आरोग्य-प्रकाशनिद्रा अर्थात् पूर्ण विश्राम

निद्रा अर्थात् पूर्ण विश्राम

29 मिनट का पाठ

उत्तम स्वास्थ्य और सशक्त शरीर-विकास के लिए अनिवार्य तीन उपस्तंभों में दूसरा स्थान निद्रा अर्थात् विश्राम का है।

वस्तुतः निद्रा किसे कहते हैं? यह समझने की बात है। जिस अवस्था में शरीर की अन्य सब इन्द्रियाँ शान्त हों, किन्तु मन कार्यरत हो, उसे 'स्वप्न' कहते हैं और जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा मन भी काम में न लगा हो उस अवस्था को निद्रा कहते हैं, इस प्रकार मन सहित इन्द्रियों का पूर्ण विश्राम लेना ही निद्रा है। स्वास्थ्य-प्रसंग में निद्रा का अभिप्राय केवल सो जाने से नहीं है, मूल भाव है परिश्रम से क्लान्त शरीरांगों को पूर्ण विश्राम देना। मन सहित इन्द्रियों को ऐसा पूर्ण विश्राम का सुख निद्रा में ही प्राप्त होता है, इसलिए "त्रय उपस्तम्भा" में निद्रा शब्द का प्रयोग किया गया है।

जब भी कार्य करते-करते मन क्लान्त हो और शरीर में थकावट प्रतीत हो, तब ही सीधे चित्त लेट जाइए और सारे शरीर को एकदम शिथिल कर डाल दीजिए, मन में कुछ भी मत सोचिए और यों ही थोड़ी देर पड़े रहिये। कुछ देर बाद उठने पर आप स्फूर्ति और ताजगी का अनुभव करेंगे। पूर्ण विश्राम का यही छोटा-सा उदाहरण है।

सामान्यतः किसी भी प्रकार का श्रम करने वाले व्यक्ति को प्रति चार घण्टे के बाद थोड़ा विश्राम मिलना चाहिए।

कार्य में रुचि- परिवर्तन शरीरांगों को विश्राम देने का एक मनोवैज्ञानिक साधन है। सात-आठ घण्टे तक जो मनुष्य एक प्रकार का काम करता रहे, उसके उपरान्त कोई दूसरे प्रकार का काम करने लगे तो भी उसके शरीर के वे अंग जो पहले प्रकार के काम में थकित हुए हैं, कार्य-परिवर्तन से विश्राम और शान्ति पाते हैं। जैसे जो व्यक्ति लगातार आठ घण्टा तक अध्ययन या लिखा-पढ़ी जैसा मस्तिष्क का काम करता है, वह संध्या समय बागवानी आदि कोई भिन्न रुचि का कार्य करे तो उसके मस्तिष्क को यथोचित विश्राम मिल जायगा और उसकी मानसिक क्लान्ति कम होकर उत्साह जागृत होगा।

स्वास्थ्य-प्रसंग में पूर्ण विश्राम के लिए निद्रा का महत्त्व इसलिए विशेष है कि निद्रा से बढ़ कर पूर्ण विश्राम (Complete Rest) का दूसरा कोई सर्वोपरि और सर्वसुलभ साधन नहीं है। यदि मनुष्य को नियमित रूप से प्रतिदिन उचित समय की निद्रा प्राप्त हो तो फिर वह दिन भर बिना विश्राम लिए बखूबी काम कर सकता है। दैनिक कार्य के बाद पूर्ण विश्राम प्राप्ति का उचित साधन रात्रि की निद्रा ही है।

निद्रा मस्तिष्क का अनिवार्य पौष्टिक भोजन है और चित्त की एक निश्चित वृत्ति है। विश्राम का एक सहज और प्राकृतिक उपाय सुख-निद्रा है।

यदा तु मनसि क्लांते कर्मात्मानः क्लमान्विताः।
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ --चरक अर्थात् — अन्तःकरण और मन के थक जाने पर तथा इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय कार्यों से श्रमित हो जाती हैं, तब मनुष्य को निद्रा आती है।

काम करने, उठने-बैठने, चलने-फिरने, पढ़ने-लिखने, यहाँ तक कि कुछ सोचने-विचारने में भी शरीर और मन की शक्ति खर्च होकर क्षीण होती है। शरीर के घटकों और रस रक्तादि धातुओं की इस निरन्तर होने वाली कमी को पूरा करने के लिए प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है कि आहार और निद्रा से काम में क्षय हुई शारीरिक और मानसिक शक्तियों की पूर्ति होती रहे और नयी स्फूर्ति मिलती रहे।

इस सत्य का हम सदा अनुभव भी करते हैं कि भोजन से हमें शक्ति प्राप्त होती है और नींद से मन और मस्तिष्क को ताजगी तथा प्रेरणा मिलती है। उचित आहार मिलने पर भी यदि नींद नहीं आती तो शरीर का स्वास्थ्य तथा मन गड़बड़ा जाता है। चूंकि नींद थके हुए मन और मस्तिष्क को ताजगी देने वाली है, अतः मोटर के इंजिन का उदाहरण इसके लिए अधिक उपयुक्त होगा।

