मूर्च्छा (बेहोशी)
2 मिनट का पाठ
चलते-फिरते या बैठे-बैठे ही एकाएक गिरकर पूर्ण या आंशिक रूप से ज्ञानहीन होने का नाम मूर्च्छा या बेहोशी है। मूर्च्छा होने पर भी रोगी की नाड़ी और साँस ठीक तरह से चलती ही रहती है। यह मूर्च्छा स्वतः या उपाय करने से शीघ्र दूर हो जाती है। पक्षाघात उपस्थित होने पर होनेवाली मूर्च्छा बहुत समय तक बनी रहती है।
अत्यन्त चिन्ता-फिक्र, अधिक मद्य पीना, सहसा भय या शोक का होना, मासिक धर्म का रुकना, हृदय की क्रिया में विषमता और अनियमित आहार-आचार आदि करने से मूर्च्छा उत्पन्न होती है। स्नायु-दौर्बल्य विशेष कारण है।
चिकित्सा
रोगी के बेहोश होते ही सर्वप्रथम उसको चैतन्य करने का प्रयत्न करना चाहिए। रोगी के इर्द-गिर्द भीड़ न जमा होने दें; क्योंकि शुद्ध हवा के द्वारा प्रकृति जो स्वतः इलाज करती है, भीड़ के कारण उसमें बाधा उपस्थित होती है। रोगी के पहने हुए कपड़े ढीले कर दें; विशेषतः कमर का कपड़ा विशेष ढीला कर दें। मुँह पर ठंडे पानी के छींटे मारें, सिर पर जल डालें, कपूर, स्मेलिंग साल्ट (Smelling Salt) या अमोनिया सुँघाएँ। बिना भीगा पत्थर का उत्तम चूना एक तोला और नौसादर एक तोला अलग-अलग पीसकर शीशी में भर दें और सुगन्ध के लिए जरा-सा कपूर या लैवेंडर डालकर शीशी का कार्क जोर से बन्द कर दें। कुछ समय बाद इसको सूँघने से मूर्च्छा दूर होती है। अगर किसी तरह मूर्च्छा भंग न होती हो, तो कालीमिर्च का महीन चूर्ण करके कागज की नलिका में रखकर रोगी की नाक में फूंक दें और लोहे को गर्म करके रोगी की त्वचा पर रखें। मूर्च्छा दूर होते ही १२१.५० मि.ग्रा. मकरध्वज, ६१ मि.ग्रा. कपूर और शहद के साथ तुरन्त चटा दें, इससे फिर मूर्च्छा होने की आशंका न रहेगी। मकरध्वज न हो, तो उत्तम ब्राण्डी २८ मि.ली. या अर्क कपूर ५ बूँद पिलाएँ। चैतन्य होने पर रोग का अच्छी तरह निदान करके जिस कारण से मूर्च्छा हुई हो, उसे दूर करें तो मूर्च्छा स्वतः अच्छी हो जायगी। मूर्च्छा रोग में प्रायः स्नायुमण्डल निर्बल हो जाता है। इसके लिए अश्वगन्धारिष्ट २९ ग्राम भोजन के बाद निरन्तर सेवन करें। यह मूर्च्छा को समूल नष्ट करने के लिए सिद्ध योग है। स्त्रियों की मूर्च्छा के लिए हिस्टीरिया प्रकरण देखना चाहिए। मूर्च्छा के साथ यदि रोगी के हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाएँ, तो बोतल में गर्म पानी भरकर हाथ-पैरों के अगल-बगल में रखें। मांस्यादि क्वाथ से भी मूर्च्छा-रोग में बहुत लाभ होता है। (सि० यो० सं० पेज १०९ देखें)
पथ्यापथ्य
दूध, दही, घी, ताजी मछली का शोरबा, अण्डे, अच्छे चावल का भात, रोटी, चीनी आदि बलकारक और स्नायुमण्डल-पुष्टिकारक भोजन दें। मद्य, चाय, कॉफी, तेल, गुड़ और मसालेदार चटपटी चीजें भोजन की दृष्टि से कुपथ्य हैं। रोगी को दिमागी काम न करने दें। शक्ति के अनुसार योग्य व्यायाम जरूर कराएँ।