अन्यान्य ज्वरों के परीक्षित योग
11 मिनट का पाठ
(१) गिलोय, धनिया, नीम की छाल, पद्माख, लाल चन्दन -- इन पाँचों दवाओं को २३.२ ग्राम वजन में लें और काढ़ा बनाकर पिलाएँ। इसका नाम 'गुडूच्यादि क्वाथ' है। यह सब तरह के बुखार में लाभ पहुँचाता है। इससे जलन, उबकाई, प्यास, कै, अरुचि आदि व्याधियाँ आराम होती हैं।
(२) अमलतास का गूदा, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी, बड़ी हरड़ -- इन पाँचों दवाओं को २३.२ ग्राम लेकर काढ़ा बनाएँ। इसके पीने से पेट साफ हो जाता है, एक-दो दस्त भी हो जाते हैं। पुराना बुखार भी आराम हो जाता है। यदि आँव, पेचिस और बुखार साथ हों तो इससे बहुत फायदा होता है। इसका नाम 'आरग्वधादि क्वाथ' है।
(३) गिलोय, पित्तपापड़ा, चिरायता, कुटकी, अमलतास -- इन पाँचों दवाओं का काढ़ा शहद डालकर पीने से जीर्णज्वर ठीक होता है। जो लोग बार-बार बुखार से सताये जाते हैं, वे इसके सेवन से निश्चय अच्छे हो जायेंगे। इसका सेवन ४० रोज तक करना चाहिए।
(४) हरड़, बहेड़ा, आँवला, हल्दी, दारूहल्दी, कटेली (कण्टकारी), बृहत् कण्टकारी, कचूर (सठी), सोंठ, मिर्च, पीपल, पीपलामूल, मूर्वामूल, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, त्रायमाणा (अभाव में गुलबनफ्शा), नेत्रवाला, नीम की छाल, पुष्करमूल, मुलेठी, कूड़े की छाल (कुटज), अजवायन, इन्द्रजौ, भारङ्गी, सहजन के बीज, आग पर फुलाई फिटकरी, वच, दालचीनी, पद्माख, खश, सफेद चन्दन, अतीस, खरेंटी (बरियार), शालपर्णी, तगर, वायविडंग, चीतामूल (चित्रक), देवदारु, चव्य, पटोलपत्र, जीवक (अभाव में शतावरी), ऋषभक (अभाव में असगन्ध), लौंग, वंशलोचन, कमल, काकोली (अभाव में शकाकुल मिश्री), तेजपत्ता, तालीसपत्र और जावित्री -- इन सब दवाओं को समभाग लेकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण के वजन से आधा चिरायता का चूर्ण मिलाकर अच्छे बरतन में रख दें। इसका नाम 'सुदर्शन चूर्ण' है। यह सब तरह के बुखार में फायदा करता है। ३ ग्राम से ६ ग्राम तक की मात्रा जल के साथ लेनी चाहिए। कब्जियत में गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। जिन लोगों से इसका चूर्ण न फाँका जावे, वे ११.६६ ग्राम चूर्ण का काढ़ा बनाकर या फाण्ट बनाकर ले सकते हैं। जिस तरह श्री भगवान का सुदर्शन चक्र सब दैत्यों को नष्ट करता है, उसी तरह यह सुदर्शन चूर्ण सब तरह के बुखार को नष्ट करता है। पित्त का ज्वर, वायु का ज्वर, कफ का ज्वर, पुराना से पुराना ज्वर, कुनाइन से अटका हुआ ज्वर आदि सब ज्वरों की यह प्रसिद्ध दवा है। धनी आदमियों को तो इसे धर्मार्थ बँटवाना चाहिए।
(५) गिलोय, पीपलामूल, छोटी पीपल, कुटकी, हरड़, सफेद चन्दन, नीम की अन्तर-छाल, लौंग, सोंठ -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम और चिरायता ५२ ग्राम -- इन सबको महीन चूर्ण करके ३ ग्राम से ६ ग्राम तक जल के साथ देने से सब तरह के बुखार में फायदा करता है। विशेषकर जीर्ण ज्वर में यह बहुत लाभकारी है। इसका नाम 'लघु सुदर्शन चूर्ण' है। -- यो० र०
(६) फिटकरी का लावा महीन पीसकर ४८७ से ६०७ मि.ग्रा. (४ से ५ रत्ती) की खुराक में मिश्री मिलाकर जल के साथ देने से कम्प देकर आने वाला बुखार आराम होता है। इससे खाँसी में भी अच्छा फायदा होता है।
(७) हरसिंगार के पत्ते के ११.६६ ग्राम रस में बराबर शहद मिलाकर देने से पुराना बुखार अच्छा हो जाता है। १२१.५ मि.ग्रा. मकरध्वज और मिला दिया जाय तो तत्काल फायदा होता है।
