आरोग्य-प्रकाशप्रजनन

प्रजनन

11 मिनट का पाठ

गर्भ के नौ महीने पूर्ण होने पर प्रजनन होता है। अज्ञानतावश हमारे देश में प्रजनन की असावधानियों से स्त्रियाँ बहुत रोगग्रस्त होती हैं। प्रतिवर्ष हजारों स्त्रियां या तो प्रसवकाल में ही मर जाती हैं या किसी भयंकर प्रसूति रोग से जीवन पर्यन्त ग्रस्त रहती हैं।

वस्तुतः प्रजनन एक नैसर्गिक क्रिया है। यदि आहार-विहार में विशेषकर गर्भावस्था में प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन न हो तो प्रजनन क्रिया भी नैसर्गिक रूप से बिना कष्ट के स्वाभाविक ही सम्पन्न होती है। इस विषय में नैसर्गिक जीवन बितानेवाली आदिवासियों और किसानों की परिश्रमशील स्त्रियों का उदाहरण ध्यान देने योग्य है। वे प्रायः प्रथम प्रसव में भी चलते-फिरते और काम करते-करते बिना किसी की सहायता के जंगल में ही बच्चा जन देती है और दूसरे दिन फिर ज्यों के त्यों काम करने लगती हैं।

उन्हें कभी कोई गर्भाशयिक प्रसूति रोग होते प्रायः नहीं देखा गया। इसका मुख्य कारण यही है कि उनका जीवन परिश्रमपूर्ण होता है। नैसर्गिक आहार-विहार होने से उनका परिपुष्ट गर्भ उचित समय पर निसर्ग द्वारा ही सहजरूपेण गर्भाशय से पृथक् हो जाता है।

परन्तु आजकल विशेषकर शहरी क्षेत्र में स्त्रियां अपना घरेलू काम-काज का आवश्यक परिश्रम भी नहीं करती और आहार-विहार में अनियमित रहती है। इसी कारण उनका प्रसव भी कष्टकर और कठिनाई पूर्वक होता है। यदि सामान्य जीवन में वे अपने घर का काम-काज अपने हाथों से करके उचित परिश्रम करती रहे और गर्भावस्था में पौष्टिक आहार, शुद्ध जलवायु और पर्याप्त विश्राम का सेवन करें तो उन्हें भी न तो प्रसव कष्ट उठाना पड़े और न किसी प्रसूति रोग का शिकार होना पड़े। प्रथम प्रसव में सामान्यतः अधिक कष्ट होता है।

प्रसव-सम्बन्धी अज्ञानताओं के कारण हमारे देश में बहुत शिशुओं और माताओं की मृत्यु होती है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में अप्रशिक्षित, अयोग्य और अकुशल दाइयाँ अनेक प्रकार के प्रसव में हस्तक्षेप और जल्दबाजी करके प्रसूता और शिशु को बड़ी हानि पहुँचाती है। सबसे बड़ा दोष यह है कि प्रसव में गन्दे स्थान, गन्दे वस्त्र, गन्दे पात्रादि और गन्दे हाथों से काम लिया जाता है। प्रसव एक प्रकार का शल्यकर्म है जिसमें गर्भाशय और योनिमार्ग में घाव हो जाता है।

यह सामान्य नियम है कि किसी भी घाव में यदि कोई गंदगी के कीटाणु प्रवेश पा जाते हैं तो भयंकर विकृति उत्पन्न करते हैं। गाँव की दाइयाँ बहुधा गंदी रहती हैं, गंदे हाथों को बिना धोये ही सब काम करती हैं और उस्तरा, आदि गंदे औजारों से ही बच्चे का नारा (नाल-नाडी) काटती है। चाकू या उस्तरा को पानी में रखकर उबाल लेना, साफ कृमिरहित रुई या वस्त्र से काम लेना, लाल साबुन से हाथ धोकर प्रजनन सम्बन्धी कार्य करना चाहिए।

गंदे कपड़े से ही प्रसूता के गर्भस्थल को पोंछती हैं। प्रसूति स्थल तो गंदा होता ही है, वहाँ की हवा एकदम बन्द कर दी जाती हैं, इन सबका यह परिणाम होता है कि स्त्रियां रक्त प्रदर और प्रसूतिज्वर आदि रोगों से सदा के लिए पीड़ित हो जाती है।

शहरों में आधुनिक ढंग से बने प्रसूतिगृह भी सर्वथा निरापद नहीं। स्वच्छता का प्रबन्ध तो इनमें रहता है, परन्तु प्रसूता की परिचर्या उचित ढंग से नहीं होती। प्रसूति के कमरे में चारों ओर खुली खिड़कियाँ होती हैं, जिनसे सीधी और तीखी (तेज) हवा प्रसूता के स्वास्थ्य पर स्थायी घातक प्रभाव करती है। शहरी प्रसूतिगृह में प्रसव के तत्काल उपरान्त अनावश्यक दवाओं का सेवन प्रारम्भ कर दिया जाता है और आहार का संयम नहीं रखा जाता जो निश्चित हानिकर होता है।

