आरोग्य-प्रकाशस्त्री-स्वास्थ्य

स्त्री स्वास्थ्य

21 मिनट का पाठ

यों तो सभी स्वास्थ्य-नियम स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी एवं पालनीय हैं। आयुर्वेदोक्त 'त्रय उपस्तंभा:'-- आहार, विश्राम और ब्रह्मचर्य का सिद्धान्त दोनों पर एक समान लागू होता है; तथापि स्त्री-पुरुष में प्रकृति ने ही जो भिन्नता और विशिष्टता रक्खी है; उसको ध्यान में रखते हुए स्त्री-स्वास्थ्य विषय में कुछ बातें अलग से विचारणीय हैं।

स्त्री-पुरुष की शरीर रचना में यह प्राकृतिक भेद है कि स्त्रियों के शरीर में गर्भाशय और स्तनदुग्ध-ग्रन्थियां विशेष होती हैं, जो पुरुष के शरीर में नहीं होती।

मनुष्य जरायुज प्राणी है। अण्डज प्राणियों में तो संतति की रक्षा और पालन-पोषण नर-मादा मिलकर करते हैं; परन्तु जरायुज जीवों की यह विशेषता है कि उनमें गर्भधारण से लेकर संतति के जन्म, दुग्धपान और पालन-पोषण आदि का भार केवल स्त्री ही वहन करती है। पुरुष उसमें सक्रिय कुछ नहीं करता। इस प्रकार मानवों में स्त्री और पुरुष का कार्य विभाजन भी प्राकृतिक रूप से है।

ऐसी स्थिति में स्त्री-पुरुष दोनों के लिये समान नियम-व्यवहार रखना अनुचित है। आजकल आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से हमारे देश में नारी को समानाधिकार देने के नाम पर स्त्री-पुरुषों के लिये जो एक जैसे नियम लागू किये जा रहे हैं और स्त्रियों को सेना, सरकारी दफ्तरों और अन्य श्रम आदि आफिसों में भरती किया जाता है, यह प्राकृतिक नियम के प्रतिकूल है। रहन-सहन, पहनावा, खेल-कूद व्यायाम, राजनीति, इत्यादि सबमें पुरुषों के समान ही स्त्रियों का अनुकरण स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी नहीं, प्रत्युत वह स्त्री की स्वाभाविक सुकुमारता पर आघात करने वाला और विकृत करने वाला है।

हमारा कदापि यह दृष्टिकोण नहीं कि भारतीय स्त्री समाज अशिक्षित, पिछड़ा हुआ, रूढ़िग्रस्त और किसी भी प्रकार पुरुष से निम्न दर्जे का बना रहे-ऐसा होना तो अभिशाप है। परन्तु स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक अन्तर की अवहेलना करना भी श्रेयस्कर नहीं। भारत में प्राचीन काल से पुरुष के लिए कठिन परिश्रम के कार्य, अर्थोपार्जन, घर के बाहर के सम्पूर्ण काम करना एवं स्त्री के लिए कोमल कार्य, शिशुओं का लालन-पालन, गृहस्थी की व्यवस्था, परिवार का स्वास्थ्यरक्षण आदि कार्य निर्धारित हैं।

यह एक प्रकार का समानाधिकारिक कार्य - विभाजन अपने आप में महत्वपूर्ण है और स्त्री-पुरुष दोनों के स्तर को गौरवपूर्ण बनाने वाला है, प्राकृतिक नियमों के आधार पर बनी हमारी इस प्राचीन परिवार व्यवस्था में मध्यकालीन युग में जो दोष आये हैं, उन्हें अवश्य दूर किया जाना चाहिए। हिन्दुओं में मुस्लिम संस्कृति की भाँति कठिन पर्दा और स्त्रियों को सदा घर के भीतर बन्द रखने की कुप्रथा अहितकर है।

पर्दा प्रथा के कारण बहुधा जो स्त्रियाँ निरन्तर घर की चारदीवारी में बन्द रहती है, उनको यक्ष्मा, चर्मरोग आदि रोगों का शिकार होना पड़ता है। इसलिए कठिन पर्दा और स्त्रियों के प्रति अन्य जो सामाजिक दुर्व्यवहार है, उनमें सुधार की निश्चित आवश्यकता है।