कुशल, समझदार ड्राइवर २०-३० मील के सफर के बाद इंजिन की गर्मी को दूर करने के लिए, ५-७ मिनट का उसे विश्राम देना जरूरी समझता है। इस जरा-से विश्राम से ही इंजिन की अनावश्यक गर्मी शान्त होकर मशीन को नई ताकत मिल जाती है। इससे वह इंजिन काम भी ज्यादा समय तक देता है और जल्द खराब भी नहीं होता। किन्तु, जो ड्राइवर ऐसा नहीं करते, बीच-बीच में इंजिन को विश्राम नहीं देते, उनकी मशीन जल्द ही अपना जीवन समाप्त कर देती है और बार-बार उसे सफाई तथा मरम्मत के लिए भेजना पड़ता है।

जबकि एक निर्जीव यन्त्र के लिए इतनी सावधानी, इतने विश्राम की आवश्यकता है, तब मानव-शरीर तो एक सजीव यन्त्र है, जिसे काम करने के साथ-साथ सोचना भी पड़ता है।

नींद से सुख और शान्ति

'निद्रायत्तं सुखम् ' (निद्रा पर सुख निर्भर है), महर्षि चरक का यह कथन पूर्णरूप से सत्य है। शरीर और मन के निर्विकार रहने पर ही जीवन-का सुख अवलम्बित है और इसके लिए नींद एक प्रधान साधन है। सुखी जीवन में शान्ति रहती है, सुख के पास ही सत्य, शिव और सौन्दर्य का निवास है। अतः 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' की दृष्टि से भी नींद एक प्रधान वस्तु है।

नींद से बच्चों का विकास

शरीर-शास्त्रियों का यह विश्वास है कि बच्चों के शरीर की वृद्धि नींद से ही होती है। माता के अमृतोपम दूध से बच्चे का जितना विकास होता है, उतना ही नींद से भी। स्वस्थ बच्चे प्रायः सोते ही रहते हैं। जन्मकाल के बाद शुरू-शुरू में तो उनकी नींद २०-२२ घण्टे तक रहती है और जिस अवस्था तक उनका विकास होता है, उस अवस्था तक उन्हें अधिक मात्रा में नींद आती है। कोमल अङ्गों का विकास नींद बड़ी सफलता से करती रहती है और जब कभी बच्चे की नींद गड़बड़ा जाती है, तभी उसका स्वास्थ्य गिरने लगता है।

नींद से रोग शान्ति

सभी कुशल चिकित्सक अपने रोगी के हित के लिए नींद लाने का उपाय करते हैं। रोगी को नींद का आना एक शुभ चिन्ह इसलिए तो माना जाता है कि इससे रोगी के मस्तिष्क पर छाया हुआ रोग का आवरण दूर होकर, उसे नई जीवन-शक्ति प्राप्त होती है।

नींद के द्वारा रोगाणुओं का असर दूर होता है और शरीर की प्राकृतिक रोग- क्षमता-शक्ति को बल मिलता है। सन्निपात, गठिया, उन्माद जैसे कठिन रोगों में रोगी को नींद लाने का प्रत्यक्ष प्रभाव इस रूप में सामने आता है कि थोड़ी नींद आने से ही रोग का प्रकोप कम हो जाता है। उन्माद, कामज्वर जैसे रोगों के लिए तो एक मात्र औषधि ही है। उचित समय पर, उचित नींद का आना, इस बात का भी सूचक होता है कि शरीर अब रोगों के प्रभाव से मुक्त होकर नीरोग दशा को प्राप्त हो रहा है।

निद्रा का प्रभाव

रात्रि में भूतधात्री या रात्रि स्वभाव प्रभवा निद्रा लेने से शरीर की क्रियाओं में निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं :-

१. हृदय की गति मन्द हो जाती है;

२. रक्तदाब (ब्लडप्रैशर) कुछ घट जाता है;

३. श्वसनगति घट जाती है;

४. रक्त में कार्बन डाई आक्साइड की कुछ मात्रा बढ़ जाती है;

५. वृक्कों से अम्लिक पदार्थों का अधिक मात्रा में विसर्जन होता है;

६. शरीर का तापमान कुछ (स्वल्प) घट जाता है;

इन सबका मुख्य कारण मस्तिष्क बाह्यक (सैरिब्रल कार्टेक्स) की क्रियाओं का घट जाना है। उस पर अवरोधक प्रक्रिया (inhibitory process) का सर्वत्र प्रसार हो जाता है।

नींद से जख्म भरता है

महायुद्ध के दिनों में वैज्ञानिकों को इस आयुर्वेदिक सत्य का पता चला कि नींद से मांस बढ़ता है, इसलिए जख्म भी भरते हैं। अब तो जख्म भरने वाली दवाओं में नींद भी एक दवा के रूप में ही शामिल हो गई है। जंगली जानवरों के जख्म प्रकृति और नींद के द्वारा ही भरते हैं, इस तथ्य ने भी वैज्ञानिकों की इस धारणा को पुष्ट किया है।

दुर्बल-पतले शरीर को मोटा ताजा बनाने के लिए आयुर्वेद में यह स्पष्ट निर्देश है कि ऐसे व्यक्ति को स्निग्ध आहार के साथ पर्याप्त नींद का सेवन करना चाहिए। दिन-रात आँखों के सामने आने वाले मेदस्वी --मोटे थुलथुल -- स्त्री-पुरुषों के मोटापे के कारणों की खोज करने पर हमें यह भी ज्ञान होता है कि माल मलीदे खाने, आराम से 'रहने' के अलावा ज्यादा सोना भी उनके मोटापे का एक खास कारण है। और इसी कारण कृश व्यक्ति को पुष्ट बनाने में नींद एक खास कारगर उपाय है।

