वातव्याधि
16 मिनट का पाठ
वातव्याधि शब्द से सभी वात-रोग समझना चाहिए। ८० प्रकार के वात-रोगों में प्रायः होने वालों के नाम लिखे जाते हैं -- ठोड़ी का जकड़ना, मिनमिनापन, स्वाद का नष्ट होना, बहरापन, सुनबहरी (शून्यता), आफरा, मुँह का टेढ़ा होना, ग्रीवा-स्तम्भ, कमर का दर्द, एक पैर का दर्द, पैर की कपालिका का बड़ा होना, समूचे शरीर का डंडे की तरह जकड़ जाना, आक्षेप (काँपना), भीतर या बाहर की तरफ झुक जाना, धनुष की तरह टेढ़ा होना, पक्षाघात (लकवा), दर्द, चित्त-चांचल्य आदि। पक्षाघात और ग्रन्थिवात रोग बहुत होते हैं तथा इनकी चिकित्सा भी गम्भीर है, इसलिए उनको अलग ही लिखा गया है।
ठंडे और रूखे पदार्थों का खाना, उपवास, कम खाना, अधिक स्त्री-प्रसंग, बहुत जागना, मल-मूत्र आदि वेगों का रोकना, भय, शोक या चिन्ता का अधिक होना, चोट लगना, शरीर से खून का अधिक निकल जाना, अधिक कसरत, अधिक भ्रमण, रस-रक्त आदि धातुओं की कमी आदि कारणों से वायु कुपित होकर ऊपर लिखे रोग पैदा कर देता है। शरीर में चर्बी अधिक होना भी वात-रोगों का कारण है।
चिकित्सा
सभी तरह के वात-रोगों में सेंकना और मालिश करना बहुत अच्छा फायदा करता है। सेंकने की विधि यह है कि ईंट को खूब गर्म करें। फिर पानी के छींटे देकर कुछ ठंडी कर इस ईंट को सूती या ऊनी कपड़े में लपेटकर वायु के स्थान पर सेंक करें। वातघ्न तेल मालिश करते समय हाथ से सेंक करने से बहुत फायदा होता है। वातघ्न तेल, जो आगे लिखे जाएँगे, उनका मर्दन वातव्याधि में बहुत लाभकारी है। रबड़ की थैली में गर्म पानी भरकर सेंकना भी लाभदायक है।
स्वेद अर्थात पसीना लेना भी वातव्याधि में बहुत अधिक गुण करता है। वैद्यक शास्त्र में स्वेद लेने की अनेक विधियाँ लिखी हैं। मैंने नीचे लिखी डॉ. लुई कुनी की स्वेद-विधि से बहुत उत्तम अनुभव किया है। डॉ. लुई कुनी का इस विधि से सभी रोगों के आराम करने का दावा है, परन्तु मैंने सिर्फ वातव्याधि पर इस विधि को आजमाया है, जो बहुत गुणकारी सिद्ध हुई है। रोगी को नग्न करके बिना बिस्तरे की खाट पर सुलाकर सिर के नीचे तकिया रखें और मुँह को छोड़कर सारे शरीर को कम्बल से अच्छी तरह ढँक दें। तीन घड़ों में वातघ्न दवा एरण्ड, रास्ना, प्रसारणी आदि डालकर औंटाएँ। जब भाप जोरों से उठने लगे, तब रोगी की खाट के नीचे एक घड़ा पीठ, एक कमर और एक पैरों के नीचे रखें। घड़ों के मुँह पर बर्तन रख दें, ताकि सहसा जोर की भाप से रोगी व्याकुल न हो जाय। यदि आवश्यकता मालूम हो, तो घड़े के नीचे आग भी रख दें। इस प्रकार भाप के कारण तमाम शरीर से पसीना अच्छी तरह चूने लगेगा। पहले सूखे मोटे तौलिये से शरीर के पसीने को पोंछकर तुरन्त ठंडे पानी में भिगोए हुए तौलिये से समूचे शरीर को रगड़ डालें, जिससे गर्म हुआ शरीर ठंडा हो जाय। फिर तुरन्त कपड़े पहनकर यदि रोगी घूमने लायक हो, तो घूमकर शरीर को गर्मा ले। घूमने की सामर्थ्य न हो, तो गर्म कपड़े से शरीर को गर्म कर ले। पसीना आते हुए गर्म शरीर को ठंडे पानी में भिगोए तौलिये से पोंछने में भय का कोई कारण नहीं है। पूरा लाभ तभी होता है, जब पसीने के बाद तुरन्त ठंडे जल के तौलिये से शरीर को मला जाय। इससे तमाम शरीर के छिद्र खुल जाते हैं और रोग में बहुत जल्द आराम होता है। इस प्रकार स्वेदन, मर्दन और सेंक से वातव्याधि में बहुत लाभ होता है। निम्नलिखित दवाओं का प्रयोग अनुभूत है --