प्रगतिशील युग में स्त्री-शिक्षा नितान्त वांछनीय है; परन्तु आधुनिक शिक्षा की विषय- बहुलता जो अनावश्यक पाठ्यपुस्तकों के भार से बालकों के मस्तिष्क को भी थकित और कुंठित कर देती है, वह बालिकाओं के कोमल मस्तिष्क के लिए तो कदापि ही श्रेयस्कर नहीं। बालक-बालिकाओं की उच्च श्रेणी में सहशिक्षा दोनों के लिए अत्यन्त हानिकर है। १० वर्ष की उम्र तक बालक-बालिकायें साथ-साथ पढ़े तो कोई दोष नहीं है।

भारत में १२-१३ वर्ष की आयु में ही दोनों के स्नायु-मण्डल में सहज उत्तेजना आ जाती हैं, जो उनके स्वच्छन्द रूप से निकट रहने में मनोविकारों को प्रोत्साहन देता है। इसलिए बालक-बालिकाओं की उच्च शिक्षा का पृथक-पृथक स्वतन्त्र ही प्रबन्ध होना चाहिए। स्वस्थ चरित्र और उच्च नैतिक स्तर के निर्माण हेतु शिक्षाप्रणाली में यह सुधार होना वांछनीय है।

बालकों के फुटबॉल, हाकी आदि खेल और दण्ड-बैठक, कुश्ती आदि व्यायाम बालिकाओं के लिए उपयोगी न होकर हानिकारक होते हैं और उनमें शारीरिक विकृति उत्पन्न करते हैं। इसलिए शरीर रचना के अनुकूल बालिकाओं के खेल और व्यायाम भी कोमल होने चाहिए। इसी प्रकार बालिकाओं के शिक्षा का विषय उनके अनुरूप होना चाहिए। बालिकाओं को मुख्यतः पाक विज्ञान, गृह-अर्थशास्त्र, शिशु-मनोविज्ञान स्वास्थ्य विज्ञान, गार्हस्थ कलाएँ, रोगी-परिचर्या, संगीत और प्राथमिक शिक्षा-विज्ञान-इन, विषयों का ही शिक्षण दिया जाना चाहिए, जिनमें कि वे स्वाभाविक रूप से अधिक सफल हो सकती हैं और यह विषय उनके जीवन में काम भी आते हैं। कन्याओं को उच्चशिक्षा, नर्सिंग, गृहविज्ञान, मनोविज्ञान और अध्यापन विषयों की शिक्षा देना उचित है।

प्रकृति ने स्त्री-शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि वह पुरुष की अपेक्षा तन-मन और स्वभाव से अधिक कोमल, ममतामयी, सहिष्णु, सेवाभावी, संकोचशील और दयालु होती है। स्त्री का स्नायु मण्डल पुरुष की अपेक्षा सहज सुकुमार और अल्पशक्ति वाला होता है। अतएव स्त्री की शिक्षा, कार्य और व्यवहार में इस प्राकृतिक सुकुमारता का ध्यान रखकर नियम-व्यवहार रखना चाहिये।

यौन-विकास

पश्चिम के शीतप्रधान देशों में तो १७-१८ वर्ष की आयु तक भी बालिकाओं में यौवन के चिन्ह प्रकट नहीं होते। परन्तु भारतवर्ष उष्ण जलवायु का देश है, इसलिए यहाँ १०-११ वर्ष की आयु में ही बालिकाओं में योवन-विकास प्रारम्भ हो जाता है। १३-१४ वर्ष की अवस्था में हमारे यहां लड़कियां रजस्वला होने लगती है। अत्यल्प अनुपात में ऐसे भी उदाहरण हो सकते हैं कि जब कि लड़की का यौन विकास १५-१६ वर्ष तक न हुआ हो।

यदि किसी लड़की में जल्दी यौन विकास होता है अथवा देर से होता है तो ये दोनों ही स्थितियाँ चिन्ता का कारण नहीं है क्योंकि योवन - विकास आयु मात्र पर ही निर्भर नहीं प्रत्युत शरीरस्थ ग्रन्थियों की कार्यशीलता पर निर्भर करता है। यौन-विकास काल में कभी-कभी पहले एक स्तन बढ़ता है, फिर कुछ महीनों बाद दूसरा बढ़ता है - - यह बात भी चिन्ता का कारण नहीं है।