नींद के प्रकार

आयुर्वेद में निद्रा के निम्नलिखित रूप स्वीकार किये गये हैं :- 1. तमोभवा या तामसी निद्रा -- यह पाप मूलक मानी जाती है--तमोभवा-माहुरघस्य मूलम्।

2. श्लेष्मसमुद्भवा निद्रा -- यह कफ प्रकृति के व्यक्तियों में या कफ या श्लेष्मा की वृद्धि के कारण होती है।

3. मानसिकश्रमजन्य निद्रा -- यह अधिक दिमागी परिश्रम करने के कारण विद्यार्थियों, वकीलों और गणकों (accountants) अथवा प्राध्यापकों को आती है।

4. शारीरिक श्रमजन्य निद्रा -- यह शारीरिक परिश्रम अधिक करने के कारण किसानों तथा मजदूरों को आती है।

5. आगन्तुकी निद्रा -- यह निद्राजनक विष लेने या मक्खी के काटने से आती है। अफ्रीका की ऐसी ही मक्खी के काटने से निद्रारोग (sleeping sickness) हो जाता है। अफीम लेने या बार्बीट्यूरेट्स या ब्रोमाइड्स का अतिशय प्रयोग करने या स्लीपिंग पिल्स लेने से भी यह निद्रा आती है।

6. व्याध्यनुवर्तिनी निद्रा -- व्याधि के बाद प्रायः रोग से मुक्त व्यक्ति अधिक-काल तक सोकर अपने शरीर की क्षीणता को पूरा करता है।

7. रात्रिस्वभावप्रभवा निद्रा--रात होने के साथ ही प्राणी को नींद आने लगती है उसके मस्तिष्क में पहुँचने वाली संज्ञाओं के प्रति वह उत्सुकता और चैतन्यता उच्च मस्तिष्क के केन्द्रों में नहीं रहती और प्राणी सो जाता है। रूसी विद्वानों ने प्रयोग करके यह निर्णय लिया है कि ऐसे लोग जो रात की शिफ्ट में काम करते और दिन की शिफ्ट में सोते हैं उनमें भी रात्रि होने के साथ ही साथ निद्रा की इच्छा जागृत हो जाती है। उनके शरीर की क्रियाओं में भी निद्रा के परिवर्तन पाये जाते हैं :- "In persons who work night shifts the pulse rate, blood pressure and content of the carbon dioxide in the alveolar air show changes similar to those observed during sleep."-Text Book of Physiology edited by Bykov.

इस निद्रा को भूतधात्री कहा जाता है अर्थात् प्राणी का पालन करने वाली। आधुनिक विद्वान भी इसको प्रोटेक्टिव (सुरक्षात्मक) मानते हैं। रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति निद्राम्। -- चरक

नींद का उचित रूप

आहार की तरह ही नींद के उचित तरीके और उसकी मात्रा के विषय में भी आवश्यक जानकारी रखना जरूरी है। शरीर के लिए आवश्यक होते हुए भी जिस तरह आहार के रूप और मात्रा के सम्बन्ध में सही ज्ञान न रखने से अजीर्ण, अपच आदि गड़बड़ियाँ हो जाती हैं, ठीक उसी तरह नींद भी सुख के साथ दुःख और बल के साथ कमजोरी पैदा करती है।

इसलिये वाग्भट्ट में कहा गया है—

'निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्श्य बलाबलम्।' अर्थात् - सुख और दुःख, पुष्टि और कृशता, बल और अबल निद्रा के अधीन है। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह है कि यदि नींद का उचित सेवन किया जाता है, ठीक वक्त पर ठीक रूप में, ठीक मात्रा में, नींद ली जाती है, तो सुख, पुष्टि और बल की प्राप्ति होती है और अगर इसके तौर तरीके में रद्दोबदल करके बेवक्त-गलत रूप में, कम या अधिक मात्रा में, नींद ली जाती है, तो दु:ख, कृशता और दुर्बलता की प्राप्ति होती है।

इस चीज को और भी स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमें एक ऐसे सिनेमा-प्रेमी धनी युवक के जीवन की ओर दृष्टिपात करना चाहिए, जो रोज रात के १-२ बजे तक तो सिनेमा में ऐयाशी में डूबा रहता है और सुबह ९-१० बजे तक चारपाई पर पड़ा रहकर अलसाई आँखों से उठता है। खाने-पीने में अच्छे-अच्छे पौष्टिक पदार्थ होने पर भी बेवक्त के भोजन के कारण उसकी दिनचर्या इतनी अस्त-व्यस्त रहती है कि उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता और उसके जीवन का रस सूख जाता है।

ऐसा इसी कारण तो होता है कि पौष्टिक भोजन भी उसे पुष्ट नहीं करते और घण्टों तक शय्या पर पड़े रहने पर भी उसे सुबह की प्रफुल्लता नहीं मिलती। क्योंकि सोने के वक्त तो वह जागता है और जागने के वक्त सोता रहता है।

