आरोग्य-प्रकाशपित्तज्वर

पित्तज्वर

11 मिनट का पाठ

यह बुखार वर्षा ऋतु या इसके अन्त में (भादों, आश्विन और कुछ कार्तिक तक) हुआ करता है। जिस साल वर्षा कम होती है, उस साल पित्त का बुखार भी कम और जिस साल ज्यादा बारिश होती है, उस साल ज्यादा होता है। वर्षा होने के कारण जगह-जगह जल इकट्ठा हो जाता है और उसमें घास-पत्ते आदि गिरकर सड़ने लगते हैं जिससे वहाँ मच्छर पैदा हो जाते हैं। उस दुर्गन्ध के कारण वहाँ की हवा भी खराब हो जाती है। विषैले मच्छरों के काटने तथा हवा की गन्दगी से यह बुखार पैदा होता है। ऐसी दशा में जाड़ा देकर होने वाला मलेरिया बुखार भी हो जाता है। हम मलेरिया के सम्बन्ध में आगे चलकर लिखेंगे।

आयुर्वेद शास्त्र में एक और भी युक्ति-संगत कारण लिखा है। वाग्भट्ट ने लिखा है कि ऋतुओं के नियमानुसार वर्षा ऋतु में पित्त का संचय होता है और शरद् ऋतु में पित्त कुपित होकर अनेक रोग पैदा करता है। वर्षा ऋतु में वर्षा और ठण्डी हवा के कारण लोगों के शरीर ठण्डे रहते हैं। वर्षा के जाते ही जब धूप पड़ने लगती है, तब पित्त दूषित होकर बुखार पैदा करता है। पित्त से होने वाले जितने रोग हैं उनमें बुखार सर्वप्रधान है। किसी भी तरह का बुखार हो उसमें शरीर की गर्मी बढ़ना तो जरूरी ही है। शरीर के ताप का ही नाम बुखार है। यह ताप बिना पित्त के हो नहीं सकता। अतः बिना पित्त के कुपित हुए किसी भी प्रकार का बुखार नहीं हो सकता। वायु या कफ के बुखारों में भी पित्त का कुपित होना जरूरी है। जब बुखार के साथ पित्त का इतना सम्बन्ध है, तब पित्त के मौसम में बुखार ज्यादा फैलना बिल्कुल स्वाभाविक है। यही कारण है कि पित्त के मौसम -- शरद् ऋतु में ज्यादा बुखार हुआ करता है।

इस पित्त के बुखार से बचने के लिए जुलाब लेना और कुछ रोज उपवास करना उचित है। नियमपूर्वक एक-दो नींबू को चूसने से बुखार का डर नहीं रहता। नींबू के दो टुकड़े करके उसके बीज निकाल लेने चाहिए और उसमें ऊपर से सेंधा नमक तथा काली मिर्च का चूर्ण ९७२ मि.ग्रा. से १.५ ग्राम तक डालकर कोयले की आग पर उसे गर्म कर लेना चाहिए और गर्म-गर्म चूसना चाहिए। देशी चीजों में बुखार रोकने के लिए इसकी तुलना में कोई नहीं है।

पित्तज्वर में नीचे लिखे हुए लक्षण प्रकट होते हैं -- १०३ से १०५ या १०६ डिग्री तक का जोर का बुखार, प्यास की अधिकता, कै और उसमें पित्त का निकलना, जी मिचलाना, सिर गर्म रहना, आँखें लाल रहना, पसीना अधिक आना, नींद न आना, कभी-कभी प्रलाप करना, मुँह का स्वाद कड़वा रहना, पतले दस्त का होना, बेचैनी और पेशाब का रंग पीला होना। बुखार सुबह में १०० से १०२ डिग्री तक, शाम को १०३ से १०६ डिग्री तक रहता है। बुखार की अधिकता के कारण रोगी आधी आँख बन्द किये पड़ा रहता है।