यौन विकास आरम्भ होने के डेढ़-दो साल के भीतर लड़की रजस्वला होती है। किसी-किसी लड़की को प्रारंभिक पहले और दूसरे वर्ष मासिकधर्म अनियमित और बार-बार होता है, विवाहोपरान्त मासिकधर्म में ऐसी गड़बड़ी तो दोषपूर्ण होती है, परन्तु विवाह के पूर्व हुये मासिकधर्म के प्रारंभिक रूप में ऐसा होने को रोग का कारण नहीं समझना चाहिए।

मासिक-धर्म

प्रत्येक वयस्क स्त्री के योनिमार्ग से प्रतिमास जो रक्त का स्राव होता है उसे "मासिक-धर्म" कहते हैं। इसमें बीरबहूटी के रंग जैसा गहरे लाल रंग का रक्त निकलता है जिसका वस्त्र पर लगा दाग धोने से छूट जाता है। इसके निकलने में दाह, वेदना हो अथवा बहुत कम या बहुत अधिक रक्त निकले तो रोग का कारण समझना चाहिए। २७ दिन के पहले या बाद में देर से मासिकधर्म होना भी सामान्य रोग का चिन्ह है। तीन चार दिन से अधिक मासिक रक्त निकलना भी विकार का सूचक है। रक्त के साथ लोथड़े निकलें उसका रंग पीलापन लिये हो अथवा उसमें दुर्गन्ध आता हो तो उसे विकार समझकर उसकी चिकित्सा करनी चाहिए।

मासिक-धर्म का रक्त प्रायः तीन दिन तक निकलता है। आर्तव दर्शन के दिन से लेकर सोलह दिन तक अथवा आर्तवानन्तर स्नान के पश्चात् बारह दिन तक स्त्री गर्भधारण करने योग्य रहती है।

रजोदर्शन से लेकर तीन दिन तक स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिए। इन दिनों में स्नान, शृंगार और किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक परिश्रम नहीं करना चाहिए। एकान्त स्थान में मुलायम आसन पर प्रायः लेटे ही रहना चाहिए। दिन में सोना नहीं चाहिए। आर्तव बन्द होने पर चौथे दिन स्त्री को सिर धोकर स्नान करना चाहिए।

मासिक-धर्म के दिनों में प्रायः स्त्रियाँ गन्दे कपड़े पहने रहती है और गन्दे कपड़े की तह योनि मार्ग पर बाँधती हैं। कोई-कोई तो कपड़ों की तह करके योनिमुख में भर लेती हैं। यह अत्यन्त खराब बात है। गन्दे कपड़े के कीटाणु योनि में प्रवेश कर भयंकर रोग का कारण बन जाते हैं, सेप्टिक (विषोत्पत्ति) का भी भय रहता है क्योंकि मासिक-धर्म में गर्भाशय की अन्त कला विदीर्ण होती है। इसलिए मासिक-धर्म में बहुत साफ-सुथरा कपड़ा पानी में उबालकर प्रयोग करना चाहिए। शहरों में इसके लिए 'सेनिटरी टावल्स' मिलते हैं, उनका उपयोग उचित है।

गर्भावस्था

गर्भावस्था स्त्री-जीवन का सबसे विषमकाल है। गर्भ का सम्बन्ध केवल माता से होता है, अतएव गर्भस्थ शिशु का उत्तम निर्माण गर्भिणी के स्वास्थ्य की उत्तम स्थिति पर ही निर्भर करता है। गर्भस्थ बच्चे का सम्पूर्ण निर्माण स्त्री की ही रस धातुओं से होता है और वह गर्भिणी की खुराक से ही अपनी खुराक लेता है। इसलिए सबसे आवश्यक बात यह है कि गर्भिणी स्त्री को विशेष रूप से पौष्टिक आहार मिलना चाहिए।

