आरोग्य-प्रकाशइन्फ्लुएंजा

इन्फ्लुएंजा

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लक्षण और प्रभाव

आयुर्वेद में इसको वातश्लेष्म ज्वर कहा गया है। विषाणुओं से वातावरण के दूषित एवं विषाक्त हो जाने के कारण यह रोग फैलता है। सबसे पहले गले में कुछ सुरसुरी-सी महसूस होती है और स्वर कुछ भारी हो जाता है, फिर नाक पर प्रभाव पड़ता है। जुकाम हो जाता है। मलेरिया की भाँति जाड़ा देकर अथवा साधारण ही ज्वर आ जाता है। कुछ समय बाद ज्वर १०४° तक बढ़ जाता है। प्यास और बेचैनी बढ़ती है। सारे शरीर में भयानक दर्द हो उठता है, सिर में तीव्र शूल होता है। भूख मर जाती है, सूखी खाँसी उठती है। रोग के विषैले तत्त्वों से श्वास-प्रणाली के प्रभावित होने पर निमोनिया भी हो जाता है। इसका ज्वर तो साधारणतः तीन दिन में चला जाता है, किन्तु रोगी रोग के प्रभाव से बहुत अशक्त और रक्तहीन हो जाता है और वह कमजोरी कई दिनों तक बनी रहती है।

इन्फ्लुएंजा का संक्रमण (प्रसार)

संक्रामक होने के कारण यह रोग शीघ्र और तीव्र गति से फैलता है। रोगी के सम्पर्क में आने से -- रोगी के छींकने-खाँसने इत्यादि से निःसृत विषाणु वायु के माध्यम द्वारा आसपास के व्यक्तियों में संक्रमित होने से यह रोग फैलता है। यह रोग जब फैल रहा हो तब सिनेमा, होटल, रेल, मोटर आदि भीड़ के स्थानों से बचना चाहिए। अधिकतर यह रोग गन्दी और घनी बस्तियों में जल्दी फैलता है। इस रोग का संचयकाल २४ से ४८ घंटे का है।

बचने के उपाय

रोग होने के पूर्व ही यदि इससे बचने के उपायों की तरफ ध्यान रखा जाय तो रोग से बचाव भली प्रकार हो सकता है। पूर्व बचाव के कुछ मुख्य उपाय निम्न प्रकार हैं --

(१) इस रोग का प्रभाव कमजोर मन वाले पर तुरन्त होता है, इसलिए जीवन-मरण को सृष्टि का क्रम समझकर और ईश्वर की कल्याणकारी शक्ति पर विश्वास रखकर मन को सदैव निडर और साहसी रखिये। विश्वास रखिये कि यह बीमारी बहुत भयंकर नहीं है और सावधानी रखने पर कभी तीव्र प्रभाव नहीं कर सकती। रोग के दिनों में अधिक श्रम की थकान से बचिये।

(२) शरीर को स्वस्थ रखने और प्रतिरोधक शक्ति को स्थायी रखने के लिए संयम और ब्रह्मचर्य का भरपूर पालन कीजिए।

(३) भोजन हल्का, सुपाच्य और कम ही कीजिए। भारीपन महसूस होने पर तुरन्त उपवास कीजिए।

(४) पेट को हल्का और साफ रखिये। कब्जियत होने पर त्रिफला चूर्ण या गुलकन्द अथवा अन्य कोई साधारण दवा लेकर पेट साफ कर लीजिए।

(५) यह रोग सर्वप्रथम गले में होता है। नाक और गले की झिल्ली प्रदाहयुक्त हो जाती है। इसके लिए दो प्रयोग सर्वोपयोगी हैं --

  • गरम पानी में थोड़ा नमक डालकर गरारा (कुल्ला) करना और
  • नाक में सरसों का तेल सूँघना। जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम होता हो उन्हें हम सरसों का तेल सुंघाने का प्रयोग करते हैं। बंगाल में स्नान के पूर्व सरसों के तेल की मालिश करने और सूँघने का आम रिवाज है। दमा के रोगियों को बार-बार सर्दी-जुकाम होने पर सरसों का तेल सूँघने की आदत डाली जाती है। इन्फ्लुएंजा में यह प्रयोग नाक एवं गले की झिल्ली को सुरक्षित रखने के लिए बहुत हितकर होगा। नित्य प्रातःकाल उठकर दो बूँद सरसों का तेल सूँघना चाहिए। शुद्ध सरसों के तेल से किसी प्रकार का विकार नहीं होता, जैसा कि टीका आदि लगवाने से प्रायः हो जाता है। नाक के सामने कपड़ा रखने से देह-रक्षा होती है।

(६) यह रोग आर्द्र वातावरण से अधिक होता है, अतः बरसात में भीगने से बचना चाहिए। ओस पड़ने वाले खुले स्थान में नहीं सोना चाहिए और गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

(७) १०-१५ तुलसी पत्र तथा ५-७ काली मिर्च, जरा-सा टुकड़ा दालचीनी और अदरक कूटकर, पानी में उबालकर और शक्कर मिलाकर चाय की भाँति पीना चाहिए। रोग फैलने के समय में इसके द्वारा अच्छा बचाव होता है।

