रक्तपित्त
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अधिक व्यायाम, कड़ी धूप में घूमना, अधिक शोक या मैथुन करना, लाल मिर्च आदि तीक्ष्ण चीजों का अधिक खाना, गर्मी का अधिक पड़ना आदि कारणों से पित्त दूषित होकर रक्त को भी दूषित कर देता है। यह दूषित रक्त नाक, मुँह, लिंग, योनि और गुदा आदि द्वारों से निकलने लगता है। इसी का नाम 'रक्तपित्त' है। नाक तथा मुँह से खून गिरने को ऊर्ध्वगामी तथा योनि, लिंग या गुदा द्वारा खून गिरने को अधोगामी रक्तपित्त कहते हैं। कभी-कभी पित्त अत्यन्त दूषित होकर रक्त को शरीर के रोम-रोम से भी बहाने लगता है। इस तरह का रोगी प्रायः असाध्य होकर शीघ्र ही मर जाता है।
रक्तपित्त ऊपर लिखे सभी मार्गों से बहता है; परन्तु नाक से बहने वाला रक्तपित्त अधिकतर देखने में आता है। इसको नकसीर भी कहते हैं। गर्म प्रकृति वाले मनुष्य को गर्मी के मौसम में प्रायः नाक से खून गिरा करता है। खून की कै करने वाले रोगी भी देखे जाते हैं। बहुधा इस बात का निश्चय नहीं होता कि वमन में आया हुआ खून आमाशय (पेट) से आया है या फेफड़ों से? इसकी पहचान यह है कि पेट से आने वाले रक्तपित्त के खून का रंग काला, झागरहित और उसमें भोजन का अंश मिला हुआ होता है। खून की कै होने के पहले जी मिचलाता है और कै करने की इच्छा होती है; परन्तु राजयक्ष्मा रोग में फेफड़े से आने वाले खून का रंग लाल सुर्ख, झागदार और कफ मिला होता है। कै होने के पहले छाती में दर्द और श्वास लेने में तकलीफ होती है। इस तरह दोनों का भेद समझकर चिकित्सा करनी चाहिए। आमाशय में व्रण (अल्सर) होने पर भी मुँह से खून आता है।
चिकित्सा
रक्तपित्त रोग की सर्वोत्तम चिकित्सा यही है कि ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में जुलाब दें और अधोगामी रक्तपित्त में वमन कराएँ, इससे रोग में तुरन्त लाभ होगा। नीचे लिखी दवाओं का सेवन करने से दोनों प्रकार के रक्तपित्त में शीघ्र लाभ होता है:
(१) बासक (अडूसा) की जड़ की छाल को पुटपाक रीति से पकाकर रस निकाल लें। यह रस ११.६६ ग्राम समभाग शहद में मिलाकर रोगी को दिन-रात में ३-४ बार पिलावें। इससे रक्तपित्त में बहुत फायदा होता है। बासक (अडूसा) रक्तपित्त रोग की उत्तम दवा है। इसका स्वरस, काढ़ा, फाण्ट, हिम आदि किसी भी तरह से दिया जाय, शीघ्र लाभ पहुँचाता है।
दूर्वा (दूब) का २९ ग्राम स्वरस भी रक्तपित्त, खूनी बवासीर तथा यक्ष्मा के रक्तस्राव को बन्द करता है। सितोपलादि चूर्ण के अनुपान में यह बहुत लाभ करता है।
(२) कामदुधा रस -- स्वर्णगैरिक (सोनागेरू) के चूर्ण को थोड़े घी में भूनकर आँवले के रस की सात भावना देकर धूप में सुखाकर घोंटकर रख लें। इसकी ७२९ मि.ग्रा. की मात्रा मिश्री, दूब का रस, घी और शहद के साथ देने से अम्लपित्त, रक्तपित्त, रक्तप्रदर, बवासीर, नकसीर, जीर्णज्वर एवं अन्यान्य पित्त-विकार शीघ्र नष्ट होते हैं। (र. यो. सा.)