आयुर्वेद में कहा है कि प्रथम मास से ही गर्भिणी स्त्री को भोजन में दोनों समय दूध (ठंडा करके) अवश्य पीना चाहिए। भोजन में शरीर और पाचन शक्ति के अनुकूल मधुर और पौष्टिक द्रव्य अधिक ग्रहण करना चाहिए। गर्भिणी को द्रव (पतले) पदार्थ लेना अधिक श्रेयस्कर है।

गर्भिणी को उबटन और तेल मालिश नहीं करना चाहिये। मद्य और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए। मैथुन नहीं करना चाहिए। वातकारक (बादी करने वाली) वस्तुएँ नहीं खाना चाहिए। गर्भावस्था में अधिक वातकारक चीजें खाने से गर्भ में जड़ता, बहरापन, गूंगापन, कुबड़ापन, अंगभंगता आदि विकार उत्पन्न होते हैं।

तीसरे मास से छठवें मास तक के काल में गर्भवती को दौहृदा कहा गया है। अर्थात् इस काल में गर्भिणी के दो हृदय हो जाते हैं। एक तो स्वयं उसका और दूसरा गर्भस्थ शिशु का। ऐसी स्थिति में गर्भिणी को नाना प्रकार की इच्छाएं होने लगती हैं। कभी-कभी वह विचित्र और असम्बद्ध इच्छाएँ करती हैं। इस काल में गर्भिणों की इच्छाओं का बलात् दमन कदापि नहीं होना चाहिए।

इच्छा पूर्ण न होने पर गर्भिणी को जो मानसिक आघात पहुँचता है उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी बुरा पड़ता है। दौहृद काल में गर्भिणी की सभी इच्छाओं को हितकर साधनों द्वारा पूरा करना चाहिए। उसकी जो कुछ खाने की इच्छा हो वह उसे अवश्य खिलाना चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को सीधा (चित) नहीं लेटना चाहिए; दस्तावर दवा नहीं लेनी चाहिये। किसी प्रकार का कठिन परिश्रम का कार्य या व्यायाम कदापि नहीं करना चाहिये।

गर्भावस्था में कुएँ से पानी भरना, बोझ उठाना, बार-बार जीने पर चढ़ना, चक्की पीसना, अधिक पैदल चलना आदि गर्भ को हानि पहुंचाते हैं। श्रमिक कार्य करनेवाली स्त्री को गर्भावस्था काल में पूर्ण अवकाश मिलना चाहिये। यह नियम नागरिक महिला के लिये है। श्रमकारी जाति के लिये श्रम करना निषेध नहीं है।

गर्भिणी स्त्री को सर्वकाल शांत वातावरण में रहना चाहिए। घरके सभी लोगों का व्यवहार गर्भिणी के प्रति अत्यन्त उदार और स्नेहपूर्ण होना चाहिये। घरेलू झगड़ों से शोकग्रस्त रहनेवाली, चिन्तित और दुःखी गर्भिणी के गर्भ में कमजोर, विकलांग, मूर्ख और अल्पायु सन्तान उत्पन्न होती है।

निश्चित है कि गर्भावस्था के दिनों में स्त्री को अधिकाधिक विश्राम मिलना चाहिये। परन्तु इन दिनों अधिक सोना विशेषतः दिन में सोना गर्भ पर हानिकर प्रभाव करता है। जिस घर में गर्भिणी स्त्री रहे, वह स्वच्छ और खूब हवादार होना चाहिए। गर्भिणी के वस्त्रादि भी साफ-सुथरे होने चाहिये और घर में सदा ऐसा वातावरण रहना चाहिये कि जिससे गर्भिणी का मन प्रसन्न और सन्तुष्ट रहे।

प्रजनन

गर्भ के नौ महीने पूर्ण होने पर प्रजनन होता है। अज्ञानतावश हमारे देश में प्रजनन की असावधानियों से स्त्रियाँ बहुत रोगग्रस्त होती हैं। प्रतिवर्ष हजारों स्त्रियां या तो प्रसवकाल में ही मर जाती हैं या किसी भयंकर प्रसूति रोग से जीवन पर्यन्त ग्रस्त रहती हैं।