इसीलिये आयुर्वेद में कहा है--

अकालेऽतिप्रसंगाच्च न च निद्रा निषेविता
सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा। -- चरक संहिता अर्थात्—सुख चाहनेवाले व्यक्ति अकाल शयन, अधिक शयन और अत्यन्त शयन त्याग दें, क्योंकि यह निद्रा सुख और जीवन को नष्ट कर देती है। जैसे कालरात्रि जीवन को नष्ट कर देती है।
सैव युक्ता पुनर्युक्ते निद्रा देहं सुखायुषा।
पुरुषं योगिनं सिद्धया सत्या बुद्धिरिवागता। --चरक उचित रूप में सेवन की गई नींद उसी प्रकार सुख और जीवन देती है, जिस प्रकार यथार्थ सिद्धि से योगी को तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है।

नींद का समय

दिन काम करने के लिये है और रात्रि सोने के लिये। स्वयं प्रकृति ने ऐसा विधान बना रखा है। पशु-पक्षी दिन छिपते ही अपने घोंसले में जाकर नींद की गोद में लेट जाते हैं और फिर पौ फटते ही कार्यक्षेत्र में निकल पड़ते हैं। विवेकशील मनुष्य के लिये भी यही नियम उचित है। :

नींद चूंकि तमोगुण का रूप है और रात में तम का राज्य रहता है; अत शरीर को शक्ति देने का उद्देश्य रात में सोने से ही पूरा होता है। उषा की लालिमा में मिलनेवाला आनन्द रात की पर्याप्त नींद के बाद ही मिलता है।

नींद की मात्रा

स्वस्थ व्यक्ति को कितने समय तक सोना चाहिये, इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि अपने शरीर और काम-धन्धे के लिहाज से सोने का समय निश्चित करना चाहिए। यों तो वयस्क व्यक्ति के लिए ८ घण्टे की नींद काफी होती है; किन्तु, कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर किसानों के लिए कुछ अधिक समय तक सोने की जरूरत है, जब कि बुद्धिजीवी लोगों के लिए कम सोने से भी काम चल सकता है।

अवस्था के हिसाब से भी नींद की मात्रा स्वतः कम हो जाती है, यह एक प्राकृतिक सत्य है। छोटे बच्चे को नींद की जितनी जरूरत है, उतनी बूढ़े आदमी को नहीं; और यही कारण है जो बुढ़ापे में हमारी नींद कम हो जाती है। मोटी बात यह है कि ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है, त्यों-त्यों नींद की मात्रा भी कम होती जाती है। अवस्था बढ़ने के अनुपात से चिन्ता की मात्रा बढ़ती है।

और नींद की मात्रा कम होती है। नींद चूंकि शरीर के विकास के साथ भी सम्बन्ध रखती है; अतः जब तक स्त्री-पुरुष का पूर्ण विकास नहीं हो जाता-- अङ्ग-प्रत्यङ्ग में पूरा यौवन नहीं आ जाता, तब तक उसकी कुछ अधिक जरूरत रहती है। नवयौवन के बाद ज्यों-ज्यों उम्र ढलने लगती है, नींद की जरूरत भी कम होती जाती है।

अनिद्रा : एक महारोग

विलासिता के इस मशीन युग में अन्य महारोगों की तरह अनिद्रा का भी एक महारोग फैल गया है। काम-क्रोध, लोभ, असंतोष आदि मानसिक विकारों का ताण्डव आज मनुष्य के मस्तिष्क को इतना अशान्त बना चुका है कि उसे प्रकृति के एक स्वाभाविक अवदान, नींद के लिए भी लालायित रहना पड़ता है। इतना ही नहीं, इसके लिए उसे कृत्रिम उपायों का भी अवलम्बन करना पड़ रहा है।

आज अकेले अमेरिका में ६० लाख ऐसे व्यक्ति हैं, जो नींद की दवा खाकर चारपाई पर पहुँचते हैं। हमारे अपने देश में भी (सही आंकड़ों के उपलब्ध न होने पर भी) यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हजारों ही नहीं लाखों की संख्या में ऐसे धनी व शिक्षित व्यक्ति हैं, जिन्हें नींद न आने की शिकायत रहती है और आधी रात तक तारे गिनने के बाद बेचारों को कहीं थोड़ी-बहुत नींद आ पाती है।

नींद चूंकि शरीर की एक स्वाभाविक माँग है; अतः जब कभी नींद में विघ्न पड़ जाता है वक्त पर नींद नहीं आती या अपेक्षित मात्रा में नींद नहीं आती, तो अविलम्ब ही शरीर और मन पर इसकी प्रतिक्रिया होने लगती है। जिस तरह उचित समय पर उचित आहार नहीं मिलता, तो शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग पर उसका असर तत्काल होने लगता है, ठीक उसी तरह नींद की कमी का असर भी तत्काल ही होता है इसलिए आयुर्वेद में नींद को एक स्वाभाविक देन भी माना गया है और इस वेग को रोकने से होने वाली हानियों की चर्चा भी स्पष्ट शब्दों में की गई है। वाग्भट ने बताया है--

निद्राया मोह मूर्धाक्षिगौरवालस्य जुम्भिका।
अंगमर्दश्च .............. ॥

अर्थात् -- नींद के अभाव से मन में मोह, मस्तक और आँखों में भारीपन, सारे शरीर में आलस्य, जंभाई और शरीर के टूटने जैसी खराबियाँ होने लगती हैं। इसी ग्रन्थ में यह भी कहा गया है--