(१) रास्नादि क्वाथ -- रास्ना, पुनर्नवा, सोंठ, गिलोय और एरण्ड की जड़ की छाल का काढ़ा सब तरह की वातव्याधि, कमर, संधि आदि की पीड़ा में लाभदायक है।
(२) रास्नादि चूर्ण -- रास्ना, पुष्करमूल, सहजना, बेलगिरी, चित्रकमूल की छाल, सेंधा नमक, गोखरू और पीपल -- इन ८ दवाओं का चूर्ण १.५ ग्राम, घी के साथ चाटने से वातरोग शमन होता है।
(३) लहसुन को पीसकर तिल के तेल में मिलाकर खाने से वात-रोग शीघ्र आराम होता है। परीक्षित है।
(४) रेंडी के बीज को पीसकर और सोंठ मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से कमर का दर्द दूर होता है।
(५) चोपचीनी और असगन्ध का चूर्ण बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से कमर का दर्द दूर होता है।
(६) गुग्गुल २ ग्राम, त्रिफला और गिलोय के काढ़े के साथ निरन्तर सेवन करने से पैर की कपालिका का बड़ा होना (क्रोष्टुकशीर्ष) अच्छा होता है।
(७) षड्धरण योग -- चित्रकमूल की छाल, इन्द्रजौ, पाठा, कुटकी, अतीस और हरड़ -- इन दवाओं का चूर्ण वातव्याधि में विशेष लाभ पहुँचाता है। मात्रा ३ माशा, गर्म जल से दें। -- भा० प्र०
(८) त्रिफलागुग्गुलु -- हरड़, बहेड़ा और आँवला -- इन तीनों के बराबर उत्तम गुग्गुलु मिलाकर और रेंडी का तेल दे-देकर लोहे के इमामदस्ते में खूब कूटें। जितनी कुटाई होगी, उतना ही अधिक लाभ होगा। इसकी ३ माशा की गोलियाँ बनाकर गर्म दूध के साथ सेवन करें। इससे कमर, पीठ, गठिया आदि के दर्द में बहुत लाभ होता है। आमवात में भी लाभ होता है। यदि इसमें शुद्ध गन्धक त्रिफला के बराबर और मिला दिया जाय, तो यह वातरक्त की भी बढ़िया दवा हो जाती है। हमारा अनुभव है।
(९) महायोगराज गुग्गुलु -- सोंठ, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रकमूल की छाल, भुनी हुई हींग, अजमोद, सरसों, स्याह जीरा, सफेद जीरा, रेणुका, अतीस, भारङ्गी, वच, मूर्वा-मूल, इन्द्रजौ, पाठा, वायविडंग, गजपीपल और कुटकी -- इन २० दवाओं का प्रत्येक ३-३ ग्राम; त्रिफला ११६.६ ग्राम; शुद्ध गुग्गुल १७४.७० ग्राम; वंग भस्म, चाँदी-भस्म, सीसा (नाग)-भस्म, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, मण्डूर-भस्म और रससिन्दूर -- इन ७ दवाओं का प्रत्येक ४६.४ ग्राम (यदि सब भस्म न मिल सकें, तो बिना भस्म के भी तैयार कर सकते हैं; परन्तु भस्मवाला गुग्गुलु बहुत अधिक गुण करता है) -- इन सबों को रेंडी का तेल दे-देकर लोहे के इमामदस्ते में ५-७ रोज खूब कुटवाएँ। भस्म रहित की ३ ग्राम और भस्म सहित की एक ग्राम की गोलियाँ बना लें। इसका नाम 'महायोगराज गुग्गुल' है। यह वात-रोगों की संसार-प्रसिद्ध दवा है। जो रोगी वात-रोग के कारण घूमने-फिरने लायक न रहा हो, वह भी इसके सेवन से नीरोग हो जायगा। इस योग में भस्म न डाली जाय तो उसका नाम केवल 'योगराज गुग्गुलु' होगा। -- शा० ध०