पित्त का बुखार प्रायः दसवें दिन उतरता है। रोग जब अच्छा होने को रहता है तो ७ दिन के बाद ही रोगी के लक्षण अच्छे मालूम होने लगते हैं, बेचैनी कम होने लगती है, नींद आने लगती है और शरीर का ताप कम हो जाता है। परन्तु यदि सातवें दिन से बुखार का वेग और भी बढ़ने लगे तो समझना चाहिए कि रोगी का बचना मुश्किल है। सात दिन के बाद रोग-लक्षण प्रबल होने से यह रोगी की जान लेकर ही दम लेता देखा गया है। यह बुखार २१ दिन से भी ज्यादा रह सकता है।

पित्तज्वर चिकित्सा

रोगी को साफ हवादार कमरे में लिटाकर रखना सबसे अच्छी चिकित्सा है। शास्त्र ने ७ रोज तक दवा देने का निषेध किया है। अनुभव से भी देखा गया है कि ७ दिन के भीतर दवा देने से फायदा के बदले हानि होने लगती है। लेकिन प्रायः देखा जाता है कि दो-तीन दिन के बाद ही रोगी के घर के लोग घबराकर डाक्टर-वैद्य को दिखलाकर दवा देने के लिए तंग करने लगते हैं। डाक्टर-वैद्य भी व्यापार की रक्षा के लिए अपनी जवाबदारी न समझकर कुछ-न-कुछ दवा देना शुरू कर देते हैं। होमियोपैथी में रोगी तथा उसके घर वालों के सन्तोष के लिए ऐसे मौकों पर Blank Dose (खाली साफ किये हुए जल की खुराक) देने की प्रथा है। उसी प्रकार यदि वैद्यराज जी होशियार हुए तब तो ऐसी हल्की दवा दे देते हैं, जिससे रोगी तथा उनके घर वालों को सन्तोष तो हो जाय, पर रोग पर कोई बुरा असर न पड़े। परन्तु जब 'नीम हकीम खतरे जान' कोई वैद्य रहे तो काढ़ा, चूर्ण, चटनी आदि चीजें देने लग जाते हैं जिससे रोग बढ़ जाता है। इसीलिए ऐसे रोगियों को किसी अधूरे वैद्य या डाक्टर से दिखलाने की अपेक्षा प्रकृति के ऊपर ही छोड़ देना लाख गुना अच्छा है।

रोगी को खूब हिफाजत से रखना चाहिए। अन्न बिल्कुल नहीं देना चाहिए और पीने को निम्नलिखित प्रकार से तैयार किया हुआ जल देना चाहिए -- नागरमोथा, खश, पित्तपापड़ा, लाल चन्दन, सुगन्धवाला और सोंठ -- इन छः चीजों को मिलाकर ११.६६ ग्राम वजन में ले लीजिए और १.८७ किलो पानी डालकर उसे औंटा लीजिए, आधा पानी शेष रहने पर उसे छानकर मिट्टी के बर्तन में रख दीजिए और रोगी को प्यास लगने पर उसी जल को पीने को दीजिए। इसे "षडंग पानीय" कहते हैं। इसके पीने से प्यास कम होगी, बेचैनी घटेगी, कै बन्द होगी और बुखार भी कम हो जायगा। इस पानी की गिनती दवा में नहीं होती। यदि बुखार के साथ और कोई उपद्रव हो तो उसका इलाज अवश्य करना चाहिए। कच्चे बुखार में दवा न देने का उद्देश्य यह है कि बुखार के साथ जबरदस्ती न की जाय। सात दिन के अन्दर यदि दवा देने की जरूरत हो तो नीचे लिखी दवा देनी चाहिए। इससे रोग पर कोई उल्टा असर भी नहीं होगा और रोगी तथा उसके घर वालों के चित्त को सन्तोष भी रहेगा तथा ज्वर में कुछ-न-कुछ फायदा भी अवश्य ही होता है।

गोदन्ती मिश्रण

गोदन्ती भस्म ८ भाग, जहरमोहरा पिष्टी २ भाग, रसादि वटी २ भाग मिलाकर एक जगह रख लें। इसकी मात्रा ९७२ मि.ग्रा. है; इसी का नाम "गोदन्ती मिश्रण" है। सात दिन के अन्दर यदि दवा देने की जरूरत हो तो गोदन्ती मिश्रण कम मात्रा में देना चाहिए।