'जाड्यं ग्लानिर्भ्रमात्पक्ति तन्द्रा रोगाश्च वातजाः'।

अर्थात् —- शारीरिक जड़ता के साथ मानसिक ग्लानि होने लगती है, मस्तिष्क की विचार-शक्ति में भ्रम होने लगता, पेट की पाचन शक्ति अव्यवस्थित होने लगती, तन्द्रा बनी रहती और वात-सम्बन्धी अनेक रोगों की उत्पत्ति की भूमिका तैयार होने लगती है। शरीर को रूखा करने वाले कारणों में एक प्रधान कारण रात्रि जागरण भी है, और नींद न आने के साथ ही शरीर में रूखापन भी आने लगता है।

स्पष्ट सत्य तो यह है, और अपने जीवन में हमें इसका अनुभव भी बराबर ही होता है कि एक दिन की अनिद्रा भी हमारे लिए एक कठिन समस्या तैयार कर देती है। एक दिन की पूरी नींद तो क्या, आधी नींद भी गड़बड़ा जाती है, तो माथे में भारीपन आ जाता और भोजन में अरुचि होने के साथ आलस्य बना रहता है, जिससे कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता, और जब तक उस नींद की कमी की पूर्ति नहीं हो जाती, तब तक यही स्थिति बनी रहती है।

ठीक वक्त पर ठीक-ठीक नींद न लेने वालों, आधी-आधी रात तक सिनेमा देखने वालों या इधर-उधर रास-रंग में रुचि रखने वालों की जिन्दगी हमारे लिए इस बात का सजीव उदाहरण है कि नींद की खराबी से शरीर और मन पर कौन- कौन विकार पैदा होते हैं। ऐसे व्यक्ति हमेशा, प्रातः कालीन ताजगी से, जो उचित निद्रा के बाद मनुष्यों को ही नहीं, पशु-पक्षियों को भी मिलती है, वंचित रहते हैं। वक्त पर शौच नहीं होता, भूख के लिये प्रतीक्षा करनी पड़ती है, किसी काम में रुचि नहीं रहती और उनका जीवन रसहीन-सा प्रतीत होने लगता है।

कब्ज, प्रमेह, भूख की कमी, निरुत्साह, थकान, खून के विकार, सिर-दर्द आदि बीमारियाँ ऐसे लोगों का पल्ला पकड़ लेती है।

धन-दौलत और बुद्धि-वैभव से दुनिया की आँखों में चकाचौंध पैदा करने वाले धनियों, उद्योगपतियों, वकील- बैरिस्टरों तथा बड़े-बड़े बुद्धि-जीवियों की तरफ से आजकल अक्सर यह प्रश्न उठता है कि हमें नींद क्यों नहीं आती?

सचमुच है भी यह एक विचित्र प्रश्न! जब कि नींद एक कुदरती देन है, शरीर की स्वाभाविक माँग है, तो क्या वजह है कि आहार - शास्त्र की दृष्टि से अपर्याप्त पौष्टिक भोजन पाने वाले मजदूर तो सख्त जमीन पर भी तत्काल नींद की गोद में आराम पा जाते हैं और दिन-भर नये-नये प्रकार के माल- मलीदे खाने वाला और गुदगुदे गद्दों पर, बिजली के पंखों की हवा के नीचे सोनेवाला अमीर या बुद्धिजीवी, घंटों नींद की प्रतीक्षा में बेचैन रहता है?

छोटे-छोटे बच्चे खेलते-खेलते ही सो जाते हैं, पढ़ने वाला छात्र पुस्तक को हाथ में लिए हुए मीठी नींद का आनन्द लेने लगता है और ये धनी-मानी निद्रा देवी की वाट देखते-देखते थक जाते हैं।

इस प्रश्न के सीधे और खरे उत्तर के लिए एक छोटा-सा वाक्य 'अप्राकृतिक जीवन' ही पर्याप्त है। हमारे जीवन के खान-पान और विचार धारा में जो अस्वाभाविकता और गन्दगी आ गई है, वही इस अनिद्रा रोग के लिए जिम्मेदार है। 'सादा जीवन और उच्च विचार' का सिद्धान्त जब से हमने छोड़ा है और जीभ तथा मन के अधीन होकर खान-पान, संयम आदि की लगाम को ढीला कर दिया है, तभी से हमारा स्वास्थ्य, हमारी विचार-धारा, हमारी भूख-प्यास और हमारी नींद, सभी कुछ गड़बड़ा गई है।

नींद में बाधा डालनेवाले कारणों में आजकल लोभ, ईर्ष्या-भय और संयोग सम्बन्धी चिन्तन ही अधिक पाया जाता है। दूसरे की उन्नति या पराए की दौलत को देख कर ईर्ष्या की आग में जलते रहने से दिमाग में जो बौखलाहट होती है, वह नींद को ही नहीं, भोजन को भी हराम कर देती है। आर्थिक या परिवारिक समस्या का होआ भी निद्रादेवी को भगा देता है। मानसिक मैथुन, विपरीत योनि वाले व्यक्ति के सहवास का चिन्तन तो निद्रा रोग ही नहीं, उन्माद भी उत्पन्न कर देता है।

आजकल के कामोत्तेजक सिनेमा, रंगीले उपन्यास और अश्लील कहानियों की पत्रिकाएँ, हमारे नौजवानों की नींद को गड़बड़ाने के विशेष कारण हैं। इन चीजों के द्वारा जो मानसिक विकृति होती है, वह प्रमेह जैसी बीमारियाँ ही पैदा नहीं करती, निद्रादेवी को भी कोसों दूर भगा देती है। कब्ज जैसी पेट की बीमारियाँ भी नींद में रुकावट पैदा करती हैं। स्नायु-दौर्बल्य भी आजकल जोरों पर है, और इससे भी नींद में भारी बाधा पड़ती है। आयुर्वेद में अनिद्रा के लिए नीचे लिखे कारण बताये गये है।

कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम्।
चिन्ताक्रोधस्तथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् ॥
उपवासोऽसुखा शय्या सत्वौदार्य तमोजयः।
निद्राप्रसंगम हितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥
एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः।
कार्यकालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥ -- चरक संहिता अर्थात् - शरीर या शिर का विरेचन, वमन, भय, चिन्ता, क्रोध, आँखों में धुआँ घुसना, ज्यादा कसरत या खून निकलना (खून की कमी) उपवास, दुःख-दायी शय्या, सत्त्वगुण की अधिकता, तमोगुण पर विजय, कार्य में विशेष व्यस्त होना, किसी विशेष परिवारिक या सामाजिक या राजनैतिक घटना के कारण पैदा हुआ विशेष स्थितिपूर्ण समय; बुढ़ापा, शरीर या मन का कोई विकार, शूल - वेदना या और कोई विशेष रोग ये सब कारण नींद को नहीं आने देते।

नींद कैसे आये?

दुर्भाग्य से निद्रादेवी आपसे असंतुष्ट हो गई हों, ठीक वक्त पर, ठीक रूप में उनका आगमन नहीं होता हो, तो आपको थोड़ी समझदारी से काम लेकर रूठी हुई निद्रादेवी को मना लेना चाहिए। पुराने और नये चिकित्सा शास्त्र तथा अनुभवी विद्वानों ने निद्रादेवी को प्रसन्न करने के लिए जो साधन निश्चित किये हैं, उनका निष्कर्ष यह है कि "आफिस, दुकान या काम से लौटते समय, अपनी सब प्रकार की चिन्ताओं को बाहर रखकर प्रसन्न चित्त से घर में प्रवेश कीजिये। घर की लक्ष्मी और आँगन की शोभा स्वरूप अपने बच्चों के साथ थोड़ा दिल बहलाइए, समय पर खाना खाइए, थोड़ा टहलिये और उचित समय पर शान्त मन से चारपाई पर लेट जाइए।"

अपने जीवन को सादा रखिये। सादा भोजन और उच्च विचार रखने पर नींद को बुलाने की जरूरत नहीं होगी, वह स्वयं आकर उपस्थित हो जायगी।

दिनचर्या के सभी काम - सोना, उठना, नहाना-धोना, आफिस जाना आदि नियमित और व्यवस्थित होने चाहिए।

सोने के कम-से-कम १ - १॥ घंटा पहले भोजन कर लीजिए और शय्या पर पहुँचने के समय प्रसन्न मन रहिए। अपने दिमाग से इस बात को दूर भगा दीजिए कि नींद नहीं आयेगी, बल्कि यह समझिए कि नींद स्वयं आपकी प्रतीक्षा कर रही है। दिमाग को एकदम शान्त रख कर आप ईश्वर का स्मरण करते हुए सो जाइए।

शरीर को ढीला छोड़ने से भी नींद जल्दी आती है— पैरों के पंजों से लेकर घुटने, जाँघ, पेट, पीठ, गर्दन तक, सभी अंगों को ढीला रखिए। आराम से साँस लेना शुरू कर दीजिए, कान, नाक, आँख और मस्तक की नसों को पूरी तरह ढीला कर दीजिए और शान्ति के साथ आंखें बन्द कर लीजिए।

दिमाग में उठने वाले तूफानों को हिम्मत के साथ भगाइए। मन-ही-मन रामनाम जपने या ईश्वर का चिन्तन करने से नींद जल्दी आती है, यह एक परीक्षित सत्य है।

पैरों के तलवों में सरसों के तेल की धीमी-धीमी मालिश भी नींद को जल्द बुला देती है।

नियमित रूप से सन्ध्या - गायत्री के मन्त्र का जप करने से विचारों की शुद्धि होकर मीठी नींद आने लगती है।

नींद के लिए शारीरिक श्रम -- व्यायाम भी आवश्यक है। यों तो शारीरिक परिश्रम, स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, जीवन के लिए भी आवश्यक है। फिर भी अनिद्रा के रोगियों के लिए तो इसकी बहुत ही अधिक जरूरत होती है।

शरीर की मांसपेशियों की हरकत अपने आप में ही एक सुन्दर कला है। यह शरीर को सुन्दर, स्वस्थ, बलवान और स्फूर्तिशील बनाती है। व्यायाम के द्वारा -- चाहे वह कसरत के रूप में हो, या कबड्डी - क्रिकेट फुटबॉल अथवा तैरने-दौड़ने या तेजी से घूमने के रूप में हो- जहाँ ठीक भूख लगती है, फुर्ती आती है, जहाँ शरीर में ऐसी मीठी हल्की थकान भी आती है कि नींद आने में बड़ी मदद मिल जाती है।

यही वजह है कि शरीर से श्रम करने वाले किसान या मजदूर को रात होते ही निद्रा का निमन्त्रण अपने-आप मिल जाता है। व्यायाम का सबसे बड़ा असर तो यह होता है कि दिमाग में उठने वाले मानसिक विकार अपने आप ही दूर भाग जाते हैं, जिससे हल्के दिमाग पर नींद का असर अपने आप, ठीक समय पर होने लगता है।

