आरोग्य-प्रकाशश्वास रोग (दमा)

श्वास रोग (दमा)

18 मिनट का पाठ

फेफड़े को वायु पहुँचानेवाली नलियाँ छोटी-छोटी मांस-पेशियों द्वारा ढकी हुई हैं। इन मांस-पेशियों में आक्षेप होने के कारण जो साँस लेने में तकलीफ होती है और गला साँय-साँय करता है, उसको श्वास या दमा कहते हैं। छाती की बीमारी के कारण जो साँस लेने में तकलीफ होती है, उसे दमा नहीं कहा जाता। दमा से दम तो नहीं निकलता, परन्तु कष्ट दम निकलने से कम नहीं होता। दमा का रोगी बहुत दिन जीता अर्थात् दीर्घायु होता है। दमे का दौरा होने का कोई नियम नहीं है। कोई रोगी गर्म ऋतु में अच्छे रहते हैं और शीत-ऋतु में ही दमा से बहुत कष्ट पाते हैं। इसके विपरीत बहुत से रोगी गर्म ऋतु में ही दमा से कष्ट पाते हैं और शीतकाल में एकदम ठीक रहते हैं। सब ऋतुओं में निरन्तर कष्ट पानेवाले रोगी भी बहुत पाये जाते हैं। वर्षा ऋतु में तो दमा के सभी रोगियों को अधिक कष्ट होता है। दमा का रोग जब नया होता है, तब दमा का वेग बहुत काल पर होता है; परन्तु ज्यों-ज्यों रोग पुराना होता है, त्यों-त्यों दमा का वेग जल्दी-जल्दी होने लगता है। यहाँ तक कि आखिर में दमा का दौरा कुछ-कुछ प्रतिदिन बना ही रह जाता है।

दौरे के समय साँस लेने में तकलीफ, गले में साँय-साँय होना, छाती पर वजन-सा मालूम होना, दमा के साथ-साथ पेट का फूलना, बदहजमी, जुकाम का जल्दी-जल्दी होना, सिर का जकड़ना, कै करने की इच्छा आदि लक्षण वर्तमान रहते हैं। रोगी वायु पाने की आशा से दोनों कन्धों को ऊँचा करता है। दमा के कारण लेट नहीं सकता, लाचारवश किसी के सहारे बैठा रहना पड़ता है। खाँसते-खाँसते बड़े कष्ट से जरा-सा कच्चा कफ निकलता है, जिससे कुछ आराम मालूम होता है।

जो कारण खाँसी पैदा करने के लिए बतलाये गये हैं, वे ही कारण श्वास-रोग को भी पैदा कर देते हैं। खाँसी की चिकित्सा न होने के कारण जब वह पुरानी और स्थायी हो जाती है, तब वही दमा को उत्पन्न कर देती है। खाँसी के कारणों के अलावा माता-पिता को दमा होना, रक्त के श्वेताणुओं का बढ़ना, तीव्र गन्ध सूँघना आदि कारणों से भी दमा उत्पन्न होता है।

चिकित्सा

पुराना दमा होने पर यकृद्वृद्धि हो जाती है तथा हृदय की दुर्बलता से भी दमा होता है। इनकी चिकित्सा होने से स्थायी लाभ होता है। दमा के दौरे के समय ऐसा इलाज कराना चाहिए जिससे दमा का दौरा शीघ्र शान्त हो। फिर बाद में ऐसी दवा का सेवन करना योग्य है, जो स्थायी रूप से लाभ पहुँचा सके। दमा का रोग नया होने से बिलकुल ठीक होने की आशा है; परन्तु पुराना दमा का निर्मूल हो जाना कठिन है। कई दमे के पुराने भुक्तभोगी रोगियों ने बताया है कि प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा वे एकदम अच्छे हो गये हैं। मेरा निजी कुछ अनुभव नहीं होने के कारण प्राकृतिक चिकित्सा के विषय में कुछ लिखना अनुचित है। प्राकृतिक नियमों का पालन करने से भी बहुत रोगी एकदम रोगमुक्त होते देखे गये हैं। लिखने का अभिप्राय यह है कि केवल दवाइयों के बल से ही दमा को एकदम दूर करने की आशा करना व्यर्थ है। दवा सेवन के साथ-साथ रोगी यदि आहार-आचार का पालन भी प्राकृतिक नियमों के आधार पर रखे, तो सदा के लिए रोगमुक्त हो सकता है।