अनुपान -- (१) वात-रोग में -- रास्नादि काढ़ा या गर्म दूध के साथ, (२) प्रमेह में -- दारुहल्दी के काढ़े के साथ, (३) वातरक्त में -- गिलोय के काढ़े के साथ, (४) पाण्डुरोग में -- गोमूत्र के साथ, (५) मेदोवृद्धि में -- शहद के साथ, (६) कोढ़-रोग में -- नीम की छाल के काढ़े के साथ, (७) शोथ और पेट दर्द में -- पीपल के काढ़े के साथ, (८) नेत्र-रोग में -- त्रिफला के काढ़े के साथ, (९) पेट रोग में -- पुनर्नवादि काढ़े के साथ, (१०) पित्त-रोग में -- काकोल्यादि काढ़े के साथ और (११) कफ-रोग में -- आरग्वधादि काढ़े के साथ दें।
विशेष गुण -- इससे पुरुषों के वीर्यदोष और स्त्रियों के रजोदोष आराम होते हैं। इससे बवासीर, संग्रहणी, वायुगोला, मिरगी, मन्दाग्नि, अरुचि आदि में बहुत फायदा होता है।
नोट: पंचामृत लौह गुग्गुलु (सि० यो० सं० पृष्ठ १०४), रसोन पिण्ड (सि० यो० सं० पृष्ठ १०६) तथा वातहर उपनाह (सि० यो० सं० पृष्ठ ११५) देखें।
(१०) कैशोर गुग्गुलु -- त्रिफला २.८ किलो और गिलोय ९३३ ग्राम को कूटकर लोहे की कड़ाही में २२.३९ किलो जल मिलाकर काढ़ा बनाएँ। जब ११.२० किलो जल शेष रह जाय तब उतारकर छान लें। उस काढ़े में ९३३ ग्राम उत्तम गुग्गुलु डालकर मन्द आग में पकाएँ। जब गुग्गुलु गलकर द्रव हो जाय, तब छानकर उसको फिर चूल्हे पर चढ़ाकर मन्द आग से औंटाएँ और करछुली से चलाते रहें, जिससे जलने या लगने का भय न रहे। जब गुग्गुलु गाढ़ा यानी गुड़-पाक के समान हो जाय, तब कड़ाही से निकाल लें। फिर उसमें नीचे लिखा चूर्ण मिला दें --
त्रिफला ९३ ग्राम, गिलोय ४६.४ ग्राम, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल -- प्रत्येक २३.२ ग्राम, वायविडंग २३.२ ग्राम, जमालगोटे की जड़ ११.६६ ग्राम, निसोथ ११.६६ ग्राम -- इन सब दवाओं का चूर्ण करके ऊपर वाली गुग्गुल में मिला दें और ३-३ ग्राम की गोलियाँ बना लें। इसे दूध, गर्म जल या मंजिष्ठादि क्वाथ के साथ खाना चाहिए। इससे वातरोग और सब तरह का कोढ़, वातरक्त, रक्तविकार, फोड़े-फुंसी, नासूर, भगन्दर आदि नष्ट होते हैं। -- शा० ध०
(११) एरण्ड पाक -- एरण्ड के बीजों के छिलके अलग करके ९३३ ग्राम लें, उनको महीन पीसकर ७ किलो दूध में डालें, चूल्हे पर चढ़ाकर मन्द-मन्द आग से खोवा बना लें। इस घन-द्रव्य को ४६७ ग्राम घी में अच्छी तरह भून लें। इसमें १.८७ किलो चीनी की कड़ी चाशनी मिलाकर नीचे लिखी दवाओं का चूर्ण और मिला दें --
सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता, नागकेशर, पीपलामूल, चित्रक, चव्य, सोआ, सौंफ, कपूरकचरी, बेलगिरी, अजवायन, स्याह जीरा, सफेद जीरा, दारुहल्दी, असगन्ध, खरेटी (बला), पाठा, हाऊबेर, वायविडंग, पुष्करमूल, गोखरू, कूठ, त्रिफला, देवदारु, काला विधारा, एलुआ और शतावरी -- इन सब दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर महीन चूर्ण करके मिला दें। यह सब तरह की वातव्याधि में बहुत फायदा करता है। आमवात, शोथ, उदररोग आदि में भी फायदा होता है। जिनको सख्त कब्जियत रहती हो, शुष्क गांठ-गांठ करके मल आता हो, उसमें विशेष लाभदायी है। मात्रा -- १ से २३.२ ग्राम तक गर्म दूध या जल के साथ देना चाहिए। (माजूम कुचला के लिए सि० यो० सं० पृष्ठ ११६ देखें।)
(१२) अमरसुन्दरी वटी -- सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, रेणुका, पीपलामूल, चित्रक, लौह भस्म, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध सिंगिया मोहरा, वायविडंग, अकरकरा, नागरमोथा -- इन २० दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम, पुराना गुड़ ४६७ ग्राम -- सब यथाविधि मिलाकर चने के बराबर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ जल के साथ खाने से मिरगी, सन्निपात, कास, श्वास, उन्माद और ८० तरह के वातरोगों को नष्ट करती हैं। ये गोलियाँ मारवाड़ प्रान्त में बहुत प्रसिद्ध हैं। मोतीझरा (सन्निपात ज्वर) पर अच्छा लाभ करती हैं। सन्निपात आदि में अनुपान रूप से दशमूल का काढ़ा विशेष लाभदायक है। -- यो० चि०
(१३) नारायण तेल -- ३.७३ किलो तेल को लोहे की बड़ी कड़ाही में डालकर खूब औंटाएँ। कच्चा रहने से उफान का भय रहता है। फिर तेल का संस्कार करें। बाद में कूठ, इलायची, रक्तचन्दन, छारछरीला (शैलेय), वच, जटामांसी, सेंधा नमक, असगन्ध, खरेंटी, रास्ना, सौंफ, देवदारु, शालपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी और तगर -- इन १७ दवाओं का प्रत्येक ४६.४ ग्राम लेकर जल के साथ कल्क बना लें। इस कल्क को १५ किलो पानी में मिलाकर तेल में डालकर पकाएँ। पानी जल जाने पर १५ किलो दूध और ३.७३ किलो शतावरी का रस डालकर फिर पकाएँ। गोखरू, अतिबला, नीम की छाल, अरणी, पुनर्नवा, प्रसारणी, सोनापाठा, असगन्ध, खरेटी (बला), बेल की छाल, पाढ़ल (पाटला), छोटी कटेली और बड़ी कटेली -- इन १३ दवाओं का प्रत्येक ४६७ ग्राम लेकर ६० किलो पानी डालकर औंटाएँ। १५ किलो जल शेष रहने पर छानकर उपरोक्त तेल में डालकर पकाएँ। आखिर में जब तेलमात्र शेष रह जाय, तब गर्म-गर्म तेल को मोटे कपड़े से छानकर रख लें। जब तेल का सब पानी जल जाता है, तब तेल के कल्क को अग्नि में डालने से शब्द नहीं करता। दूसरे, अँगुलियों से मलने पर बत्ती-सा हो जाय, तो समझें कि तैल तैयार हो गया है। यह 'नारायण तेल' बहुत काम की चीज है। वातव्याधि में इसकी मालिश से बहुत ही बढ़िया फल होता है। शरीर का सूखना, पक्षाघात (लकवा), फालिज, गठिया, सम्पूर्ण शरीर का दर्द आदि ८० प्रकार के वात-रोगों में कोई भी वात-रोग हो, इसकी मालिश से निश्चय फायदा होता है। हमारा बहुत बार का परीक्षित है। इसकी १० से २० बूंद खायी भी जाती है। -- भा० प्र०
