हो जाते हैं।
(४) सनाय, सोंठ, सौंफ, सेंधा नमक और शिवा (हरड़) -- इन पाँचों चीजों को समभाग लेकर महीन चूर्ण करें। इसका नाम 'पंचसकार चूर्ण' है। ३ ग्राम पंचसकार चूर्ण और ३ ग्राम लवणभास्कर चूर्ण मिलाकर रात्रि को सोते समय गर्म पानी के साथ खाने से प्रातःकाल दस्त साफ हो जायगा। केवल यही चूर्ण ११.६६ ग्राम गर्म पानी के साथ लेने से भी दो-चार दस्त हो जाएँगे।
(५) ३ ग्राम सनाय की पत्ती को दूध में औंटाएँ। फिर छानकर पत्तियाँ फेंक दें और दूध में चीनी मिलाकर पी जाएँ, तो दो-तीन दस्त हो जाएँगे।
(६) गुलाब का गुलकन्द २३.२ ग्राम रात को सोते समय गर्म दूध या गर्म पानी के साथ खाने से सुबह दस्त साफ हो जायगा।
(७) ईसबगोल ५.८३ ग्राम जल में २४ घण्टे भिगोकर समभाग मिश्री मिलाकर जल या दूध के साथ लेने से दस्त साफ होता है। आम की शिकायत के कारण या यकृत् के कारण जिन गर्म-मिजाज लोगों को केवल एक दस्त लेना हो, वे ईसबगोल का सेवन करें। बहुत सुन्दर दवा है। पेट को ठण्डा रखने में यह सर्वश्रेष्ठ है।
(८) कालादाना को भाड़ में भूनकर चूर्ण कर लें और समभाग मिश्री मिलाकर गर्म पानी के साथ लें। यह दस्तावर है।
(९) त्रिफला ३५ ग्राम, अजवाइन और काला नमक ११.६६ ग्राम, जवाखार ३ ग्राम -- सब मिलाकर महीन चूर्ण करें। ३ ग्राम से लेकर ११.६६ ग्राम तक गर्म जल के साथ खाने से दस्त साफ होता है और पाचनशक्ति बढ़ती है। केवल त्रिफला चूर्ण से इस चूर्ण का सेवन अधिक लाभदायक है।
(१०) मधुयष्ट्यादि चूर्ण -- मुलैठी ५८.३२ ग्राम, सौंफ २९ ग्राम, सनाय ५८.३२ ग्राम, शुद्ध गन्धक २९ ग्राम और मिश्री १७५ ग्राम लेकर महीन चूर्ण करें। यह चूर्ण कोष्ठ-शुद्धि के लिए बहुत उत्तम है। एक विलायती कम्पनी ने इसी चूर्ण की बोतलें हिन्दुस्तान में बेचकर बहुत रुपया कमाया है। ठीक यही नुस्खा है। यह आम के दस्त में विशेष लाभकारी है।
(११) अमलतास की चटनी -- ९३३ ग्राम नीबू के रस में अमलतास का गूदा ४६७ ग्राम डालकर २४ घण्टे भिगोकर रखें। फिर कपड़े से छान लें। दालचीनी, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, भुनी हुई हींग और बड़ी इलायची के बीज -- इन ६ दवाओं में से प्रत्येक २९ ग्राम; सेंधा नमक, काला नमक, भुना हुआ कालादाना, भुना हुआ जीरा और अजमोद -- इन पाँच दवाओं में से प्रत्येक ५८.३२ ग्राम को चूर्ण करके उपर्युक्त लुआब में मिला दें और ११६.६४ ग्राम काले मुनक्कों का बीज निकालकर और महीन पीसकर मिला दें, तो उत्तम चटनी तैयार हो जायगी। इसको खाकर गर्म जल पीने से दस्त साफ हो जाता है। जिनको बदहजमी के कारण कब्जियत रहती हो, उनके लिए यह सर्वोत्तम दवा है।
(१२) बृहत् इच्छाभेदी रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, कालीमिर्च, त्रिवृत् (निशोथ) -- ये पाँच चीजें ११.६६ ग्राम, सोंठ २३.०२ ग्राम और शुद्ध जमालगोटा १०४.७२ ग्राम -- सबको जल के साथ घोंटकर आक के पत्तों पर लेप करें और कण्डे की आँच से तपाएँ। फिर जल के संयोग से एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसे ठण्डे पानी के साथ खाने से दस्त आते हैं। इसमें दही-भात का पथ्य विधेय है। यह तेज जुलाब है, ५ से १० दस्त होंगे। -- रसे० चि०
(१३) अभया मोदक -- बड़ी हरड़ की छाल, कालीमिर्च, सोंठ, वायविडंग, आँवला, पीपल, पीपलामूल, दालचीनी, तेजपत्ता, नागरमोथा -- इन १० दवाओं के प्रत्येक ११.६६ ग्राम, जमालगोटा की जड़ २३.२ ग्राम, निशोथ ९३ ग्राम एवं मिश्री ७० ग्राम -- इन सबका महीन चूर्ण करके शहद के संयोग से ११.६६ ग्राम की वटी बना लें। ये गोलियाँ दस्तावर हैं। शास्त्र में इनके गुण बहुत लिखे हैं। पेट साफ करने के लिए यह बहुत अच्छी दवा है। -- शा० ध०