वस्तुतः प्रजनन एक नैसर्गिक क्रिया है। यदि आहार-विहार में विशेषकर गर्भावस्था में प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन न हो तो प्रजनन क्रिया भी नैसर्गिक रूप से बिना कष्ट के स्वाभाविक ही सम्पन्न होती है। इस विषय में नैसर्गिक जीवन बितानेवाली आदिवासियों और किसानों की परिश्रमशील स्त्रियों का उदाहरण ध्यान देने योग्य है। वे प्रायः प्रथम प्रसव में भी चलते-फिरते और काम करते-करते बिना किसी की सहायता के जंगल में ही बच्चा जन देती है और दूसरे दिन फिर ज्यों के त्यों काम करने लगती हैं।

उन्हें कभी कोई गर्भाशयिक प्रसूति रोग होते प्रायः नहीं देखा गया। इसका मुख्य कारण यही है कि उनका जीवन परिश्रमपूर्ण होता है। नैसर्गिक आहार-विहार होने से उनका परिपुष्ट गर्भ उचित समय पर निसर्ग द्वारा ही सहजरूपेण गर्भाशय से पृथक् हो जाता है।

परन्तु आजकल विशेषकर शहरी क्षेत्र में स्त्रियां अपना घरेलू काम-काज का आवश्यक परिश्रम भी नहीं करती और आहार-विहार में अनियमित रहती है। इसी कारण उनका प्रसव भी कष्टकर और कठिनाई पूर्वक होता है। यदि सामान्य जीवन में वे अपने घर का काम-काज अपने हाथों से करके उचित परिश्रम करती रहे और गर्भावस्था में पौष्टिक आहार, शुद्ध जलवायु और पर्याप्त विश्राम का सेवन करें तो उन्हें भी न तो प्रसव कष्ट उठाना पड़े और न किसी प्रसूति रोग का शिकार होना पड़े। प्रथम प्रसव में सामान्यतः अधिक कष्ट होता है।

प्रसव-सम्बन्धी अज्ञानताओं के कारण हमारे देश में बहुत शिशुओं और माताओं की मृत्यु होती है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में अप्रशिक्षित, अयोग्य और अकुशल दाइयाँ अनेक प्रकार के प्रसव में हस्तक्षेप और जल्दबाजी करके प्रसूता और शिशु को बड़ी हानि पहुँचाती है। सबसे बड़ा दोष यह है कि प्रसव में गन्दे स्थान, गन्दे वस्त्र, गन्दे पात्रादि और गन्दे हाथों से काम लिया जाता है। प्रसव एक प्रकार का शल्यकर्म है जिसमें गर्भाशय और योनिमार्ग में घाव हो जाता है।

यह सामान्य नियम है कि किसी भी घाव में यदि कोई गंदगी के कीटाणु प्रवेश पा जाते हैं तो भयंकर विकृति उत्पन्न करते हैं। गाँव की दाइयाँ बहुधा गंदी रहती हैं, गंदे हाथों को बिना धोये ही सब काम करती हैं और उस्तरा, आदि गंदे औजारों से ही बच्चे का नारा (नाल-नाडी) काटती है। चाकू या उस्तरा को पानी में रखकर उबाल लेना, साफ कृमिरहित रुई या वस्त्र से काम लेना, लाल साबुन से हाथ धोकर प्रजनन सम्बन्धी कार्य करना चाहिए।

गंदे कपड़े से ही प्रसूता के गर्भस्थल को पोंछती हैं। प्रसूति स्थल तो गंदा होता ही है, वहाँ की हवा एकदम बन्द कर दी जाती हैं, इन सबका यह परिणाम होता है कि स्त्रियां रक्त प्रदर और प्रसूतिज्वर आदि रोगों से सदा के लिए पीड़ित हो जाती है।

शहरों में आधुनिक ढंग से बने प्रसूतिगृह भी सर्वथा निरापद नहीं। स्वच्छता का प्रबन्ध तो इनमें रहता है, परन्तु प्रसूता की परिचर्या उचित ढंग से नहीं होती। प्रसूति के कमरे में चारों ओर खुली खिड़कियाँ होती हैं, जिनसे सीधी और तीखी (तेज) हवा प्रसूता के स्वास्थ्य पर स्थायी घातक प्रभाव करती है। शहरी प्रसूतिगृह में प्रसव के तत्काल उपरान्त अनावश्यक दवाओं का सेवन प्रारम्भ कर दिया जाता है और आहार का संयम नहीं रखा जाता जो निश्चित हानिकर होता है।