(१४) विष तैल -- ९३३ ग्राम सरसों के तेल को खूब औंटाकर ठण्डा करें। रसकपूर, अजवायन, जावित्री, अफीम, मदार की जड़ की छाल, कनेर की जड़ की छाल, गुंजा, तेलिया मीठा विष, कुचला, धतूरे का फल, कायफल, लहसुन, रेंडी की जड़ की छाल और तम्बाकू -- इन १४ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर जल के संयोग से कल्क बनाएँ और ९३३ ग्राम धतूरे का रस और मिला दें। इस कल्क को तेल में डालकर पकाएँ। तेल में सब दवा जल जाने पर छानकर बोतल में भर लें। जिस रोगी से चला-फिरा नहीं जाता हो, इसके मर्दन से वह भी ठीक हो जाता है। कठिन वातरोगों की यह उत्तम दवा है।
(१५) संखिया का तेल -- जावित्री, जायफल, लौंग, कालीमिर्च और दालचीनी -- इन ५ दवाओं का प्रत्येक ४६.४ ग्राम लेकर महीन चूर्ण करें। एक आसमानी रंग की आतशी बोतल पर तीन कपरौटी करके उसमें आधा चूर्ण भर दें। बीच में संखिया के तीन तोले का चूर्ण डालकर उसके ऊपर गुग्गुलु और गन्धक ६-६ ग्राम डाल दें। तदुपरान्त शेष चूर्ण भरकर झाड़ू की पतली सींकों से बोतल का मुँह बन्द कर दें और पाताल-यन्त्र की विधि से तेल निकाल लें, जल जैसा तेल निकलेगा। यह तेल बहुत उग्र और तत्काल फल दिखाने वाला है। वात-वेदना में १० बूंद यह तिल के तेल में मिलाकर लगाने से आश्चर्यजनक लाभ होगा। नीम के पत्तों की शलाका (सींक) तेल में डालकर पान में रगड़ दें। उस पान के खाने से दमा में तत्काल लाभ होता है। बराबर खाने से बल की वृद्धि होती है। नपुंसकता में इन्द्रिय का मुँह छोड़कर मालिश करें तथा एक-एक बूंद खाने को दें -- आराम होगा। यह तेल प्रत्येक वैद्य के पास रहना चाहिए। (पंचगुण तैल व वातघ्न लेप के लिए सिद्धयोग संग्रह पृष्ठ ११४ देखें।)
(१६) ४६७ ग्राम सरसों का तेल चूल्हे पर चढ़ाएँ और उसमें धीरे-धीरे २३३ ग्राम कायफल का चूर्ण जला दें। फिर छानकर तेल की मालिश करें और उस जले हुए कायफल की पोटली बनाकर तवे पर गर्म करके सेंक करें। यह गृध्रसी वात के लिए बहुत लाभकारी है।
हारसिंगार (पारिजात) वृक्ष की पत्ती ११६.६४ ग्राम को ९३३ ग्राम जल में पकावें। ४६७ ग्राम पानी रहने पर उतारकर १२१.५० मि.ग्रा. केशर घोटकर मिला दें। २९ ग्राम की मात्रा में दो बार दें। यह गृध्रसी वात की दिव्य दवा है। गृध्रसी (साइटिका) का भयानक दर्द एक सप्ताह में निश्चित रूप से कम हो जाता है, ४० दिन में पूर्ण आरोग्यता होती है। मेरा बहुत अनुभव है।
(१७) कुचले की गोलियाँ -- शुद्ध कुचला ५८ ग्राम और सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला तथा लोबान के फूल -- इन ७ दवाओं के प्रत्येक ११.६६ ग्राम को जल के संयोग से मटर के बराबर गोलियाँ बना लें। यह सब तरह के वात-रोगों में बहुत लाभ पहुँचाती हैं। विशेषकर अग्नि को बहुत प्रबल करती हैं।
(१८) चतुर्मुख रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, अभ्रक भस्म -- ये चारों चीजें प्रत्येक ११.६६ ग्राम और स्वर्ण भस्म ३ ग्राम -- सबको घीक्वार के रस में घोंटकर एरण्ड के पत्तों में लपेटकर ३ दिन धान के ढेर में रक्खें। फिर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। शहद और त्रिफला के पानी के साथ लेने पर सब तरह के वातविकार नष्ट होते हैं। -- भै० र०
