आरोग्य-प्रकाशअतिसार-दस्त

अतिसार (दस्त)

6 मिनट का पाठ

बिना कांखे (बगैर मरोड़ के) जो पतला दस्त बार-बार होता है, उसी को अतिसार या दस्तों की बीमारी कहते हैं।

रोग होने के कारण

ज्यादा देर से हजम होनेवाली चीजों का खाना, अधिक खाना, जहर मिली हुई वस्तु का खाना, गन्दी और सड़ी चीजों का खाना, दस्तावर दवाइयों का खाना, खराब जल पीना, बरफ का अधिक सेवन, ऋतु परिवर्तन, रात का जागना, हठात् ठण्ड लगना, भय, शोक आदि मानसिक कष्टों का होना, पेट में कीड़ों का होना, ज्यादा मिर्च आदि उत्तेजक चीजें खाना, कब्ज रहना -- इन कारणों से अतिसार होता है।

किसी भी कारण से दस्त होने लगे हों इनके दो ही कारण होते हैं। पहला कारण यह है कि पेट में आंतों के ऊपर कफ की पतली झिल्ली है, जिससे बराबर एक तरह का रस चूता रहता है; उसी रस से भोजन पचता है। भोजन पचते समय ही उस चुए हुए रस को वही झिल्ली फिर सोख लेती है। परन्तु जब किसी कारण से उस झिल्ली की रस शोषण की शक्ति नष्ट हो जाती है, तब पतले दस्त होने लगते हैं। दूसरा कारण है -- अन्न की उत्तेजना के कारण आंतें बहुत जल छोड़ती हैं, जैसे तेज मिर्च खाने से बहुत पानी आता है, ऐसे अनेक कारणवश आंतों से स्राव होता है। शोक, भय आदि मानसिक कारणों से भी पतले दस्त होते हैं।

चिकित्सा

कारण को देखकर चिकित्सा करनी चाहिए। अतिसार के विषय में संसार के सभी वैद्यक शास्त्रों का एक मत है कि ज्यादातर अजीर्ण के कारण ही अतिसार होता है। अजीर्ण की शान्ति लंघन (उपवास) से होती है। इसलिए अतिसार में उपवास ही सर्वोपरि चिकित्सा है। बलवान रोगी को किसी तरह की दवा न देकर लंघन ही कराए जाएँ तो दस्त अपने-आप ठीक हो जाएँगे। अनुभव से भी देखा गया है कि दस्तवाले रोगी को लंघन कराना बहुत उत्तम होता है। बिल्कुल खाली पेट का लंघन भी अच्छा नहीं। दही की लस्सी, भात का माण्ड, अनार या सन्तरे का रस, नारियल का पानी, बार्ली का पानी, नीबू और मिश्री का शरबत, सोडावाटर आदि पेय पथ्य देना चाहिए।

रोगी को उपवास भी इतना ज्यादा न कराया जाय, जिससे कि रोगी बिल्कुल कमजोर हो जाय। जब जोर की भूख लगे, तब दही और भात पथ्य में देना चाहिए। यदि रोगी धैर्यवान और बुद्धिमान हो तो यह रोग बिना किसी दवा के अपने-आप समय पर अच्छा होता जाता है। दवा की आवश्यकता होने पर नीचे लिखी अनुभूत दवाओं का प्रयोग करें -- जरूर फायदा होगा।

(१) सोंठ और जायफल को पानी के संयोग से उत्तम पत्थर पर घिसें। फिर ५८ ग्राम जल में डालकर रोगी को पिलाएँ। इससे पतले दस्त बन्द हो जाएँगे। सोंठ और जायफल दोनों की मात्रा अवस्थानुसार एक ग्राम से तीन ग्राम तक है। यह बालकों के लिए विशेष उपयोगी है।

(२) मोचरस, नागरमोथा, सोंठ, सोनापाठा और धाय के फूल -- इन पांचों दवाओं का चूर्ण ३ ग्राम मट्ठा या जल के साथ लेने से पतले दस्त बन्द हो जाते हैं। (बिल्वादि चूर्ण सि. यो. देखें।)

(३) पूरे अनार को पुटपाक रीति से पका कर रस निकालें। २३.२ ग्राम रस में ११.६६ ग्राम शहद मिलाकर पिलाने से दस्त आराम हो जाते हैं।