लाक्षादि तैल
मूर्च्छित किया हुआ तिल का तेल ९३३ ग्राम, सौंफ, हल्दी, मूर्वा-मूल, कूठ, रेणुका, कुटकी, मुलेठी (यष्टिमधु), रास्ना, असगन्ध, देवदारु, मोथा, सफेद चन्दन -- इन १२ द्रव्यों को १४.६ ग्राम (१ तोला) लें, उनका कल्क करके तेल में डाल दें। साथ में ३.७३ किलो दही का पानी और ३.७३ किलो पीपल की लाख का काढ़ा डालकर पकावें। जब केवल तेल शेष रह जाय तब छानकर बोतल में भर लें।
(नोट -- ३.७३ किलो पीपल की लाख में १५ किलो पानी और एक पाव सज्जीक्षार डालकर काढ़ा करें और ३.७३ किलो जल बाकी रहने पर तेल में डालें। लाख के साथ सज्जी न मिलाने से लाख का रस ठीक तरह नहीं निकलता है।)
यह जीर्णज्वर, क्षय, कास-श्वास आदि विकारों में बहुत फायदेमन्द है। यह बालकों के सूखा आदि रोगों में बहुत लाभदायक है। -- भै० र०
अमृतारिष्ट
गिलोय और दशमूल प्रत्येक ५.८३ किलो को ६० किलो पानी में औटाएँ। १५ किलो पानी रहने पर छान लें। फिर उसी काढ़े में गुड़ १७.५ किलो (३ तुला), ९३३ ग्राम काला जीरा, ११६.६ ग्राम पित्तपापड़ा, सप्तपर्ण (छतिवन-छाल), सोंठ, मिर्च, पीपल, मोथा, नागकेशर, कुटकी, अतीस और इन्द्रजौ -- ये १२ दवाइयाँ प्रत्येक ५८.३ ग्राम लेकर सबका चूर्ण करके ऊपर वाले काढ़े में मिला दें। फिर सब द्रव्यों को एक पात्र में रखकर मुँह बन्द कर दें। यह एक महीने में तैयार हो जायगा। फिर छानकर बोतल भर लें। इसी का नाम 'अमृतारिष्ट' है। यह भी सुदर्शन चूर्ण की तरह सब बुखार में फायदा करता है। इसकी मात्रा २९ ग्राम से ५८ ग्राम तक है। -- भै० र०
स्वर्णवसन्तमालती
स्वर्णभस्म ११.६६ ग्राम, मोतीपिष्टी २३.२ ग्राम, शुद्ध हिंगुल ३५ ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण ४६.४ ग्राम, खपरिया ९२.८ ग्राम -- इन पाँचों दवाओं को बढ़िया पत्थर के खरल में डालकर बढ़िया ताजा घी से भिगो दें, फिर कागजी नींबू का रस दे-देकर पाँच-सात रोज घोटें। जब दवा से घी की चिकनाहट चली जाय तब इच्छानुसार वजन की टिकिया बना लें। इसी का नाम 'स्वर्णवसन्तमालती' है।
दो छोटी पीपल के चूर्ण और शहद के साथ १२१.५ से २४३ मि.ग्रा. तक इसकी मात्रा दी जाती है। सितोपलादि चूर्ण १ ग्राम के साथ दें। पुराने बुखार में यह जल्दी फायदा करती है। इससे मन्दाग्नि और कमजोरी भी ठीक हो जाती है। वसन्तमालती के बनाने में घी डालने का खूब ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो दवा खराब हो जायगी। दवाओं के चूर्ण में धीरे-धीरे घी इतना मिलाना चाहिए कि रोटी बनाने के जल मिले हुए आटे के समान हो जाय। वर्षा के समय वसन्तमालती बढ़िया नहीं बनती -- इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए। -- भै० र०
लघुमालिनी वसन्त
खपरिया ९२.८ ग्राम, सफेद मिर्च का चूर्ण ४६.८ ग्राम, गाय का मक्खन १४०.६६ ग्राम -- इन तीनों को मिलाकर नींबू के रस में ४ दिन तक घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। शहद, पीपल, दूध के साथ देने से सब प्रकार के ज्वर, खास करके जीर्ण ज्वर में बहुत लाभ होता है। पित्त-विकार, रक्त-विकार, नेत्ररोग आदि भी आराम होते हैं। छोटे बालक और सगर्भा स्त्री के लिए यह श्रेष्ठ दवा है। महाराष्ट्र में इसका बहुत प्रचार है।
जयमंगल रस
