आरोग्य-प्रकाशचोट आना

आकस्मिक घटनाएँ और प्राथमिक उपचार

4 मिनट का पाठ

जीवन में अकस्मात ही कभी-कभी ऐसी घटनायें हो जाया करती हैं, जिनसे शरीर को आघात पहुँचता है । अधिकांश आकस्मिक घटनायें मनुष्यों की जल्द-बाजी और सावधान न रहने की आदत के कारण होती है ।

आकस्मिक घटनाओं से होने वाले अपघातों (एक्सीडेन्ट) में कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान न होने से, मनुष्य घबराहट में कोई ऐसा काम कर जाते, जिसका अनिष्टकर परिणाम हों । सभी अस्पतालों में तत्काल प्राथमिक उपचार ( फर्स्टएड) बड़ा हितकारी होता है । अपघात में तत्काल प्राथमिक उपचार न होने से, जब तक वैद्य डाक्टर आता है या रोगी को अस्पताल पहुंचाया जाता है, तब तब प्रायः रोगी मृत्यु के मुख में पड़ जाता है । अतएव हम यहाँ कुछ मुख्य आकस्मिक अपघातों के तत्काल उपचार का विवरण दे रहे हैं ।

चोट आना

चोट बहुत कारणों से लगती है । सड़कों पर सावधानी पूर्वक इधर-उधर देखकर न चलने से, तांगा, ठेला, गाड़ी, मोटर, ट्रक आदि किसी भी वाहन से टकराने से, कहीं ठोकर लगने से, खेलों में कूद-फांद से, ऊँचाई से गिरने से अथवा मार-पीट या अन्य किसी तरह बदन पर किसी चीज का आघात लगने से-- इस प्रकार कई तरह से चोट लगती है ।

कोई चोट ऐसी लगती है जिसमें खून निकलता है, और कोई ऐसी जिसमें खून तो नहीं निकलता, परन्तु भीतरी हड्डी टूट जाती है अथवा नसें या छोटी-छोटी रक्त वाहिनी शिरायें फट जाती हैं । इसी कारण बन्द चोट लगने पर आहत स्थान का रक्त भीतर ही जमता जाता है और वह स्थान नीला या काला-सा दीखने लगता है ।

जब कोई खून बहने वालीं चोट लगे तो सबसे पहले रक्त का बहना बन्द करना चाहिए, ताकि अधिक रक्त निकलने से आहत व्यक्ति अशक्त न हो जावें । तत्काल ठंडे पानी में भिगे साफ कपड़े की पट्टी बाँधने से, या चोट पर बर्फ का टुकड़ा रख देने से रक्त का बहना कम हो जाता है ।

यदि हड्डी टूट गई हो तो चोट के स्थान पर यथास्थिति में ही तत्काल कपड़े की पट्टी खूब कसकर बांध देनी चाहिए । हड्डी टूटी हैं या नहीं, इसकी सामान्य पहचान यह है कि आघात स्थल पर तुरन्त असह्य पीड़ा होती है । बहुत लोग हड्डी टूट जाने पर स्थानीय नाई या मालिश वाले अनाड़ी लोगों से खींच-तान कराते हैं । ऐसा करना बहुत हानिकर हैं । इसलिए हड्डी टूटने पर अस्पताल में ही दिखाना चाहिए ।

चोट से खून निकलने पर तत्काल प्राथमिक उपचार करके यथाशीघ्र घायल को अस्पताल ले जाकर बेंडेज करा लेनी चाहिए ; और हड्डी टूटने पर तत्काल तो कपड़े का बन्दन काफी है फिर यथाशीघ्र, यदि हड्डी टूटना संदिग्ध हो तो घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाकर एक्स-रे परीक्षा करा लेनी चाहिए और टूटी हड्डी पर प्लास्टर चढ़वा देना चाहिए ।

बच्चों को खेल कूद में बहुत चोटें लगती है । कभी खून निकलता है; कभी बन्द चोट लगती है । कभी-कभी कोई कोल या नुकीला कंकड़ ही पैरों में धस जाता है । लोहे की कील में यदि थोड़ी-सी भी जंग लगी हो तो उसका घाव सेप्टिक होकर पक जाने का तथा टिटेनस (धनुर्वात) का बड़ा भय रहता है । साधारण खरोंच या अन्य चोट के घावों में धूल पड़ने से पकने का डर रहता है । ऐसी दशा में घायल को एन्टी टिटेनस का इन्जेक्शन लगवा देना चाहिए, जिससे चोट या कील के घाव के पक जाने का अन्देशा न रहे । खरोंच या कील लगने पर तत्काल ही टिचर आयोडीन या स्प्रिट-पेट्रोल या नर मूत्र लगा देने से सेप्टिक होने का डर कम रहता है ।

किसी अंग के भारी चीज से कुचल जाने या अन्य प्रकार से बन्द चोट लगने पर जब कि खून न निकला हो और चोट की जगह भीतर ही खून जम गया हो तो आहत स्थान पर कुछ देर बर्फ रखने से या शीतल जल की पट्टी बांध देने से भावी अनिष्ट की आशंका नहीं रहती ।

बन्द चोटों और हाथ-पैरों में मोच आ जाने पर कुछ समय बाद मालिश और सेक करना बहुत उपयोगी हैं । इन दोनों क्रियाओं से पीड़ा (दर्द) में तो तत्काल शान्ति होती है । चोट में टूटे स्नायुओं से जमा खून को पिघला कर यथावत् बनाने और मोच में अस्त व्यस्त हुए स्नायुओं को सुधारने में मालिश और सेक के प्रयोग बड़े हितकारक होते हैं ।

बन्द चोट-मोच में प्याज, आमा हल्दी, और थोड़ा-सा नमक, तिल-या खली इन सब को कुचल कर तिल्ली के तेल में गर्म कर उनकी पोटली से सेक करना और आहत स्थान पर उनको ही बांधना बहुत लाभकर होता है ।