दमा के दौरे के समय ऐसी दवा देनी चाहिए, जिससे कफ पतला होकर निकल जाय। गर्म पानी में रोगी का पैर रखवाकर कुछ समय तक बैठाये रखें, इससे दमे का वेग कम होगा। धतूरा और जवासे के पत्ते मिलाकर अंगारों पर डालें और उस धुएँ को फेफड़े में पहुँचाएँ, इससे दौरा शान्त होगा। धतूरे के पत्ते की सिगरेट बनाकर भी पी सकते हैं। धतूरे के पत्ते में जवासे का पत्ता मिलाने से भ्रम-रोग होने का भय नहीं रहता। पहले रोगी को जरा-सा धुआँ पीकर आजमाइश कर लेनी चाहिए, क्योंकि धतूरा एक प्रकार का जहर है। जरा-सा धुआँ पीने से लाभ हो तो अधिक पीना चाहिए, अन्यथा छोड़ देना चाहिए। एक दमा का पुराना रोगी हमारा पड़ोसी है। वह जब तक धतूरे के बीजों को तम्बाकू की तरह हुक्के में नहीं पीता, तब तक उसका दौरा शान्त नहीं होता। धतूरे के पत्तों की अपेक्षा बीज और भी जहरीला होता है। इसलिए बिना परीक्षा किए प्रयोग न करना चाहिए। धूम्रयोग -- (सिद्धयोग सं० देखें)। गर्मागर्म दूध, चाय या गरम पानी भी दमा में दौरे के समय लाभदायक होते हैं। दमा के दौरे को बन्द करने के लिए हिमालय पहाड़ में पैदा होनेवाली "सोमलता" (Ephedra vulgaris) नाम की जड़ी रामबाण की तरह फायदा करती है। इस जड़ी का चूर्ण ३६४ मि.ग्रा. से १ ग्राम तक १२१.५० मि.ग्रा. रससिन्दूर मिलाकर जल या मधु के साथ तीन-चार घण्टे के अन्तर से रोगी को खिलाना चाहिए। यह जड़ी हजारों मन की संख्या में हिन्दुस्तान और चीन से विलायत जाती है। वहाँ से इसका सत्त्व एफेड्रीन (Ephedrine) नाम से बनकर वापस आती है। अब भारत में इसका सत्त्व बनता है। हिन्दुस्तान में यह जड़ी काश्मीर राज्य से मूल्य द्वारा प्राप्त हो सकती है। "बैद्यनाथ श्वासकल्प" में यही जड़ी प्रधान रूप से डाली जाती है।

दमा के दौरे के समय रोगी को गर्मी अधिक मालूम होती है। इस कारण बहुत-से लोग समझते हैं कि दमा गर्म रोग है, परन्तु यह समझना भूल है। दमा वायु का रोग है। वायु का रोग होने के कारण ही इसमें गर्म आहार-उपचार से लाभ पहुँचता है। ईंट को गर्म करके और कपड़े में लपेट कर छाती को सेंकना लाभदायक है। चन्दनादि तेल की मालिश करके हाथ की हथेली को अग्नि में तपाकर सेंकना भी लाभदायक है। हल्दी का हलवा बनाकर सेंकना भी उत्तम होगा। छाती पर पुराने घी की मालिश करना फायदेमंद है। यदि किसी रोगी को गर्म आहार और उपचार अनुकूल नहीं होता हो, तो कोई नियम नहीं है कि उसे भी गर्म आहार और उपचार ही करना चाहिए। नीचे लिखी दवाओं का सेवन बहुत लाभदायक होगा।