(८) रात को अधिक जागने, बाजारू मिठाई, गले हुए फल, बासी भोजन और भीड़-भाड़ के स्थानों में जाने से अपने को बचाना चाहिए।

(९) रहने के स्थान को अधिक से अधिक साफ-सुथरा रखना चाहिए। घर में नित्य नीम के पत्तों और गुग्गुल की धूनी देनी चाहिए। सर्वसाधारण जन वातावरण की शुद्धि के लिए गुग्गुल, राल, नीम की पत्ती, देवदारु इत्यादि की धूप से काम निकाल सकते हैं।

रोग हो जाने पर

उपरोक्त बचाव के नियमों का भली-भाँति पालन करने पर यह निश्चित है कि रोग नहीं होगा। बचाव के नियमों के पालन में असावधानी हो जाने से यदि रोग हो भी जाय तो कदापि उससे घबराना या भयभीत नहीं होना चाहिए। घर के किसी व्यक्ति को यदि रोग हो जावे तो शेष सब घरवालों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे अपने को तथा पास-पड़ोस वालों को रोग से बचावें और सब प्रकार की सफाई इत्यादि की सावधानी रक्खें। निर्भय होकर विधिवत् रोगी की परिचर्या करते हुए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए --

(१) रोग होते ही रोगी को साफ और हवादार कमरे में आराम से लेटे रहना चाहिए। बच्चों को रोगी से अलग रखना चाहिए। पीने के लिए गरम पानी देना चाहिए। आधा गिलास गुनगुने जल में एक चुटकी नमक डालकर रोगी को गरारा (कुल्ला) करा देना चाहिए।

(२) ज्वर की अवस्था में रोगी को अन्न कदापि न दें। एक-दो दिन का उपवास सम्भव हो तो करायें। दूध, चाय, मौसमी का रस, या मुनक्का खिलाकर पानी पिला दें।

(३) यह बराबर ध्यान रखना चाहिए कि रोगी का गला साफ रहे। इसके लिए गले में दवा लगाना और उपरोक्त प्रकार से बार-बार गरारा करना चाहिए।

(४) अन्य लोगों को रोग न लगे इसके लिए रोगी के अधिक पास किसी को बात न करने देना चाहिए। रोगी के थूक या कै को तुरन्त राख या चूना से दबा देना चाहिए। रोगी के कपड़ों को दूसरों से अलग और साफ रखना चाहिए।

(५) रोगी से बात करते समय नाक-मुँह के सामने स्वच्छ कपड़ा रखना चाहिए।

आयुर्वेदिक दवा

इन्फ्लुएंजा में अब तक के अनुभव से आयुर्वेदीय औषधियाँ विशेष लाभकारी सिद्ध हुई हैं। इसलिए शास्त्रोक्त आयुर्वेदीय औषधियों का ही प्रयोग करना चाहिए; यथा --

(१) छोटी कटेरी, गिलोय, सोंठ और पुष्करमूल ३ ग्राम लेकर २३४ ग्राम पानी में उबालें, ५८.३२ ग्राम शेष रहने पर ११.६६ ग्राम शहद डालकर रख लें। २३.३२ ग्राम हर ४ घण्टे पर देने से इन्फ्लुएंजा, पसली का दर्द, कास और श्वास रोग ठीक होता है।

(२) त्रिभुवनकीर्ति रस अथवा लक्ष्मीविलास रस (नारदीय) की १२१.५ मि.ग्रा. की गोली, गोदन्ती हरताल भस्म २४३ मि.ग्रा. के साथ तीन ग्राम अदरक का रस मिलाकर शहद में लेना चाहिए। यह जवान आदमी के लिए पूरी खुराक है। इस प्रकार की तीन खुराक सुबह, दोपहर, शाम नित्य देनी चाहिए। बच्चों के लिए आयु के अनुसार मात्रा निश्चित करनी चाहिए।

(३) त्रिभुवनकीर्ति और नारदीय लक्ष्मीविलास रस सुलभ न हों तो संजीवनी वटी, कल्पतरु रस और आनन्दभैरव रस का भी प्रयोग किया जा सकता है।

(४) रोगी को अधिक खाँसी और जुकाम हो तो मरिचादि वटी, एलादि वटी, व्योषादि वटी -- किसी भी वटी को चूसने के लिए दिया जा सकता है। यदि कफ न निकलता हो और खाँसी ज्यादा हो तो चन्द्रामृत रस को मिश्री के साथ चूसने को देना चाहिए या गुलबनफ्शादि काढ़ा पीने को देना चाहिए।

(५) यदि रोग किसी कारण से निमोनिया में परिवर्तित हो जावे तो उसकी चिकित्सा शीघ्र किसी योग्य एवं अनुभवी चिकित्सक से करानी चाहिए। योग्य चिकित्सक जब तक न मिले तब तक शृङ्ग भस्म २४३ से ३२४ मि.ग्रा. (३-४ रत्ती) का प्रयोग किया जा सकता है।