आरोग्य-प्रकाशदिनचर्या

दिनचर्या

7 मिनट का पाठ

स्वास्थ्य के विचार से दिन-रात में क्या काम, कब और किस प्रकार करना चाहिए, इसके कुछ नियम प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन परम्परा में चले आ रहे हैं। आधुनिक शिक्षित, नयी सभ्यता के फेर में उन प्राचीन नियमों की उपेक्षा करते हैं, इस कारण पूर्ण स्वस्थ नहीं रहते। दिनचर्या और रात्रिचर्या के प्राचीन नियम हमारे देश की जलवायु और सामाजिक स्थिति के अनुकूल निर्धारित है, इसलिए पूर्ण स्वस्थ रहने की इच्छा रखने वाले हर भारतवासी को इनका अवश्य पालन करना चाहिए।

प्रातः काल उठना

नित्य ही सूर्योदय से इतना पहले जागकर बिस्तर छोड़ देना चाहिए कि शौचादि से निवृत्त होकर साफ-सुथरा और प्रसन्न मन से उगते हुए नये सूर्य का स्वागत करने को पहले से ही तैयार रहें। गर्मी के दिनों में सुबह चार बजे और जाड़े में पाँच-साढ़े पांच बजे अवश्य बिस्तर छोड़ देना चाहिए। सूर्योदय से चार घड़ी पूर्व के समय को हमारे पूर्वजों ने "ब्रह्ममुहूर्त " अर्थात् सबसे उत्तम समय कहा है।

अन्य पशु-पक्षी और नवजात शिशु उस समय अवश्य जाग जाते हैं, इससे यह सिद्ध है कि उस समय सोकर उठने का प्राकृतिक नियम है। सूर्योदय से पूर्व के उस सर्वश्रेष्ठ और मूल्यवान समय को बिस्तर पर पड़े-पड़े स्वप्न देखना या आलस्य में खो देना बड़ा लज्जाजनक है।

जिन्हें देर तक सोने की आदत हो, उन्हें तुरन्त सुधार करना चाहिए। आरम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती है, परन्तु धीरे-धीरे अपने-आप सुबह जल्दी-जल्दी उठने की आदत पड जायगी।

नियमपूर्वक सूर्योदय से एक घण्टे पूर्व उठ जाने से स्वास्थ्य पर तत्काल ही उत्तम प्रभाव पड़ने लगता है। चेहरे पर तेज और ललायी आ जाती है। शरीर फुर्तीला-बलवान और सुन्दर दिखाई देने लगता है। मन अपूर्व आनन्द का अनुभव करता है।

शीतल जल पीना

प्रातः सोकर उठते ही जो लोग 'बेड टी' के नाम से गर्मागरम चाय पीते हैं, वे अपने आमाशय और शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति बहुत बड़ा अन्याय करते हैं। शीत प्रधान जलवायु वाले यूरोपीय देशों में सुबह-सुबह गर्म चाय पीने की प्रथा उचित हो सकती है, परन्तु हमारे लिए उनकी नकल करना एकदम अहितकर है। भारत जैसे उष्ण जलवायु वाले देश में तो सुबह उठते ही ठंडा जल पीना अत्यन्त लाभकर होता है।

नाक से पानी पिया जाय तो और भी उपयोग होता है। इससे मस्तिष्क धुलता है, बुद्धि की प्रखरता और नेत्रों की ज्योति बढ़ती है, बाल जल्दी सफेद नहीं होते और शरीर में असमय बुढ़ापा नहीं आता।

नाक से पानी पीने के अभ्यास में आरम्भ में कुछ कठिनता अवगत होती है, फिर तो अपने आप पानी श्वास के साथ चढ़ने लगता है। एक तोला से आरम्भ करके आधासेर तक पानी प्रातः काल नाक से पिया जा सकता है। ऐसा करने से पूर्व नाक को खूब साफ कर लेना चाहिए।

जिन्हें फेफड़े का रोग हो या जिनके अनुकूल न पड़ता हो उन्हें ठंडा पानी न पीकर हल्का गुनगुना करके पानी पीना चाहिए। जल पीने के अनन्तर दस-पांच मिनट लेट कर विश्राम कर लेना अच्छा होता है।

शौच (पाखाना) जाना

प्रातःकालीन शारीरिक क्रियाओं में सर्वोपरि आवश्यक उठते ही जल पीकर शौच जाना है। बचपन से ही बच्चों को सुबह उठने और उठते ही पाखाना जाने की आदत डालनी चाहिए। इससे दिन भर चित्त प्रसन्न और शरीर स्फूर्तिमय बना रहता है।

प्रातः घूमना

संसार के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों, विचारकों और वैज्ञानिकों का यह निश्चित मत है कि प्रातःकाल को शुद्ध वायु में टहलना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हितकर है। इसलिए प्रात:काल शौचादि से निवृत्त होकर बस्ती के बाहर खुली हवा में कुछ देर तक अवश्य टहलना चाहिए।

विद्यार्थी, जो खेल-कूद में काफी परिश्रम कर लेते हैं, वे प्रातः घूमने के बजाय उस समय का उपयोग अपनी पढ़ाई के याद रखने योग्य अर्थों और विषयों की पुनरावृत्ति में किया करें। प्रातःकाल का समय मनन करने के लिये सर्वोत्तम होता है, क्योंकि उस समय बुद्धि ताजी और निर्मल होती है, तथा मस्तिष्क की ग्रहणशक्ति बहुत तीव्र होती है। किसी प्रकार का कोलाहल नहीं होता, इसलिए चित्त में एकाग्रता आती हैं।