शुद्ध (हिंगुलोत्थ) पारा, शुद्ध गन्धक, फुलाया हुआ सुहागा, ताम्र भस्म, वंग भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सेंधा नमक और काली मिर्च -- ये आठों चीजें ११.६६ ग्राम; स्वर्ण भस्म २३.२ ग्राम, कान्त लौह भस्म ११.६६ ग्राम और चाँदी भस्म ११.६६ ग्राम -- इन सब दवाओं को खरल में डालकर धतूरे के पत्ते का रस, हरसिंगार के पत्ते का रस, दशमूल का काढ़ा और चिरायते के काढ़े की तीन-तीन भावना देकर इनकी २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें और जीरे का चूर्ण तथा शहद के साथ दें। इससे पुराने से पुराना बुखार निश्चय अच्छा होता है। यह बल और पुष्टि बढ़ाने में भी उत्कृष्ट औषध है। जो बुखार अन्य दवा से अच्छा न होता हो वह इससे जरूर अच्छा हो जाता है। -- भै० र०
बृहत् सर्वज्वरहर लौह
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सोना भस्म, चाँदी भस्म और शुद्ध हरिताल -- ये आठ द्रव्य प्रत्येक ११.६६ ग्राम तथा कान्त लौह भस्म ४६.४ ग्राम -- सबको एकत्र कर करेले के पत्ते का रस, दशमूल का काढ़ा, पित्तपापड़ा का काढ़ा, त्रिफला का काढ़ा, गिलोय का रस, काकमाची का रस, सम्भालू (निर्गुण्डी) के पत्ते का रस, पुनर्नवा का रस और अदरक का रस -- इन चीजों की प्रत्येक की सात-सात भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसे पुराना गुड़ और पीपल के साथ सेवन करें। यह सब तरह के ज्वर की रामबाण दवा है। किसी तरह का ज्वर हो इससे अवश्य लाभ होता है। यकृत और प्लीहा भी ठीक होती हैं। -- भै० र०
पुटपक्व विषमज्वरान्तक लौह
शुद्ध हिंगुलोत्थ पारा और गन्धक ११.६६ ग्राम की कज्जली करके पर्पटी की तरह बना लें और सोना भस्म ३ ग्राम; लौह भस्म, अभ्रक भस्म तथा ताम्र भस्म प्रत्येक २३.२ ग्राम; वंग भस्म, गेरू मिट्टी, प्रवाल भस्म प्रत्येक ५.८३ ग्राम; मोती भस्म, शंख भस्म, सीप भस्म प्रत्येक तीन-तीन ग्राम। ये सब द्रव्य पानी में घोटकर सीप में बंद कर कपड़-मिट्टी का लेप करके सुखा लें। फिर ८-१० उपलों की आग में रखकर पुट दें।
इसकी मात्रा २४३ मि.ग्रा. तथा अनुपान -- पीपल का चूर्ण, हींग और सेंधा नमक है। इसके सेवन से सब प्रकार का ज्वर, पाण्डु, यकृत, प्लीहा, प्रमेह, संग्रहणी आदि रोग आराम होते हैं। यह पुराने और बराबर आने वाले ज्वर की उत्कृष्ट दवा है। -- भै० र०
कल्पतरु रस
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, शुद्ध मैनसिल, शुद्ध रौप्यमाक्षिक (विमल) और फुलाया हुआ सुहागा -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, सोंठ २३.२ ग्राम, पीपल २३.२ ग्राम, काली मिर्च १४० ग्राम -- सबका बारीक चूर्ण लेकर घोंटकर कपड़छान करके शीशी में रख दें। इसका नाम 'कल्पतरु रस' है। इसकी मात्रा १२१.५ मि.ग्रा. है, अदरक के रस के साथ दोनों समय लें। यह वात और कफ ज्वर के लिए बहुत उत्तम दवा है। सर्दी, मूर्च्छा में इसका नस्य भी दिया जाता है।
त्रिभुवनकीर्ति रस
शुद्ध हिंगुल, शुद्ध वत्सनाभ, सोंठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, अग्नि पर फुलाया हुआ सुहागा और पीपलामूल -- इन सात दवाओं को समभाग लेकर महीन कपड़छान कर चूर्ण को अदरक का रस, तुलसी का रस और धतूरे की पत्ती का रस -- प्रत्येक की तीन-तीन भावना देकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यदि इसमें तीन भावना कागजी नींबू के रस की दें तो विशेष लाभदायक होता है। इसका नाम 'त्रिभुवनकीर्ति रस' है।