प्रजनन के सम्बन्ध में प्राचीन भारतीय परम्पराएँ और आयुर्वेदीय नियम ध्यान देने योग्य है। प्रजनन के लिए प्रसूति गृह बहुत साफ होना चाहिए जिसमें मिट्टी, धूल या बालू के कण न हों। उसकी बनावट ऐसी हो कि वह शीत, वर्षा और ग्रीष्म सब ऋतुओं में निवास योग्य हो। गृह का मुख्य द्वार उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए जिससे सूर्य का प्रकाश उसमें आ सके।

सभी आवश्यक वस्तुएँ प्रसूति गृह में रहना चाहिए। अग्नि और जल निरन्तर रहना चाहिए। प्रसूता के लिए पलंग, बिछौने, ओढ़ने और पहनने के कपड़े बहुत स्वच्छ होना चाहिए। प्रसूति कार्य में उपयुक्त पात्र और वस्त्र भी धुले हुए होना चाहिए। प्रसूता की परिचर्या में लगने वाली दाई और अन्य स्त्रियाँ भी साफ कपड़ों में खूब हाथ-पैर धोकर प्रसूतिगृह में जावें। ऐसी बूढ़ी और अनुभवी स्त्री प्रसूता के पास अवश्य रहनी चाहिए जिसको अनेक बार के प्रसव का ज्ञान हो।

प्रसव एक ऐसा आपरेशन हैं जो बिना शस्त्र के होता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रसव के समय बहुत धैर्य रखना चाहिए और गर्भ को स्वयमेव ही बाहर निकलने देना चाहिए, जब तक अनिवार्य आवश्यकता न हो तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और गर्भ को बलात् निकालने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।

जब प्रसव का समय निकट आता है तो गर्भवती स्त्री को अनायास थकान, क्षीणता, बार-बार मल-मूत्र करने की हाजत मालूम होती है। आंखें बाहर को आती-सी लगती हैं। मुंह में फेन आने लगता है। कुक्षि शिथिल हो जाती है। पेडू का निचला भाग भारी हो जाता है। पेट, कमर, त्रिक और उसके दोनों ओर जांघों के जोड़ों में और हृदय में वेदना अनुभव होती हैं।

योनि में स्फुरण होता है और स्राव बहने लगता है। फिर पीरें आती है और गर्भोदक बहने लगता है। गर्भोदक बहने से गर्भ के बाहर आने और अपरा निकलने तक की तीन स्थितियाँ प्रसूता के लिए बहुत गंभीर होती है। उन तीनों के बीच प्रसूता को क्षणिक विश्राम और शक्ति देने के लिए काफी घी में बनी गर्म-गर्म पतली लप्सी पिलाना चाहिए। लप्सी पिलाने से गर्भ नीचे की ओर खिसकता है और गर्म तथा स्निग्ध पेय होने से वह प्रसूता की थकान को हरण करती है।

यवागू (लप्सी) पिलाकर प्रसूता को मुलायम बिस्तर पर सीधा पैर सिकोड़ कर लिटा दें। फिर पीठ और बगलों में, कमर और टाँगों में गुनगुने तेल की मालिश करें। यदि गर्भ का सिर सीधा होकर बस्ति प्रदेश तक न आवे तो प्रसूता को थोड़ा चलना चाहिए। इस पर भी यदि गर्भ का सिर नीचे न आवे तो सावधानी से प्रसूता को पलंग पर लिटा देना चाहिए और प्रजनन कार्य में बहुत कुशल स्त्री प्रसूता के पाँव की ओर बैठकर प्रसूता के योनि मार्ग पर तैल की अनुलोम मालिश करे और प्रसूता की जांघों को दबावे और बस्तिकर्म कर दे।

प्रसूता को बिना वेदना के गर्भ को बाहर निकालने के लिए जोर नहीं लगाना चाहिए। जब वेदना उठे तब ही जोर लगाना चाहिए। जब सिर नीचे आ जावे तब साधारण जोर से प्रवाहण करना चाहिए। जब गर्भ योनि मुख में आजावे तब उस समय तक पूरे जोर के साथ प्रवाहण करना चाहिए जब तक सारा बच्चा बाहर न आ जावे।