परन्तु जो अन्य कोई परिश्रम नहीं करते उन बुद्धिजीवियों को प्रातः घूमना आवश्यक है। घूमने में सपाटे की तेज चाल चलनी चाहिए। शरीर का ऊपरी भाग कुछ आगे को झुका हुआ हो और सारे शरीर के भार को पैर सम्हाले रहें। इस तरह घूमने से फेफड़े अधिकाधिक स्वच्छ वायु ग्रहण कर सकते हैं। थकावट भी कम आती है। सुबह टहलते समय यदि एकाध मील धीरे-धीरे दौड़ लगाई जाय तो कब्जियत और मन्दाग्नि के रोग में तत्काल लाभ होता है।

दातून करना

शौच से निवृत्त होकर घूमते समय ही या घूमने से लौटकर दातुन करना चाहिए। दाँतों की सफाई के अतिरिक्त जीभ का मैल भी जीभी या दातून से खरोंच कर निकालना चाहिए।

तेल मालिश - व्यायाम

प्रातः जब सूर्य की भीनी-भीनी धूप आने लगे तब शरीर में तेल मालिश करना बड़ा स्वास्थ्यकर होता है। इसी समय थोड़ा व्यायाम भी करना चाहिए। विद्यार्थीवर्ग और लिखा-पढ़ी का काम करनेवाले जिनको कोई शारीरिक श्रम का काम नहीं करना पड़ता उन्हें नियमित रूप से कुछ-न-कुछ व्यायाम अवश्य करना चाहिए। सूर्य नमस्कार सर्वश्रेष्ठ व्यायाम है। तेल मालिश व्यायाम के बाद ही करना ठीक होता है। व्यायाम और मालिश के बाद कम से कम पन्द्रह मिनट विश्राम भी करना चाहिए।

स्नान करना

उत्तम स्वास्थ्य के लिए नित्य शीतल जल से स्नान करना आवश्यक है। अनुकूल न पड़े तो जाड़े के दिनों में शीतोष्ण जल से नहाया जा सकता है।

थोड़े पानी से नाममात्र का स्नान व्यर्थ है। नदी में तैरकर या काफी पानी से मल-मल कर स्नान करना चाहिए और गीले खुरदरे तौलिया से रगड़कर शरीर का मैल उतारना चाहिए।

आराधना

स्नान के बाद यथावकाश भगवान की आराधना अवश्य करनी चाहिए। जिस धर्म या देवता को मानते हों, उसकी भक्ति पूर्वक आराधना करके यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा आज का दिन शांतिपूर्वक, निष्कलंक और सफलता के साथ बीते। आराधना से मानसिक शक्ति बढ़ती है जो जीवन के हर क्षेत्र में निश्चित सफलता देनेवाली होती है।

स्वल्पाहार (नाश्ता)

स्नान और आराधना के उपरान्त जिन्हें स्कूल या अन्य दफ्तरों की नौकरी पर न जाना हो उन्हें सुबह हल्का नाश्ता करना चाहिए।

१०-११ बजे से दफ्तर जानेवाले व्यक्तियों अथवा विद्यार्थियों को प्रातः नाश्ता करना आवश्यक नहीं। उन्हें तो ९ बजे के लगभग पहला भोजन कर लेना चाहिए। जिनको अपने व्यवसाय के समय की स्थितिवश दोपहर को ही भोजन के लिये अवकाश मिलता हो, उन्हें सुबह हल्का नाश्ता करना आवश्यक है।

भोजन

अपने व्यवसाय कार्य के सुविधानुसार ही लोगों को भोजन का समय निश्चित करना पड़ता है, तथापि इतना निश्चित रुपेण अनिवार्य है कि भोजन का जो समय निश्चित हो उसका नियमित पालन निरन्तर करना चाहिए जो सुबह नाश्ता करें उन्हें बारह बजे या एक बजे भोजन करना चाहिए।

भोजन के उपरान्त कम से कम आधा घंटा बायें करवट लेटकर विश्राम अवश्य करना चाहिए, फिर अपने काम में लगना चाहिए।

जिन्हें प्रातः ९ बजे ही भोजन करके स्कूल या दफ्तर जाना पड़ता है उनको मध्याह्नोपरान्त २-३ बजे कुछ भूख अनुभव होती है। उस समय कुछ फल या पेय पदार्थ लेना चाहिए। गर्मियों में दही की लस्सी, गन्ने का रस, ठंडाई या बढ़िया और विश्वस्त शर्बत तथा जाड़ों में अच्छा दूध सर्वोपरि पेय है।

जीविकोपार्जन

दैनिक जीविका कार्य को सदैव अपना उच्च कर्त्तव्य मानकर पूरी ईमानदारी, उचित परिश्रम, जिम्मेदारी और मन लगाकर करना चाहिए। किसी भी काम, में न तो शक्ति से अधिक परिश्रम करना चाहिए और नहीं कमजोरी की आदत डालनी चाहिए। आप अपना काम मुस्तैदी से करेंगे तो आपका मन सदा स्वस्थ, सन्तुष्ट, प्रसन्न और निर्भीक रहेगा। काम से जी चुरायेंगे या दिखावटी काम करेंगे अथवा किसी तरह की बेईमानी या भ्रष्टाचार करेंगे तो निश्चित ही आपका मन भयाक्रान्त, असन्तोषी, दुखी और सशंकित रहेगा।

मन के असन्तोष से मानसिक रोग तो उत्पन्न होते ही हैं, शारीरिक स्वास्थ्य पर भी मन की स्थिति का निश्चित प्रभाव पड़ता है। इसलिए अपने कार्य में ईमानदारी, सन्तोषी, परिश्रमी और व्यवस्थित रहना पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति में सर्वदा सहायक होता है।