(४) जायफल में ३६४ मि.ग्रा. अफीम देकर नीबू में बन्द करके कपड़ा-मिट्टी से लेप कर दें। फिर इसे आग में अच्छी तरह पकाकर अफीम, जायफल सहित रख लें और नीबू फेंक दें। इस जायफल और अफीम की पानी के संयोग से १०-१२ गोलियां बना लें। दो से चार गोली तक इसकी मात्रा है। एक-दो खुराक से ही दस्त बन्द हो जाते हैं।

(५) अतीस का चूर्ण ३ ग्राम शहद के साथ चटाने से दस्त बन्द हो जाते हैं।

(६) कर्पूर रस -- कर्पूर, शुद्ध हिंगुल, नागरमोथा, इन्द्रजौ, जायफल, अफीम और भुना हुआ सुहागा -- इन सब को सम भाग लेकर जल के साथ २४३ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें। अतिसार (दस्त) की यह उत्तम दवा है। ज्वरातिसार में सिद्ध फलदायक है।

(७) सिद्ध प्राणेश्वर -- शुद्ध गन्धक, पारा, अभ्रक भस्म प्रत्येक चार-चार ग्राम, सज्जीखार, जवाखार, सुहागे का लावा, पाँचों नमक, त्रिफला, त्रिकटु, इन्द्रजौ, सफेद जीरा, स्याह जीरा, चित्रक, अजवायन, विडङ्ग और सौंफ -- प्रत्येक एक-एक ग्राम। इन सब को एक जगह करके पानी के संयोग से एक-एक ग्राम की गोलियां बना लें। पान के रस में गोली खा कर ऊपर से गर्म पानी पीएं। यह भयंकर ज्वरातिसार और संग्रहणी की परीक्षित दवा है। (भै. र.)

(८) बेल वृक्ष के जड़ की छाल या बेलफल गिरी तथा आम की गुठली दोनों २३.२ ग्राम का काढ़ा पीने से दस्त में आराम होता है।

(९) मृतसंजीवनी बटी -- पीपल ११.६६ ग्राम, शुद्ध सिंगिया विष ११.६६ ग्राम, हिंगुल २३.२ ग्राम -- इन तीनों दवाओं को खरल में डाल कर जम्बीरी नीबू के रस से घोटें। अच्छी तरह घुट जाने पर ६१ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें। इन गोलियों को ठण्डे जल के साथ खाने से सब तरह के दस्त आराम होते हैं। दस्त के अलावा हैजा, सन्निपात और ज्वरातिसार में बहुत फायदा करता है। (रससार संग्रह)

(१०) श्योनाक (सोनापाठा) की ताजी छाल ९३३ ग्राम को ३.७३ किलो पानी में औंटाएं। ९३३ ग्राम शेष रहने पर छान लें। इसमें ९३३ ग्राम अनार का रस और मिलाकर फिर औंटाएं। जब रस गाढ़ा हो जाय, तब नागरमोथा, जवाखार, विड् नमक, इन्द्रजौ, संचर नमक, सेंधा नमक, धाय के फूल और पीपल -- इन आठ दवाओं (प्रत्येक २३.२ ग्राम) का महीन चूर्ण करके मिला दें। २३३ ग्राम शहद भी मिला दें। इस चटनी को ११.६६ ग्राम की मात्रा में चटाने से पतले दस्त, संग्रहणी, आँव, पेचिश, बवासीर आदि निश्चय ठीक हो जाते हैं। यह चटनी हमारी बहुत बार की परीक्षित है।

(११) गिलोय (गुर्च), पाठा, खश, बेलगिरी, नागरमोथा, नेत्रवाला, सोंठ, पद्माख, लाल चन्दन, कुड़ा की छाल, धनिया, चिरायता और अतीस -- इन १३ दवाओं का काढ़ा पीने से ज्वरातिसार, प्यास, वमन आदि ठीक होते हैं। बुखार के साथ दस्त हो और वमन की इच्छा होती हो तो यह काढ़ा बहुत फायदा करता है।

पथ्यापथ्य

रोटी आदि कठिन वस्तु न खानी चाहिए। दलिया, खिचड़ी, पुराने चावल का भात, मसूर की दाल, बेल का मुरब्बा, दही आदि चीजें देनी चाहिए। बहुत जल्दी हजम होने वाला भोजन बहुत कम मात्रा में कई बार देना चाहिए।