(१) कफकर्त्तरी -- जावित्री २३.२ ग्राम, इलायची २३.२ ग्राम, पुराना बाँस ४६.४ ग्राम, पुनर्नवामूल ४६.४ ग्राम, कण्टकारी फल २३.२ ग्राम और गाँजे की भस्म (गाँजे को पीकर नशेबाज लोग जो राख डाल देते हैं वही भस्म) २३.२ ग्राम। बनाने की विधि यह है कि सूखा हुआ अपामार्ग ९३३ ग्राम, लोहे की कड़ाही में डालकर ऊपर लिखी ६ दवाइयाँ डालकर ९३३ ग्राम सूखा अपामार्ग (चिड़चिड़ी) और डालकर अग्नि लगा दें। बाँस के डण्डे से आग को इधर-उधर करके अच्छी तरह जला दें ताकि कोई कोयला न रहने पावे। अगर कोई दवा अच्छी तरह न जली हो तो और अपामार्ग देकर अच्छी तरह भस्म कर लें। फिर सब चीजों को महीन पीस लें और शीशी में भर दें। जैसे कतरनी कपड़े को काटती है, वैसे ही यह दवा कफ को काटती है, इसी से इसका नाम "कफकर्त्तरी" रखा गया है।

एक या आधे पान के टुकड़े में इस दवा को एक चुटकी (अन्दाज २४३ मि.ग्रा.) डालकर रोगी को दें और कहें कि इस पान को बहुत धीरे-धीरे चबाकर रस पेट में पहुँचाएँ। बहुत जल्द दवा का चमत्कार देखने में आएगा। यहाँ तक कि दो या तीन खुराक खाते-खाते दमा का दौरा शान्त हो जायगा। दौरा शान्त होने पर भी रोज चार खुराक दवा रोगी को खिलाएँ। इससे दिन-रात में ९३३ ग्राम तक कफ निकल जाता है। कफ निकलने में कष्ट नहीं होता, जरा खाँसने से ही पका कफ निकल जाता है। कफ निकलने से रोगी कमजोर और दुर्बल अवश्य हो जाता है। इस दवा के प्रभाव से दमा का दौरा कई वर्ष तक बन्द होते देखा गया है।

(२) भार्गी गुड़ -- भारङ्गी की जड़ ४ कि. ६६४ ग्राम, दशमूल ४ कि. ६६४ ग्राम और हरड़ एक सौ नग -- इन सब चीजों को कलईदार बर्तन में डालकर ४१ किलो ५२ ग्राम जल मिलाकर औटाएँ। १० कि. २६३ ग्राम पानी शेष रहने पर नीचे उतारकर छान लें। हरड़ तो रख लें और बाकी दवाओं को फेंक दें। इस काढ़े में उक्त हरड़ और ४ कि. ६६४ ग्राम गुड़ मिलाकर पुनः औटाएँ। गाढ़ा हो जाने पर सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात और इलायची -- ये ६ दवाएँ प्रत्येक ४६.४ ग्राम और जवाखार २३.२ ग्राम -- सबों को चूर्ण करके मिला दें। २८० ग्राम शहद भी मिला दें। एक हरड़ और आधा तोला से २३.२ ग्राम तक चटनी बकरी के दूध के साथ खाएँ। यह दमा की बहुत उत्तम दवा है। सब तरह की खाँसी अच्छी होती है। परीक्षित है। -- भा० प्र०

(३) कनकासव -- धतूरे का फल, पत्ता, जड़ की छाल और शाखा ४६६.५ ग्राम, अडूसे की जड़ की छाल, मुलेठी, पीपल, कण्टकारी, नागकेशर, सोंठ, भारङ्गी और तालीसपत्र -- इन आठ दवाओं का प्रत्येक २३३ ग्राम, धाय के फूल १.८७ किलो, मुनक्का २ कि. ३३३ ग्राम, चीनी ११.६८५ कि. (दो तुला), शहद ५.८३ कि. (एक तुला) और जल ६० कि० -- ये सब द्रव्य एक पात्र में रखकर मुँह बन्द करके एक महीना तक रखें। बाद में छान कर बोतल में भर लें। भोजन के बाद १७.५ से २८.५० ग्राम तक पीएँ। इसके निरन्तर सेवन से श्वासरोग में बहुत लाभ होता है। खाँसी में भी बहुत फायदा करता है। -- भै० र०

