आरोग्य-प्रकाशअपस्मार (मृगीरोग)

अपस्मार (मृगी रोग)

4 मिनट का पाठ

एकाएक चिल्लाकर या इसी तरह चुपचाप मृगी का रोगी बेहोश होकर गिर पड़ता है। रोगी को गिरने का जरा भी ख्याल नहीं रहता। किसी-किसी को मृगी का दौरा होने से पहले इस रोग का पूर्वाभास होता है; जैसे -- सिर घूमना, अँधेरा छा जाना, कान में साँय-साँय होना, सिर में कीड़े रेंगते-से मालूम होना, सिर दर्द आदि। शरीर का काँपना, गर्दन का कड़ा और टेढ़ा होना, आँखों की पुतलियों का नीचे आना या ऊपर चढ़ जाना, हाथ-पैरों का इधर-उधर डालना, पसीना निकलना, मुँह से झाग आना आदि लक्षण मृगी रोग में पाये जाते हैं। मुँह से फेन (झाग) आना मृगी रोग का प्रधान लक्षण है। २०-३० मिनट तक मृगी के वेग से रोगी छटपटाता रहता है। बाद में एकदम शान्त हो जाता है। फिर कुछ समय के बाद रोगी को चेतना प्राप्त होती है। मृगी का रोग पुराना होने पर रोगी को लकवा मार जाता है या रोगी पागल हो जाता है।

हिस्टीरिया और मूर्च्छा-रोग में भी बेहोशी होती है; परन्तु उन रोगों में मुँह से झाग (फेन) आना और शरीर काँपना -- ये दो लक्षण नहीं होते।

चिकित्सा

मूर्च्छा दूर करने के जो उपाय बतलाये हैं, उन उपायों से मूर्च्छा दूर करनी चाहिए। वेग शुरू होते ही दाँतों के बीच कपड़े की गड्डी या कोई नरम चीज -- कार्क आदि बनाकर रख देनी चाहिए, ताकि जीभ कटने का भय न रहे। उन्माद रोग की तरह इस रोग का आराम होना भी महा कठिन है। महापैशाचिक घृत और स्मृतिसागर रस देना चाहिए। इससे वेगों में फायदा होता है यानी दौरे का समय बढ़ जाता है। समय-समय पर निम्नलिखित दवाओं से भी लाभ होता है :--

(१) गाय का घी, दूध, दही, मूत्र और गोबर समभाग घोलकर "पंचगव्य" कहा जाता है। एक-दो वर्ष तक रोज प्रातःकाल ११६.६४ ग्राम पंचगव्य पीने से मृगी में फायदा होता है। पंचगव्य द्वारा दो-तीन रोगी अच्छे हुए हैं।

(२) उन्माद-प्रकरण में लिखा "सारस्वत चूर्ण" और "ब्राह्मी घृत" मृगी रोग में लाभ पहुँचाता है। वच का चूर्ण भी लाभदायक है। अपतन्त्रकारी वटी भी लाभ करती है।

(३) कई उत्तम वैद्यों का ऐसा मत है कि खटमलों को मारकर उनके खून का नस्य लेना मृगी में लाभदायक है।

(४) खर-मूत्र का प्रयोग भी लाभ करता है।

(५) अश्वगन्धारिष्ट -- असगन्ध २.९२ किलो, मूसली १.२ किलो, मजीठ, बड़ी हरड़, हल्दी, दारूहल्दी, मुलेठी, रास्ना, विदारीकन्द, अर्जुन की छाल, नागरमोथा और निशोथ -- प्रत्येक ५८३.६४ ग्राम, अनन्तमूल, श्यामलता, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, वच और चित्रक -- प्रत्येक ४६७ ग्राम -- इन सबको कूटकर ११९.३६ किलो जल में औटाएँ। जब १५ किलो जल शेष रहे, तब छानकर एक घड़े में भर दें और नीचे लिखी दवाओं को कूट-छानकर उसी में डाल दें।

धाय के फूल ९३३ ग्राम, शहद ११.६७ किलो, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल -- तीनों मिलाकर ११६.६४ ग्राम, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र -- तीनों मिलाकर २३३ ग्राम, फूल प्रियंगु २३३ ग्राम और नागरमोथा ११६.६४ ग्राम।

फिर घड़े के मुँह पर सिकोरा लगाकर कपड़मिट्टी कर दें और एक महीने तक पड़ा रहने दें। इसके बाद छानकर बोतलों में भर दें और २९ ग्राम की मात्रा में रोगी को पिलाएँ। यह अरिष्ट अपस्मार, उन्माद, मूर्च्छा, यक्ष्मा तथा वायु के प्रत्येक रोग में निःसंदेह लाभ पहुँचाता है। -- भै० र० (किंचित् परिवर्तित)

(६) स्मृतिसागर रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरिताल भस्म (अभाव में रसमाणिक्य), शुद्ध मनःशिला, ताम्र भस्म -- प्रत्येक समभाग लेकर वच के क्वाथ की २१ भावना देनी चाहिए। फिर २१ ही भावना ब्राह्मी के क्वाथ की भी दें। इसके बाद मालकांगनी के तेल की भावना देकर १२१.५० मि.ग्रा. की गोली बना लें और पंचगव्य या महापैशाचिक घृत से सुबह-शाम चाटें। यह अपस्मार, मूर्च्छा, उन्माद आदि की बड़ी अच्छी दवा है। -- यो० र०

(७) वातकुलान्तक रस -- सि० यो० सं० पृष्ठ १०७ देखें।

पथ्यापथ्य

पुष्टिकारक भोजन और खुली हवा में व्यायाम करने से मृगी रोग में लाभ होता है। भय, शोक, चिन्ता आदि न करनी चाहिए। रोगी को अकेले नदी, कुआँ, आम सड़क आदि जगहों पर न जाना चाहिए और न घोड़े, साइकिल आदि की ही सवारी करनी चाहिए। अग्नि के पास बैठना, पहाड़ या वृक्ष आदि पर चढ़ना भी मना है।