नींद के लिए मन का प्रफुल्लित रहना अत्यावश्यक है। सदा प्रसन्न रहना : अपने मन और मस्तिष्क पर दुनिया के वायुमण्डल, लोभ, काम, क्रोध, चिन्ता, भय आदि का असर न होने देना कोई बहुत कठिन चीज नहीं है। कुछ दिनों की साधना और थोड़े से परिश्रम से ही मनुष्य अपने आपको ऐसी मस्ती की स्थिति में ला सकता है कि वह सदा प्रसन्न बना रहे और निद्रा देवी बिना बुलाये उसके पास हाजिर हो जाएँ।

हमारे कुछ पाठक पूछ सकते हैं कि क्या यह सम्भव है? इसका सीधा-सा उत्तर यही है कि दुनिया में असम्भव कुछ भी नहीं है। नेपोलियन युद्ध के मैदान में घोड़े की पीठ पर नींद ले सकता था और महात्मा गांधी गम्भीर राजनैतिक चर्चा में भी १५-२० मिनट के लिए नींद ले लेते थे, तो यह क्या मुश्किल है कि इच्छा करने पर भी आप प्रसन्न न रह सकें?

हाँ, इसके लिए इतना जरूर करना होगा कि अपने व्यक्तित्व में प्रकृति, ईश्वर भक्ति, सत्य, ईमानदारी, उपकार आदि जरूरी चीजों को आप शामिल करलें और एक भले आदमी की तरह अपनी दिनचर्या बना लें।

अपने दैनिक कार्यों में संलग्न रहते हुए भी परम पिता के अस्तित्व को मानकर उसके आगे आत्म-निवेदन करना, प्रफुल्लित रहने का एक सुपरीक्षित उपाय है। संसार हमारी इच्छा से नहीं चलता है, उसको चलानेवाली महाशक्ति है।

विचारों की शुद्धि, संयमित जीवन, परिश्रम, मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता है और ऐसी दशा में मानसिक प्रफुल्लता अपने आप ही बनी रहती है। फिर न तो अनिद्रा का डर रहता है, न मानसिक विकारों का और न बेईमानी या पाप का। अतः ठीक से नींद लेने के लिए अपने आपको प्रसन्न रखने का अभ्यास डालना ही चाहिए।

नींद के लिए नशा सेवन ठीक नहीं

कुछ व्यक्ति नींद के लिए भांग, अफीम, शराब जैसी नशीली चीजों का सेवन करने लगते हैं और धीरे-धीरे उसके आदी भी हो जाते हैं। स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, नींद के लिए भी यह तरीका बहुत हानिकारक है।

नशीली चीजें शुरू-शुरू में जरूर अपना काम करती हैं; किन्तु धीरे-धीरे शरीर इनका इतना अधिक अभ्यस्त हो जाता है कि इनके बिना नींद तो दूर, भूख भी नहीं लगती, किसी काम में रुचि नहीं होती और मनुष्य की हालत बहुत ही दयनीय हो जाती है. स्नायुदौर्बल्य बढ़ता है यहां तक कि उसका जीवन ही निकम्मा हो जाता है। अतः नींद के लिए भूलकर भी नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

नशीली चीजों की एक भयानक प्रतिक्रिया यह भी होती है कि स्वयं नींद का स्वरूप विकृत हो जाता है। ऐसी नींद से ताजगी के बजाय बेचैनी बढ़ती है। और मानसिक प्रसन्नता कोसों दूर भाग जाती है।

नींद लाने का आयुर्वेदिक उपाय

'अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यानूपौदका रसाः।
शाल्यनं सदधिक्षीरं स्नेहो मद्यं मनः सुखम् ॥
मनसोऽनुगुणा गंधाः शब्दाः संवाहनानि च।
चक्षुषोस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥
स्वास्तीर्ण शयनं वेश्म सुखं कालस्तथोचितः।
आनयन्त्यचिरान्निद्रां प्रणष्टा या निमित्ततः ॥ - चरक संहिता

अर्थात् - तेल की मालिश सारे शरीर में की जाय, मस्तक पर अच्छी तरह तेल रमाया जाय, उबटन लगाकर सांगोपांग स्नान किया जाय। चावल, दही, दूध, घी का सेवन किया जाय, मांसभोजियों को ग्राम्य, आनूप या जलचर जीवों का मांस-रस खिलाया जाय। हल्की मात्रा में शराब पिलायी जाय। मनपसन्द चीजें सामने रक्खी जाएँ। मन को अच्छे लगने वाले फूल, इत्र की सुगन्ध ली जाय और तबीयत खुश करने वाला संगीत सुनाया जाय।

हल्के हाथों से शरीर में सुगन्धित पदार्थों का लेपन, सुन्दर और गुदगुदी शय्या तथा मन को प्रसन्न रखनेवाला वायुमण्डल नींद में सहायक होता है। जो निद्रा कारणवश (जो पहले कहे गये हैं) नष्ट हो जाय वह इन उपायों से फिर आ जाती है। कुछ विशेष नियम नीचे दिये जाते हैं-

१. नींद के कारण ही मनुष्य को सुख-दुःख पुष्टि-कृशता, बल-दुर्बलता, धातुपुष्टि-नपुंसकता, ज्ञान-अज्ञान, जीवन-मरण प्राप्त होते हैं।