(४) द्राक्षासव -- मुनक्का ४.६६५ किलो, शहद ४.६७७ किलो, मिश्री या चीनी ४.६७७ किलो, धाय के फूल ९३३ ग्राम, शीतल मिर्च (कबाबचीनी), लौंग, जायफल, कालीमिर्च, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, पीपल, चित्रक, चव्य, पीपरामूल और रेणुका -- प्रत्येक ४६.४ ग्राम। पहले मुनक्का को ६० किलो जल में पकाएँ, जब १५ कि. जल शेष रहे, तब उसको उतार लें और शीतल होने पर मुनक्का को खूब मर्दन कर फिर जल को छान लें और एक घड़े में भर दें। शहद और चीनी भी उसमें डाल दें। बाकी दवाओं का मोटा चूर्ण बनाकर उसी घड़े में भर दें और कपड़मिट्टी लगाकर मुँह बन्द कर एक महीने तक रहने दें। एक महीना बाद छानकर बोतल में भर लें। इसकी मात्रा २३.२ ग्राम से ५८.३२ ग्राम तक है।

यह श्वास-कास और मन्दाग्नि में अच्छा फायदा करता है। यह बलवर्द्धक है और कब्जियत को दूर करता है। अर्श आदि रोगों में भी अच्छा फायदा करता है। -- शा० ध० सं०

(५) श्वास चिन्तामणि रस -- लौह भस्म २३.२ ग्राम, शुद्ध गन्धक ११.६६ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम, शुद्ध पारद ५.८ ग्राम, स्वर्णमाक्षिक भस्म ५.८ ग्राम, मोती भस्म ३ ग्राम, स्वर्णभस्म ३ ग्राम -- इन सबको खरल में डालकर छोटी कटेरी के रस, अदरक के रस, बकरी का दूध और मुलेठी के क्वाथ से क्रमशः भावना देकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोली बना लें। बहेड़े के चूर्ण और शहद के साथ देने से श्वास, कास तथा राजयक्ष्मा में बहुत फायदा होता है। पुराने दमा में यह शर्तिया फायदा करता है। -- भै० र०

(६) श्वासकुठार रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा विष, सुहागे का लावा, शुद्ध मनःशिला -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, सोंठ, पीपल -- प्रत्येक ७० ग्राम, कालीमिर्च ९२.८ ग्राम लेकर अडूसा के क्वाथ से दिन भर घोंटें और १२१.५ मि.ग्रा. की गोली बना लें। एक गोली प्रातःकाल और एक गोली शाम को लेकर गर्म जल से अथवा कटेली के क्वाथ से सेवन करें।

यह रस सब तरह के पुराने श्वास-कास और सिर रोग में लाभ पहुँचाता है। इसे धैर्यपूर्वक निरन्तर लेना चाहिए। -- भै० र०