सामान्यतः गर्भ बाहर आ जाने के दस-बीस मिनट बाद अपरा अपने-आप बाहर आ जाती है। इतने समय बाद भी अपरा न निकले तो प्रयत्न करके निकालना चाहिए।

प्रसवोपरान्त गर्भाशय की सफाई का कार्य प्राकृतिक रूप से होता है। गर्भ के उपरान्त जो तरल रस एवं आर्तव निकलता है वह स्वयं बहुत कीटाणुनाशक होता है तथा गर्भाशय और योनि मार्ग को धोकर विसंक्रमित करता है। इस प्राकृतिक सफाई में कोई बाधा नहीं डालनी चाहिए अर्थात् प्रसवोपरान्त निकलने वाले रक्त को सम्पूर्णतः निकल जाने देना चाहिए।

प्रसव कर्म के उपरान्त प्रसूता के अंगों को साफ करने में कदापि गंदे वस्त्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ठंडा पानी भी प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। तीखी और सीधी हवा से बचाव रखना चाहिए।

प्रसवोपरान्त गुह्यांगों, शरीर और वस्त्रादि की पूर्ण स्वच्छता का बहुत ध्यान रखना चाहिए। प्रसूता को अजवान आदि की धूनी देनी चाहिए और प्रसूतिगृह में भी राल-गूगल, गंधक आदि जलाकर विसंक्रमण करना चाहिए।

प्रसव के बाद प्रायः प्रसूता को वायु अधिक रहती है, ऐसी दशा में प्रथम तीन दिन तक वायु शामक पदार्थ ही उसे खिलाना चाहिए। प्रथम तीन से पांच दिन तक कोई गरिष्ठ पदार्थ नहीं देना चाहिए। केवल दूध और दशमूल का काढ़ा ३ दिन पिलाने से प्रसूत सम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। फिर प्रसूता को गुड़-घी आदि में बना हरीरा पिलाना चाहिए। डेढ़ मास तक प्रसूता के लिए आहार-विहार विश्राम के नियमों का कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए। प्रसव में खोई शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिये प्रसूता को पर्याप्त पौष्टिक भोजन देना चाहिए और दशमूल क्वाथ का विधिवत् सेवन करना चाहिए और पेट पर पट्टी (Abdominal Bandage) बांधना चाहिये।

इसके साथ ही सद्योजात शिशु की ओर भी जन्मते ही ध्यान देना चाहिए। गर्भ के निकलते ही शिशु कुछ मूर्च्छित-सा होता है; तथापि स्वयं रोता है। यदि न रोये तो उसे डराकर रुलाने का उपक्रम करना चाहिए। उत्पत्ति के कुछ देर बाद जब नाभिनाल का स्पंदन बन्द हो जावे तो नाभि से दो इंच लम्बाई पर एक इंच के अन्तर से दो सूत के बंधन बांधना चाहिए और दोनों के बीच में नाभिनाल को स्वच्छ शस्त्र से काट देना चाहिए।

नाभि पर हल्दी चूर्ण डालकर पट्टी बाँध देनी चाहिए। सद्योजात शिशु को सावधानी से साफ कर स्वच्छ कपड़े से ढक कर रखना चाहिए। माता के लिये भी हल्दी का पिचु गर्भाशय के मुख पर रखना अच्छा है।

प्रथम तीन दिन तक माता का दूध बच्चे को नहीं पिलाना चाहिए। गाय के दूध में चौगुना पानी तथा तालमिश्री या ग्लूकोज मिलाकर देना अच्छा है।

शहरी क्षेत्र में आधुनिक सभ्यता के प्रसार में स्त्रियों का जो घरेलू काम-काज छूट गया है, यह भी स्त्री रोगों की वृद्धि कर रहा है। इसलिए स्वस्थ रहने की इच्छा रखनेवाली स्त्रियों को यह चाहिए कि वे भारतीय संस्कृति के अनुसार ही जीवनक्रम बनावें। घर की स्वच्छता, भोजन बनाना, थोड़ा-बहुत आटा पीसना - इतना परिश्रम का काम यदि स्त्री करती रहे तो उसका स्वास्थ्य भलीभांति सुरक्षित रह सकता है।