(३) बोलबद्ध रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, गिलोय सत्त्व -- तीनों ११.६६ ग्राम; हीराबोल (खूनखराबा) ३६.४५ ग्राम -- इन सबको सेमल के रस या छाल के काढ़े में तीन दिन घोंटकर २४३ मि.ग्रा. प्रमाण की वटी बनावें। दो से चार गोली मक्खन, मिश्री, शहद, गुलकन्द आदि रोगानुकूल अनुपानों द्वारा दें। यह रक्तप्रदर, रक्तपित्त, नाक, मुँह, गुदा आदि किसी भी भाग से खून का गिरना, प्रमेह, अम्लपित्त, खूनी बवासीर, भगन्दर तथा अन्यान्य पित्तजन्य विकारों में बहुत आराम करता है। यह रक्तप्रदर की प्रसिद्ध दवा है। (अनुभूत है)
(४) कूष्माण्डखण्ड (कूष्माण्डावलेह) -- बढ़िया सफेद कुम्हड़ा (पेठा) के ऊपर का छिलका उतार दें। फिर कलईदार ताँबे के बर्तन में जल डालकर और उसमें पेठा डालकर औंटाएँ, बाद में उसका रस निचोड़कर थोड़ी देर धूप में सुखाएँ। इस रसरहित गूदे को ४.६७ किलो वजन करके ९३३ ग्राम घी में भूनें। फिर १५ किलो पेठे के रस में ४.६७ किलो चीनी डालकर चाशनी बनाएँ। चाशनी तैयार होने पर नीचे उतारकर उपरोक्त भुना हुआ कुम्हड़ा डाल दें। तदुपरान्त पीपल, सोंठ, जीरा -- प्रत्येक ९३.२ ग्राम; दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपत्ता, काली मिर्च और धनियाँ -- प्रत्येक ४६.४ ग्राम -- इन ७ दवाओं का चूर्ण और ४६७ ग्राम शहद मिला दें। इसी को 'कूष्माण्डखण्ड' कहते हैं। ११ से २३ ग्राम तक की मात्रा बकरी के दूध के अनुपान से सेवन करें। यह रक्तपित्त की बहुत अच्छी दवा है। जिन लोगों को बराबर रक्तपित्त की शिकायत रहती है, उनको इसे सेवन करके देखना चाहिए। यह पुष्टिकारक और बलप्रदायक भी है। (भै. र.)
(५) गुलाब-केवड़ा योग -- गुलाबजल तथा केवड़े का अर्क ११६.६ ग्राम, जल ३५० ग्राम, चीनी ३५० ग्राम, ५ कागजी नीबू का रस और गुड़हल (जपा) की छाल या फूल २९ ग्राम -- इन सब चीजों को बोतल में भरकर अच्छी तरह मुँह बन्द कर ३ दिन पानी में डुबाकर रखें। फिर छानकर दूसरी बोतल में रख लें। यह रक्तपित्त की उत्तम दवा है। इसमें से ११.६६ ग्राम करके दिन-रात में तीन-चार बार पीना चाहिए।
(६) पीली मिट्टी (जिससे बर्तन तैयार होते हैं) सूँघने से नाक से खून गिरना (नकसीर) बन्द हो जाता है।
(७) दूर्वा (दूब घास) का रस पीने व सूँघने से नाक से खून गिरना बन्द हो जाता है। पीने के लिए ११.६६ ग्राम रस में उतना ही शहद मिला देना चाहिए।
(८) आँवले को जल के साथ पीसकर पूरे सिर पर लेप करने से नाक से खून गिरना बन्द हो जाता है। सिर के बाल मुँडाकर लेप करना चाहिए।
(९) सिर को मुँडाकर ताजे गो-घृत की प्रति सप्ताह मालिश करें। इससे नाक से खून गिरना बन्द हो जायगा।
(१०) नारायण तैल की सिर में मालिश करने से भी नकसीर बन्द हो जाती है।
(११) ताजे मक्खन या घी में वंशलोचन १.५ ग्राम और मिश्री २९ ग्राम मिलाकर रोज सुबह चाटें। इससे नाक से खून गिरना बन्द हो जायगा।
(१२) जवासे के पत्तों को जल के साथ घोंटकर पीने से मूत्रमार्ग से खून आना बन्द हो जाता है।
(१३) लाख (लाह) का चूर्ण १ ग्राम शहद के साथ चाटें। इससे खून की कै जरूर बन्द हो जायगी।
पथ्यापथ्य
ठण्डा आहार और विहार लाभदायक है। गाय का ताजा दूध पीना सुन्दर पथ्य है। दूध और दही में बराबर जल और उचित मात्रा में चीनी मिलाकर पीना फायदेमन्द है। रक्त वमन की हालत में बार्ली का पानी, साबूदाना आदि पेय पदार्थों का पथ्य देना चाहिए। पेट पर शीतल जल की पट्टी देनी चाहिए। जौ का सत्तू मिश्री और जल में मिलाकर पीना अच्छा है। धूप में घूमना, कसरत करना, गरम चीजें खाना आदि सर्वथा निषिद्ध है।