आनन्दभैरव रस

शुद्ध हिंगुल, शुद्ध तेलिया (मीठा विष), सोंठ, फूला हुआ सुहागा और जायफल -- इन पाँचों चीजों को ११.६६ ग्राम, काली मिर्च और छोटी पीपल २३.२ ग्राम लेकर अलग-अलग इन्हें खूब महीन पीसकर वजन कर लेना चाहिए। पहले शुद्ध हिंगुल को खरल में डालकर खूब देर तक पीसने के बाद सभी चीजों को उसमें डालकर तथा जम्बीरी नींबू के रस में भिगोकर घोटना चाहिए। अच्छी तरह घुट जाने पर १२१.५ मि.ग्रा. की गोली बना लेनी चाहिए। इसी का नाम "आनन्दभैरव रस" है। यह आनन्दभैरव रस हर तरह के बुखार में दिया जा सकता है। मामूली बुखार में सुबह और शाम एक-एक गोली शहद के साथ चाटने से फायदा होता है।

जब बुखार बहुत जोर का हो और उसके कम न होने के कारण रोगी के अनिष्ट होने की आशंका हो तो एक गोली आनन्दभैरव रस, ११.६६ ग्राम अदरक का रस और ११.६६ ग्राम शहद मिलाकर दिन-रात में ३ बार देने से बुखार का वेग जरूर कम हो जाता है। एक खुराक से आधी डिग्री या एक डिग्री बुखार कम हो जाता है। अगर बुखार कम करने की जरूरत न हो, तो आनन्दभैरव रस को सिर्फ शहद के साथ दिन-रात में दो बार चटा देना चाहिए। इससे बुखार धीरे-धीरे पचकर उतर जाता है।

मृत्युञ्जय रस

शुद्ध हिंगुल २३.२ ग्राम, शुद्ध टंकण, शुद्ध मीठा विष, काली मिर्च, पीपल का चूर्ण और शुद्ध गन्धक प्रत्येक ११.६६ ग्राम -- इन चीजों को अलग-अलग महीन चूर्ण करके वजन कर लेना चाहिए और फिर पत्थर के खरल में रखकर आवश्यकतानुसार अदरक का रस मिलाकर उसकी मूँग के बराबर की गोलियाँ बना लेनी चाहिए। एक-एक गोली सुबह-शाम २ ग्राम शहद और ३ ग्राम पान के रस के साथ रोगी को खिलाने से बड़ा फायदा होता है। बुखार की हालत में इसके सेवन से नये उपद्रव बढ़ने की आशंका नहीं रहती और धीरे-धीरे बुखार पचकर उतर जाता है।

रसादि वटी

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, कपूर, सफेद चन्दन, जटामांसी, नेत्रवाला, नागरमोथा, खश -- ये ८ दवाइयाँ समभाग लें। बनाने की तरकीब यह है कि पारा और गन्धक को छोड़कर और सभी चीजों को अलग-अलग महीन चूर्ण करके ठीक से तौलकर रख लेना चाहिए। पहले पत्थर के खरल में पारा और गन्धक को २ घण्टे इस प्रकार घोंटना चाहिए कि पारा और गन्धक मिलकर कज्जली तैयार हो जाय। फिर उस कज्जली में सब चीजों को मिलाकर चार घण्टे तक खूब घोंटना चाहिए। गुलाब तथा चन्दन के अर्क से दो-तीन दिन तक मर्दन करें और एक साफ की हुई बोतल में भरकर अच्छी तरह डाट लगा देनी चाहिए। इसी का नाम "रसादि वटी" है। इसकी २४३ से ३६४ मि.ग्रा. की एक खुराक है। शहद के साथ दिन-रात में ३ बार चाटना चाहिए। यह वटी बासी पानी के साथ भी खाई जा सकती है। इसके सेवन से ज्वर, भयंकर प्यास, कै, बेचैनी आदि आराम होते हैं। यह पित्तज्वर की अच्छी दवा है।