(७) च्यवनप्राश (रसायन) -- बेलगिरी, अरणी, अरलू, खम्भारी, पाटला, बला (खरेंटी), शालपर्णी, पृश्निपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, छोटी पीपल, बड़ी पीपल, गजपीपल, गोखरू, छोटी कटेली, बड़ी कटेली, काकड़ासिंगी, भुईं आँवला, मुनक्का, जीवन्ती, पोहकरमूल, अगर, गिलोय, बड़ी हरड़, ऋद्धि (अभाव में बराहीकन्द), जीवक, ऋषभक (दोनों के अभाव में विदारीकन्द), कचूर, नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा, महामेदा (अभाव में शतावरी), छोटी इलायची, नीलोफर, सफेद चन्दन, विदारीकन्द, अडूसे की जड़, काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में असगन्ध), काकनासा -- ये सब दवा प्रत्येक ५८.३२ ग्राम, पके हुए उत्तम बड़े आँवले गिनकर ६२५ तथा जल १५ सेर -- इन सब को कलईदार बर्तन में डालकर पकाएँ, जब ३.७३ किलो पानी रह जाय, तब चूल्हे पर से उतार लें। आँवलों को एक तरफ रख लें और छानकर ३.७३ किलो पानी को एक जगह रख लें। आँवलों के अन्दर की गुठली निकालकर एक मोटे कपड़े से रगड़ें ताकि आँवलों का छिलका और तन्तु अलग हो जाय। फिर कपड़े से निकले हुए गूदे में तिल तैल ३५० ग्राम और गाय का घी ३५० ग्राम डालकर मन्द-मन्द आग से तब तक भूनते रहें जब तक पानी का अंश बिल्कुल जल न जाय। पानी का अंश जलने पर तेल और घी बर्तन में फिर दीखने लगता है। अच्छी तरह पक जाने पर इसे उतारकर नीचे रख दें।

ऊपर जो काढ़ा का पानी ३.७३ किलो लिखा है, उस पानी में ३ किलो मिश्री डालकर चाशनी बना लें, तब उसमें भुने हुए आँवले मिला दें और वंशलोचन २३३ ग्राम, पीपल ११६.६ ग्राम, दालचीनी १७.५० ग्राम, तेजपत्ता १७.५ ग्राम, नागकेशर १७.५ ग्राम, छोटी इलायची १७.५ ग्राम -- इन सबका महीन चूर्ण कर कपड़छान करके मिला दें। ३५० ग्राम शहद ठंडा होने पर मिलाएँ। यह च्यवनप्राश (रसायन) तैयार हो गया। इसकी मात्रा ११.६६ ग्राम खाकर ऊपर से बकरी या गाय का दूध पीना चाहिए। शास्त्र में इसके बहुत गुण लिखे हैं। च्यवन ऋषि इसको खाकर बूढ़े से जवान हो गये थे। इसलिए इसका नाम च्यवनप्राश हुआ। यह फेफड़े को मजबूत करता है, दिल को ताकतवर बनाता है, पुरानी खाँसी और पुराने दमा में बहुत फायदा करता है, दस्त साफ लाता है। अम्लपित्त में बड़ा फायदेमंद है। वीर्य विकार और स्वप्न-दोष नष्ट करता है। राजयक्ष्मा में लाभकारी है। बल, वीर्य, कान्ति, शक्ति और बुद्धि को बढ़ाता है। हम अनुभव से कह सकते हैं कि उत्तम रीति से बना हुआ च्यवनप्राश सचमुच बहुत लाभ करता है।

(८) श्वासकुठार -- शास्त्रोक्त श्वासकुठार रस हम भी व्यवहार करते हैं। जब से इस श्वासकुठार का प्रभाव हमने देखा है, तब से यह निश्चय हो गया है कि श्वास के लिए यह सचमुच कुठार (कुल्हाड़ी) है। १२१.५ मि.ग्रा. संखिया में १९.८२ ग्राम खाने का सोडा मिलाकर अच्छी तरह पीसकर १६ पुड़िया बाँध लें। एक पुड़िया सुबह और एक पुड़िया शाम जल के साथ या मलाई में खिलाएँ। रोगी को अनुकूल होने पर १६ पुड़िया की जगह ८ ही बना सकते हैं। शीत के समय में दमा के रोगी को ४० दिन या ६० दिन यह दवा खिलाएँ। भगवान् की दया से दमा एकदम जाता रहेगा। मेरे अनुभव में दमा रोग में स्थायी लाभ पहुँचाने वाली दवा इससे उत्तम अभी तक नहीं आई है। इस दवा को सेवन करा कर और साथ में रोगी का आहार-विहार ठीक रखकर मैंने कई दमा के रोगियों को आराम किया है। रोगी को अग्नि के बलानुसार ताजा घी भी पिलाना चाहिए। सावधान! दवा को अच्छी तरह मिलाकर तैयार करें। यदि एक ही खुराक में मात्रा से अधिक संखिया रोगी के पेट में पहुँच जायगा, तो रोगी प्राण त्याग कर सकता है।