(१९) वातगजांकुश -- रससिन्दूर, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, स्वर्णमाक्षिक, शुद्ध हरताल, बड़ी हरड़, काकड़ासिंगी, शुद्ध मीठा विष, सोंठ, मिर्च, पीपल, अरणी और सुहागे का लावा -- इन १३ दवाओं को समभाग लेकर गोरखमुण्डी और निर्गुण्डी के रस में एक-एक दिन खरल करके २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। पीपल का चूर्ण और मंजीठ के काढ़े के अनुपान से लेने पर ये गोलियाँ वातव्याधि में बहुत लाभ पहुँचाती हैं। -- आ० सा० सं०
(२०) बृहद्वातचिन्तामणि रस -- स्वर्ण भस्म १ भाग, रौप्य भस्म २ भाग, अभ्रक भस्म २ भाग, मोती की भस्म या पिष्टी ३ भाग, प्रवाल की भस्म या पिष्टी ३ भाग, लौह भस्म ३ भाग, कस्तूरी १ भाग, अम्बर १ भाग, चन्द्रोदय ७ भाग लेवें। प्रथम चन्द्रोदय को खूब महीन पीसकर उसमें कस्तूरी और अम्बर डालकर ग्वारपाठे के रस में मर्दन करें। जब वे अच्छी तरह मिल जायें तब इसमें अन्य द्रव्यों को मिलाकर एक दिन ग्वारपाठे के रस में मर्दन कर १२१.५० मि.ग्रा. की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर शीशी में भरकर रख लें।
मात्रा और अनुपान -- १ गोली यथावश्यक दिन में तीन-चार बार शहद में मिलाकर चटावें। -- सि० यो० सं०
गुण और उपयोग -- यह रस गृध्रसी, अपतानक, अर्दित, पक्षाघात आदि कठिन वात-रोगों में निश्चित लाभकारी योग है। आक्षेपक, अपतंत्रक (हिस्टीरिया) में जटामांस्यादि क्वाथ से दें। सन्निपात ज्वर में जब प्रलाप, मोह, नाड़ी की क्षीणता, हाथ-पाँव काँपना, पसीना अधिक होकर शरीर का ठण्डा पड़ जाना इत्यादि लक्षण हों तो इसके प्रयोग से लाभ होता है। प्रलापावस्था में तगरादि क्वाथ से दें।
वक्तव्य -- बृहद्वातचिन्तामणि रस का योग भै० र० में भी है, परन्तु उसमें लौह भस्म ३ भाग के बजाय ५ भाग है, चन्द्रोदय के स्थान पर रससिन्दूर है। कस्तूरी और अम्बर ये दोनों उसमें नहीं हैं। अतः उस योग से यह सि० यो० सं० वाला उपरोक्त योग विशेष गुणकारी है।
(२१) योगेन्द्र रस -- रससिन्दूर २३.२ ग्राम, स्वर्ण भस्म, कान्तलौह भस्म, अभ्रक भस्म, मोती भस्म, वंग भस्म प्रत्येक ११.६६ ग्राम -- इन सबको खरल में डालकर ग्वारपाठे के रस में घोंटकर गोला बनाकर एरण्ड के पत्तों में लपेटकर गेहूँ या चावल आदि (धान्यराशि) के ढेर में तीन दिन तक दबाकर रखें। पश्चात् गोला को निकालकर खरल में ग्वारपाठे के रस से घोंटकर १२१.५० मि.ग्रा. की गोलियाँ बनाकर सुखाकर शीशी में भरकर रख लें। सुबह-शाम एक-एक गोली इस दवा को रोगानुसार अनुपान के साथ सेवन करने से अर्दित, पक्षाघात, अपस्मार, उन्माद, अपतन्त्रक, मूर्च्छा, गृध्रसी, दण्डापतानक आदि कठिन वातरोगों में एवं प्रमेह, मूत्राघात, राजयक्ष्मा, स्नायु-दौर्बल्य आदि अनेक रोगों में बहुत उत्तम लाभ करता है। यह रस योगवाही तथा रसायन होने से रस-रक्तादि शारीरिक धातुओं की अभिवृद्धि कर शरीर को हृष्ट-पुष्ट और कान्तियुक्त बना देता है। -- भै० र०