गोदन्ती हरताल भस्म बराबर भाग मिलाकर रसादि वटी देने से ज्वर तत्काल कम हो जाता है। यदि बहुत जोरों का बुखार हो, श्वास लेने में तकलीफ हो, प्यास हो और रोगी बहुत बेचैन हो तो रसादि वटी के बराबर गोदन्ती हरताल भस्म मिलाकर शहद या जल के साथ खिला देना चाहिए। एक घण्टे बाद थर्मामीटर लगाकर देखने से बुखार १ से ३ डिग्री तक कम हुआ मालूम पड़ेगा। हमने इसे अनेक बार आजमाकर देखा है।

यदि समय पर ऊपर लिखे तीनों रस तैयार न मिलें तथा और भी कोई रस तैयार न मिले, तो केवल अदरक का रस ३ ग्राम और ३ ग्राम मकरध्वज के साथ सुबह-शाम देने से बुखार में बहुत फायदा होता है और वह ठीक समय पर उतर जाता है। पित्तज्वर में मकरध्वज को शहद में मिलाकर धनिये का पानी या परवल के पत्तों का रस या अनार का रस ११.६६ ग्राम डालकर देना चाहिए, इससे बहुत लाभ होता है।

यदि ७ रोज हो जायँ और बुखार का जोर कम न हो, तो नीचे लिखे काढ़े देने चाहिए। इससे तुरन्त फायदा होगा। यह बात याद रखें कि यह काढ़ा ७ दिन से कम में नहीं देना चाहिए --

(१) जवासा, पित्तपापड़ा, फूलप्रियंगु, चिरायता, कुटकी और अडूसे की जड़ की छाल -- इन छः दवाओं को समभाग लेकर २३.२ ग्राम वजन कर काढ़ा बना लेना चाहिए। ऊपर से २३.२ ग्राम मिश्री का प्रक्षेप डालकर पी जाना चाहिए। इससे पित्तज्वर, प्यास, कै, जलन आदि आराम होते हैं।

(२) मुनक्का, हरड़ की छाल, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, कुटकी, अमलतास की गिरी -- इन छः दवाओं का काढ़ा ऊपर की तरह बनाकर मिश्री मिलाकर पीने से पित्त का ज्वर, प्रलाप, बेहोशी, भ्रम, जलन, मुँह का सूखना, प्यास आदि शान्त होते हैं। इस काढ़े से दो-एक दस्त होकर जल्दी फायदा होता है। यदि ज्यादा दस्त होने लगें तो काढ़ा बन्द कर देना चाहिए।

(३) केवल पित्तपापड़े का काढ़ा भी पित्तज्वर में बहुत फायदा पहुँचाता है। यदि पित्तपापड़े के साथ लाल चन्दन, खश और सोंठ -- ये तीनों चीजें भी मिला दी जाएँ तो और विशेष लाभ होता है। इस काढ़े को मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। यह पित्तज्वर में बहुत फायदा करता है।

(४) पित्तज्वर में वमन को रोकने के लिए धान का लावा ११.६६ ग्राम और मिश्री ५८.३ ग्राम, २३३ ग्राम गरम पानी में डालकर कुछ समय रखें। जब लावा और मिश्री पानी में गल जाय तब छानकर नींबू का रस और गुलाबजल मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाना चाहिए।

(५) ३ तोला (३५ ग्राम) पुरानी इमली को पत्थर या काँच के बर्तन में डालकर २३३ ग्राम गरम पानी में भिगो दें, कुछ देर बाद मलकर छान लें और चीनी या मिश्री मिलाकर पीने को दें, इससे कै बन्द हो जायगी।

(६) पित्तज्वर में बुखार जोर का हो जाता है, उस समय यदि उपर्युक्त दवा न मिले तो सिर्फ ५ या ७ लौंग जल के साथ घिसकर रोगी को देने से ज्वर कम हो जाता है।

(७) ठण्डा पानी या गुलाबजल में सफेद कपड़ा भिगोकर सिर पर पट्टी रखने से भी ज्वर कम हो जाता है।