२. असमय सोने से, ज्यादा सोने से या न सोने से सुख और आयु नष्ट होती है।

३. ग्रीष्म ऋतु में छोटी रात्रि होने के कारण, आदान काल के कारण, वायु संचय के कारण और खुश्की ज्यादे होने के कारण दिन में सोना फायदेमन्द है। ग्रीष्म ऋतु के अलावा और पांच ऋतुओं में दिन में सोना कफ और पित्त को बढ़ाने वाला है।

४. नीचे लिखे आदमी सब ऋतुओं में दिन में भी सोएँ तो बजाय नुकसान के फायदा ही होता है -- भाषण देनेवाला, सवारी करनेवाला, पैदल चलने वाला, स्त्री-संभोग का प्रेमी, बोझा ढोनेवाला, क्रोध-शोक या भय से युक्त, थका हुआ, श्वास, हिचकी, दस्त लगनेवाला, बालक, बूढ़ा, कमजोर, घाव, तपेदिक, प्यास, दर्द, अजीर्ण और उन्माद रोग का रोगी तथा जिन की दिन में सोने की आदत हो, ये लोग दिन में सोने से पुष्ट होते हैं। इन लोगों को लाभ के सिवा नुकसान नहीं होता।

५. असमय में सोने से मोह, ज्वर, शरीर का स्तब्ध होना, जुकाम, सिरदर्द, शोथ, हल्लास, स्रोतों का रोध और अग्निमांद्य पैदा हो जाते हैं।

६. विष के रोगी और कंठ के रोगी को रात में भी न सोने देना चाहिए।

७. बिना आदत जागने पर दिन में सुबह बिना खाये सोकर खुमारी मिटानी चाहिए।

८. नींद के लिये सबसे युक्तियुक्त विधान आदत पर निर्भर करता है। सोने की जैसी आदत पड़ जाय और तन्दुरुस्ती को नुकसान न पहुँचे वही श्रेष्ठ हैं। आदत पड़ जाने पर और मुफीद होने पर रात को जागना और दिन को सोना कुछ नुकसान नहीं करता।

९. तेज नस्य, तेज अंजन, नावन, उपवास, चिन्ता, मैथुन, शोक, भय और क्रोध से नींद का ज्यादे आना कम हो जाता है।

१०. नींद न आवे या बहुत कम आवे तो आदमी को नीचे लिखे रोग पैदा हो जाते हैं-- अङ्ग अङ्ग में दर्द, सिर का भारी होना, जम्हाई, जड़ता, चित्त में ग्लानि, वहम, बदहजमी और तन्द्रा।

यदि किसी को बिलकुल ही नींद न आवे तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पागल हो जायगा क्योंकि अनिद्रा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है। दूध-दही का सेवन, उबटन, सिर और कान में उत्तम तेल डालना और मन को संतुष्ट - शान्त बनाना नींद की कमी मिटाता है।

स्वाभाविक सुख-निद्रा के लिए संयम का अभ्यास अत्यन्त हितकारक है। वाग्भट का कथन है-

ब्रह्मचर्यरते ग्राम्यसुखनिःस्पृहचेतसः।
निद्रा सन्तोष तृप्तस्य स्वं कालं नातिवर्तते ॥

अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले, इन्द्रियों के अत्यन्त प्रिय विषयों से निस्पृहता और सन्तोष से सन्तुष्ट व्यक्ति को नियत समय पर बिना किसी प्रयत्न के आनन्ददायिनी निद्रा अपने आप आ जाती है।

अनिद्रा के प्रसार का कारण और उसकी दवा

नीतिशास्त्र में कहा है कि असंतोषः श्रियः मूलम् -- धनसम्पत्ति प्राप्ति के लिये असंतोष चाहिए। वर्तमान समय में समस्त संसार में असंतोष फैला हुआ है सबसे अधिक असंतोष अमेरिका में है जो संसार का सबसे अधिक साधन-सम्पन्न और धनी राष्ट्र है। ये लोग धन के लिये पागल हो रहे हैं।

भारत में भी स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद धन संग्रह की चाह बहुत बढ़ रही है। अर्थ और काम को मर्यादा में रखने का काम धर्म का है सो लोग धर्म का त्याग करके अर्थ और काम के लिये तेजी से बढ़ रहे हैं। इन्द्रियाँ संभोग से संतुष्ट नहीं होती जैसे अग्नि में घृत डालने से वह नहीं बुझती है वैसे ही इन्द्रियों को भोग देने से संतुष्ट न होकर उल्टी भोग इच्छा अधिक बढ़ती है। वर्तमान काल में यह इन्द्रिय-तृप्ति की लालसा बड़ी तेजी से बढ़ रही है। इस असन्तोष के कारण अनिद्रा रोग भी बढ़ रहा है। असंतोष को नष्ट करने के लिये परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त धन को धर्मपूर्वक भोगना चाहिये।

सन्तोषामृततृप्तानां यत् सुखं शान्तिरेव च।
नहि तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥

संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य को सुख और शान्ति प्राप्त होती है वह धनी लोभी को प्राप्त नहीं होती जो दिन रात धन के लिये दौड़ता है। तुलसीदासजी ने विनय पत्रिका में कहा है--

कबहू मन विश्राम न मान्यो,
निशि दिन भ्रमत बिसार सहज सुख जहं तहं इन्द्रियन तान्यो।

सारांश यह है कि असन्तोष से अनिद्रा रोग की उत्पत्ति होती है और संतोष उसकी असली दवा है।