(९) कटेली का रस, अडूसे की छाल का रस, चिड़चिड़ी का रस, मुनक्के का काढ़ा और मिश्री -- प्रत्येक ४६६.५ ग्राम लेकर औटाएँ और जब गाढ़ा हो जाय, तब उतार लें। मुलेठी, वंशलोचन, पीपल, भारंगी, आँवला और सुहागे का लावा -- ये ६ दवाएँ प्रत्येक २९ ग्राम लेकर चूर्ण कर उसमें मिला दें। ठण्डा हो जाने पर ४६६.५ ग्राम शहद भी मिला दें। ११.६६ ग्राम सुबह और ११.६६ ग्राम शाम को चटाकर ऊपर से बकरी का दूध पीने से दमा और खाँसी में बहुत ही लाभ होता है। यह औषध अनुभूत है।

(१०) पृष्ठ ३१४ के आरम्भ में लिखा हुआ नुस्खा कफकर्त्तरी दमा के दौरे के समय बहुत लाभ करता है। उसमें इतना परिवर्तन करें कि चार खुराक की जगह आठ खुराक दें और एक-एक या दो-दो घण्टे के अन्तर से पीने को दें। यदि समय पर अपामार्ग का क्षार न मिले, तो अडूसा, कण्टकारी या जवाखार मिला सकते हैं।

(११) सन्निपात प्रकरण में लिखा अष्टांगावलेह २३.२ ग्राम, अभ्रक भस्म ४८६ मि.ग्रा. और लौह भस्म ४८६ मि.ग्रा. मिलाकर चटाएँ। इससे कफ निकल कर दमा का दौरा जल्दी शान्त हो जायगा।

(१२) सुहागे का लावा, वंशलोचन, छोटी इलायची के बीज और मुलेठी का चूर्ण शहद के साथ चटाने से दौरा में फायदा होता है।

(१३) छोटी पीपलों का चूर्ण शहद के साथ निरन्तर चाटने से दमा में लाभ होता है।

(१४) बाजरा अन्न का पीसा हुआ आटा ११६ ग्राम को आक (मन्दार) के दूध में भावना देकर सुखा लें, उसको मिट्टी की छोटी हाँडिया में भरकर हल्की आँच में रखकर भस्म बना लें। यह भस्म २४३ मि.ग्रा. पान में खावें, इससे दमा का दोष शान्त हो जाता है। ५ दिन से ७ दिन तक इसे खाना चाहिए। दवा खाते समय ठंडा पानी न पीवें।

(१५) साबित हल्दी को बालू से हल्की-सी भूनकर और चूर्ण बनाकर मात्रा ३ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक २ बार पानी के साथ देने से दमा में लाभ होता है।