पथ्यापथ्य
कब्जियत के रोगी को दवाओं की अपेक्षा पथ्यापथ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खाने में ऐसी वस्तुओं का व्यवहार करना चाहिए, जिससे खुद ही पेट साफ होता रहे। कब्ज वाले रोगी के लिए अन्नों में सबसे अधिक उपकारी चना है। इसे भिगोकर खाना सर्वश्रेष्ठ है। यदि भीगा हुआ चना ठीक हजम न हो, तो उस हालत में चने को उबाल लेना चाहिए और नमक व ज़रा-सी अदरक मिलाकर खाना चाहिए। बहुत-से लोग चने की दाल को भिगोकर खाते हैं; परन्तु समूचा चना अधिक गुणकारी है। प्रत्येक अन्न के छिलके में सेल्युलोज के कारण कब्ज मिटाने की प्रचुर शक्ति रहती है। गेहूँ और चने का मोटा आटा रोटी के लिए सर्वोत्तम है। उबाले हुए चने या गेहूँ मिले चने के आटे की रोटी कब्ज के लिए सचमुच बहुत उपकारी है। किसी भी अन्न के आटे की रोटी खायी जाय, उसकी भूसी अलग न करनी चाहिए। भूसी सहित आटे की रोटी कब्ज वालों के लिए विशेष उपकारी है। मशीन से पिसे हुए आटे में कब्ज को नष्ट करने की शक्ति नहीं होती। गेहूँ का दलिया भी फायदेमन्द है। गेहूँ को उबालकर और नमक मिलाकर खाना सबसे सुन्दर विधि है। हाथ की चक्की से पिसे हुए गेहूँ की भूसी (चोकर) सहित आटे की रोटी खाना भी कब्जियत वालों के लिए परम हितकारी है। प्रातःकाल उठते ही ठंडा पानी पीना और ठंडे जल से अच्छी तरह स्नान करना लाभदायक है। यदि तैरकर स्नान किया जाय, तो बहुत ही उत्तम रहे। भोजन को खूब अच्छी तरह चबा-चबाकर खाना चाहिए। सूखे मेवे -- अंजीर, खजूर, पिस्ता, अखरोट, नारियल आदि खाना हितकर है।
मुझे यकृत् की बीमारी के कारण अन्न अच्छी तरह हजम न होकर कब्ज की शिकायत बहुत दिनों तक रही है। पेट में वायु जमा हो जाती थी, जिससे दस्त साफ नहीं होता था। मैंने प्रातःकाल भ्रमण और दौड़ने का व्यायाम आरम्भ किया तथा प्रतिदिन ५८.३२ ग्राम पिस्ता खाया और मट्ठे का सेवन किया, बीमारी एकदम जाती रही। व्यायाम अभी तक जारी है जिससे खोई हुई तन्दुरुस्ती फिर प्राप्त हो गई है। सभी प्रकार के ताजे फल कब्जियत के लिए विशेष लाभकारी हैं। पपीता तो सर्वोत्तम है। सागों में हरी पत्तियों का साग खाना विशेष लाभदायक है। बथुआ, चौलाई, कच्चा पपीता आदि के साग भी कब्जियत वालों के लिए सर्वोत्तम सेवनीय हैं। कच्चे और पके पपीते का सेवन अन्न को पचाने की शक्ति उत्पन्न करता है।
दस्त की कब्जियत वाले को विटामिन 'बी' वाले पदार्थ खाना अति लाभदायक है। बेल का शर्बत तो इतना गुण करता है कि तारीफ नहीं हो सकती। यह अंतड़ियों में ज़रा-सा भी मल नहीं रहने देता; एकदम पेट साफ कर देता है। बेल पका हुआ और ताजा होना चाहिए। बराबर कब्जियत वालों के लिए ईसबगोल का सेवन बहुत फायदेमन्द है। ईसबगोल के बीज ६ घण्टे भिगोकर लेना उचित है। ईसबगोल की भूसी बिना भिगोए मिश्री मिलाकर ले सकते हैं। यह दस्तावर चीज नहीं है। पुराने आँव के कारण होने वाले कब्ज के लिए इससे उत्तम कोई चीज नहीं है। दाल, घी और चीनी अधिक न खानी चाहिए। दूध, दही और मट्ठा का व्यवहार उत्तम है, क्योंकि ये कब्जनाशक हैं। प्रातःकाल खुले मैदान में मील-दो-मील मन्द-मन्द रफ्तार से दौड़ना कब्जनाशक और परीक्षित उपाय है। मांस, मदिरा, चाय, काफी, लालमिर्च, मसाले, मिठाई, चावल, मैदा, भूसी रहित मशीन का आटा, रात्रि-जागरण और भोजन के बाद दिन की निद्रा निषेध है। अभ्यस्त कब्जियत रोगी को सोते समय १ चम्मच एरण्ड तेल लेने से आँतें मुलायम हो जाती हैं और कब्ज का नाश हो जाता है।