स्त्री-जीवन का सर्वोपरि महत्त्व सन्तान के पालन पोषण में है। मातायें अपने शिशु को शैशवावस्था में ही स्वस्थ रखने का ध्यान रक्खें तो जीवन भर के लिए स्वास्थ्य की अच्छी नींव पड़ जाती हैं। शारीरिक निर्माण के अतिरिक्त माता सन्तान में अच्छी आदतें डालने का कार्य सबसे उत्तम कर सकती है। बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा का कार्य भी माता को घर में करना चाहिए।

घर की व्यवस्था, घर के सामान की सुरक्षा, आय-व्यय का हिसाब-किताब रखने के अलावा सबसे बड़ा काम जो घर में स्त्री कर सकती है वह घर के सभी प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा का है। बीमार की सेवा और परिचर्या पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सफलतापूर्वक कर सकती है। जब घर में कोई बीमार हो तो स्वाभाविक रूप से भावुक होने के कारण स्त्री को ऐसा भाव कभी नहीं दिखाना चाहिए कि जिससे रोगी यह समझे कि वह भयंकर रूप से बीमार है।

विशेषकर जब घर में कोई बच्चा बीमार होता है या पति अस्वस्थ होता है तो हमारे यहां मातायें और पत्नियाँ विलाप तक करने लगती है। यह उचित नहीं। ऐसा करने से रोगी के मन पर दुःखकारक प्रभाव पड़ता है और उसका रोग जटिल बनता है। इसलिए घर में किसी के रोगी होने पर स्त्री को बहुत धैर्यवान् बनकर उसकी परिचर्या करनी चाहिए। धैर्यपूर्वक की गई परिचर्या औषधि से कई गुना लाभ करती है।

घर - सेवा में सबसे अधिक निपुण स्त्री स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती है। उन्हें निज का स्वास्थ्य ठीक करने के प्रति भी सावधान रहना चाहिए। प्रायः हमारे घरों में स्त्रियाँ बचा खुचा और अधिकतर वासी भोजन खाती हैं। यह बड़ा दोषपूर्ण है। भोजन में घी-दूध, आदि पौष्टिक तत्त्व जितने पुरुष के लिए आवश्यक है, उससे कुछ अधिक ही स्त्री के लिए भी जरूरी हैं, क्योंकि स्त्री को तो अपने शरीर से ही शिशु के शरीर का निर्माण भी करना पड़ता है।

इसलिए भोजन में बचा खुचा, जूठा बासी खाना खाने की आदत का परित्याग करना चाहिए। सद्गृहस्थ की स्त्रियाँ स्वभाव से कुछ कृपण होती हैं; परन्तु उन्हें अपने भोजन में ही कृपणता नहीं करनी चाहिए। सन्तुलित भोजन से ही स्वास्थ्य और सौन्दर्य बनता है।

स्नान के बाद गीले वस्त्र पहनने की आदत बहुधा ग्रामीण स्त्रियों में होती है, जो उनको खाज-खुजली आदि चर्मरोग का शिकार बनाती है। यह आदत उन्हें छोड़ना चाहिए।

जब कभी कोई स्त्री बीमार होती है तो स्वाभाविक संकोचशीलता के कारण बहुत दिनों तक तो वह अपना कष्ट किसी को बताती नहीं, चिकित्सक को दिखाने में भी संकोच करती है। इसका परिणाम यह होता है कि रोग उसके शरीर में गहरी जड़ जमा लेता है। बीमारी के मामले में कदापि कोई संकोच नहीं करना चाहिए। और जब भी थोड़ी-सी ही बीमारी का आरंभ हो चाहे वह कैसी हो, उसको घर के लोगों और वैद्यराज को सही-सही बताने में कभी देर नहीं करनी चाहिए। बीमार अवस्था में भी मामूली बुखार, खाँसी की उपेक्षा करके, घर का काम करते रहने से अन्ततः बीमारी असाध्य होकर जीवन भर के लिए गले पड़ जाती है।