(१६) शरबत जूफा -- सि० यो० सं० पेज ७३ देखें।

पथ्यापथ्य

रोगी के पेट को बराबर साफ रखें, कब्जियत न रहने दें। रोगी को ठंड से बचाएँ, अधिक देर से पचनेवाली चीजें न खिलाएँ। रात्रि का भोजन जल्दी पचनेवाला और कम होना बहुत जरूरी है। सूर्य छिपने से पहले भोजन कर लेना चाहिए। गर्म पानी पीना लाभदायक है। दूध के सेवन से कफ और खाँसी बढ़ती हो तो दूध के बराबर जल मिलाकर गर्म करें, एक या दो पीपल भी जरा-सा कूट कर डाल दें। जब पानी जल जाय और दूध मात्र शेष रह जाय, तब छानकर मिश्री मिलाकर प्रथम उपरोक्त सिद्ध पीपल खाकर दूध पीएँ। इससे कफ-खाँसी की वृद्धि नहीं होगी। खाँसी और दमा फेफड़ों के रोग हैं, इसलिए शुद्ध हवा में शक्ति के अनुसार भ्रमण करना बहुत लाभदायक है। तम्बाकू बिलकुल न पीना चाहिए। बहुत-से रोगियों का ख्याल होता है कि सुबह तम्बाकू पीने से कफ निकलकर शान्ति आ जाती है; परन्तु यह भ्रम है। मैंने बहुत श्वास-कास के रोगियों को तम्बाकू पीना छुड़ाया है। दो-चार रोगी तो सिर्फ तम्बाकू पीना छोड़ने के कारण ही बिना किसी दवा के एकदम अच्छे हो गये हैं और तम्बाकू पीना छोड़ने से न्यूनाधिक फायदा तो सभी रोगियों को हुआ।

श्वास रोग पर विशेष अनुभव

मेरे पूज्यपाद आचार्य श्री मणिरामजी महाराज ने मु० रतनगढ़, जि० चुरू (राजस्थान) में श्री मणिराम धन्वन्तरि भवन की स्थापना की है। १० लाख से अधिक का अस्पताल है, इसमें १५ वर्ष से श्वास रोग पर शोध हो रहा है। श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लि० झाँसी से १३ हजार रुपया प्रतिवर्ष दिया जाता है। मैं स्वयं संस्था का ट्रस्टी भी हूँ। श्वास रोगियों पर जो विशेष अनुभव हुए हैं वे संक्षेप से लिख रहा हूँ--

(१) ब्रोंकाइटिस तथा ब्रोंकोन्यूमोनिया की पूर्ण चिकित्सा न होने से फेफड़ों में कफ शेष रहकर श्वासरोग कर देता है। इसमें कफ अधिक होता है। इसलिए अर्क (मदार) दूध से भावित बाजरा अन्न के आटा की भस्म या अर्क दूध भावित लवण भस्म बहुत लाभ करती है। मात्रा ६१ मि.ग्रा. पान में दो बार लें। बिना नमक जौ की रोटी और गर्म जल लेकर ७ दिन रहें। चमत्कारिक लाभ होता है।

(२) रक्त में श्वेत कणों की वृद्धि (इओसिनोफीलिया) से प्रातः सूखा दमा होता है। रक्त परीक्षा से स्पष्ट मालूम हो जाता है। इसके लिए संखिया घटित दवा बहुत लाभ करती है। १२२ मि.ग्रा. शुद्ध मनःशिला सितोपलादि चूर्ण के साथ देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। मनःशिला में संखिया होता है। श्वासकुठार में भी मनःशिला पड़ता है। मल्लसिन्दूर आदि भी लाभ करती है।

(३) एलर्जिक (असहिष्णुता) श्वास रोगों में हल्दी बहुत फायदेमंद है। बालू से भूनकर हल्दी का चूर्ण ६ से १२ ग्राम तक दो बार दें। हल्दी का चूर्ण सभी तरह के श्वास में लाभ करता है।

(४) स्वर्ण घटित दवा -- वृ० श्वास चिन्तामणि, वसन्तमालती आदि से कठिन और पुराना श्वास रोग आराम होता है।

(५) श्वासवेग जोर का हो और ऊपरवाली दवाओं से वेग शान्त न हो तो सोम (Ephedra vulgaris) चूर्ण १.५ से ३ ग्राम की मात्रा से तुरन्त लाभ हो जाता है।

(६) रतनगढ़ में पंचकर्म चिकित्सा का भी प्रबन्ध है, जो जटिल तथा बहुत पुराने दमा में सफल होती है।

(७) वृद्धावस्था तथा दुर्बलता के कारण भी क्षुद्र श्वास होता है, जिसकी कोई दवा नहीं है। रोगी को सबल बनाना चाहिए। परिश्रम न करें।