यह नये बुखार में खास करके वात और कफ के विकार (इन्फ्लुएंजा) में विशेष फायदा करता है। अदरक के रस और मधु के साथ अथवा तुलसी का रस या बिल्वपत्र के फाण्ट के साथ सुबह-शाम और रात्रि में तीन बार देने से पसीना आकर बुखार उतर जाता है। दो-तीन दिन तक त्रिभुवनकीर्ति रस के देने से भी बुखार न उतरे, तो उसे मियादी बुखार समझना चाहिए। उस हालत में मियादी बुखार का ही इलाज करना चाहिए। लक्ष्मीविलास (नारदीय) भी बहुत लाभ करता है। -- यो० र०
चन्दनादि लौह
लाल चन्दन, सुगन्धवाला, पाठा, खश, पिप्पली, बड़ी हरड़, सोंठ, नीलोत्पल, आँवला, वायविडंग, नागरमोथा और चित्रक -- ये १२ दवाइयाँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम और लौह भस्म १४० ग्राम लें। सब मिलाकर जल के साथ खरल में घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसे शहद के साथ चाटने से सब तरह के बुखार अच्छे होते हैं। खास करके पुराने मन्द-ज्वर जिसमें रक्ताल्पता हो, इस दवा से बहुत लाभ होता है। यह चढ़े हुए बुखार को कम करता है। यक्ष्मा-ज्वर में भी यह लाभदायक है।
ज्वरसंहार रस
सोंठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, कुटकी, नीम की अन्तर-छाल, कूठ, नागरमोथा, पीली सरसों, इन्द्रजौ, आग पर फुलाया हुआ सुहागा, लाल चन्दन, अतीस और ममीरी (ममीरी न मिले तो काली जीरी यानी अरण्यजीरक डालें) -- ये १३ द्रव्य समभाग लेकर महीन चूर्ण कर लें। इस चूर्ण का जितना वजन हो उससे आधा रससिन्दूर या शुद्ध हिंगुल बारीक पीसकर इसमें मिला दें। फिर अदरक, तुलसी और निर्गुण्डी के रस की तीन-तीन भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें या सुखाकर चूर्ण कर लें और बोतल में भर लें। इसका नाम 'ज्वरसंहार रस' है।
यह सब प्रकार के बुखारों की प्रसिद्ध दवा है। मधु के साथ अथवा एक ग्राम गोदन्ती भस्म या किसी भी ज्वरनाशक कषाय के साथ देने से बहुत जल्दी लाभ करता है। यह तरुण और जीर्ण दोनों प्रकार के ज्वर में लाभकारी है। गोजिह्वादि क्वाथ के साथ देने से कफज्वर में कफ को पकाकर ज्वर शीघ्र उतार देता है तथा सर्दी-खाँसी भी अच्छी हो जाती है। निमोनिया में यह २४३ से ७२९ मि.ग्रा. और अभ्रक भस्म १२१.५ मि.ग्रा. दोनों को मिलाकर देने से विशेष लाभ होता है। -- सि० यो० सं०
संशमनी वटी
मोटी-ताजी और हरी गिलोय लाकर उसको जल से अच्छी तरह धो लें, पीछे चार-चार अंगुल के टुकड़े करके कूट लें। इसको चौगुने पानी में डालकर स्वच्छ लोहे की कड़ाही में या स्वच्छ कलईदार पीतल के बर्तन में क्वाथ करें। चतुर्थांश शेष रहने पर गाढ़े कपड़े से छान लें। फिर छाने हुए क्वाथ को मन्दाग्नि से तब तक पकाते रहें जब तक रस गाढ़ा सीरे (हलवा) जैसा न हो जाय। फिर उसको अग्नि से उतारकर ठण्डा कर लें और २४३ मि.ग्रा. की गोली बना लें। इसी का नाम 'संशमनी वटी' है।
५ से २० गोली दिन-रात में चार-पाँच बार जल से दें। यह सब प्रकार के ज्वरों की अत्यन्त लाभकारी औषध है। जीर्ण ज्वर, राजयक्ष्मा, रक्ताल्पता (पाण्डु), मन्दाग्नि, दौर्बल्य, प्रमेह और श्वेतप्रदर में बहुत उत्तम फल दिखाती है। यह बलकारक और रसायन गुणयुक्त है।
गिलोय घन सत्त्व ११६.६ ग्राम, लौह भस्म ११.६६ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम और स्वर्णमाक्षिक भस्म ६ ग्राम मिलाकर भी संशमनी वटी तैयार होती है। इसका गुजरात में बहुत प्रचार है। -- सि० यो० सं०