प्रजनन के सम्बन्ध में प्राचीन भारतीय परम्पराएँ और आयुर्वेदीय नियम ध्यान देने योग्य है। प्रजनन के लिए प्रसूति गृह बहुत साफ होना चाहिए जिसमें मिट्टी, धूल या बालू के कण न हों। उसकी बनावट ऐसी हो कि वह शीत, वर्षा और ग्रीष्म सब ऋतुओं में निवास योग्य हो। गृह का मुख्य द्वार उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए जिससे सूर्य का प्रकाश उसमें आ सके।

सभी आवश्यक वस्तुएँ प्रसूति गृह में रहना चाहिए। अग्नि और जल निरन्तर रहना चाहिए। प्रसूता के लिए पलंग, बिछौने, ओढ़ने और पहनने के कपड़े बहुत स्वच्छ होना चाहिए। प्रसूति कार्य में उपयुक्त पात्र और वस्त्र भी धुले हुए होना चाहिए। प्रसूता की परिचर्या में लगने वाली दाई और अन्य स्त्रियाँ भी साफ कपड़ों में खूब हाथ-पैर धोकर प्रसूतिगृह में जावें। ऐसी बूढ़ी और अनुभवी स्त्री प्रसूता के पास अवश्य रहनी चाहिए जिसको अनेक बार के प्रसव का ज्ञान हो।

प्रसव एक ऐसा आपरेशन हैं जो बिना शस्त्र के होता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रसव के समय बहुत धैर्य रखना चाहिए और गर्भ को स्वयमेव ही बाहर निकलने देना चाहिए, जब तक अनिवार्य आवश्यकता न हो तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और गर्भ को बलात् निकालने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।

जब प्रसव का समय निकट आता है तो गर्भवती स्त्री को अनायास थकान, क्षीणता, बार-बार मल-मूत्र करने की हाजत मालूम होती है। आंखें बाहर को आती-सी लगती हैं। मुंह में फेन आने लगता है। कुक्षि शिथिल हो जाती है। पेडू का निचला भाग भारी हो जाता है। पेट, कमर, त्रिक और उसके दोनों ओर जांघों के जोड़ों में और हृदय में वेदना अनुभव होती हैं।

योनि में स्फुरण होता है और स्राव बहने लगता है। फिर पीरें आती है और गर्भोदक बहने लगता है। गर्भोदक बहने से गर्भ के बाहर आने और अपरा निकलने तक की तीन स्थितियाँ प्रसूता के लिए बहुत गंभीर होती है। उन तीनों के बीच प्रसूता को क्षणिक विश्राम और शक्ति देने के लिए काफी घी में बनी गर्म-गर्म पतली लप्सी पिलाना चाहिए। लप्सी पिलाने से गर्भ नीचे की ओर खिसकता है और गर्म तथा स्निग्ध पेय होने से वह प्रसूता की थकान को हरण करती है।

यवागू (लप्सी) पिलाकर प्रसूता को मुलायम बिस्तर पर सीधा पैर सिकोड़ कर लिटा दें। फिर पीठ और बगलों में, कमर और टाँगों में गुनगुने तेल की मालिश करें। यदि गर्भ का सिर सीधा होकर बस्ति प्रदेश तक न आवे तो प्रसूता को थोड़ा चलना चाहिए। इस पर भी यदि गर्भ का सिर नीचे न आवे तो सावधानी से प्रसूता को पलंग पर लिटा देना चाहिए और प्रजनन कार्य में बहुत कुशल स्त्री प्रसूता के पाँव की ओर बैठकर प्रसूता के योनि मार्ग पर तैल की अनुलोम मालिश करे और प्रसूता की जांघों को दबावे और बस्तिकर्म कर दे।

प्रसूता को बिना वेदना के गर्भ को बाहर निकालने के लिए जोर नहीं लगाना चाहिए। जब वेदना उठे तब ही जोर लगाना चाहिए। जब सिर नीचे आ जावे तब साधारण जोर से प्रवाहण करना चाहिए। जब गर्भ योनि मुख में आजावे तब उस समय तक पूरे जोर के साथ प्रवाहण करना चाहिए जब तक सारा बच्चा बाहर न आ जावे।

सामान्यतः गर्भ बाहर आ जाने के दस-बीस मिनट बाद अपरा अपने-आप बाहर आ जाती है। इतने समय बाद भी अपरा न निकले तो प्रयत्न करके निकालना चाहिए।

प्रसवोपरान्त गर्भाशय की सफाई का कार्य प्राकृतिक रूप से होता है। गर्भ के उपरान्त जो तरल रस एवं आर्तव निकलता है वह स्वयं बहुत कीटाणुनाशक होता है तथा गर्भाशय और योनि मार्ग को धोकर विसंक्रमित करता है। इस प्राकृतिक सफाई में कोई बाधा नहीं डालनी चाहिए अर्थात् प्रसवोपरान्त निकलने वाले रक्त को सम्पूर्णतः निकल जाने देना चाहिए।

प्रसव कर्म के उपरान्त प्रसूता के अंगों को साफ करने में कदापि गंदे वस्त्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ठंडा पानी भी प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। तीखी और सीधी हवा से बचाव रखना चाहिए।

प्रसवोपरान्त गुह्यांगों, शरीर और वस्त्रादि की पूर्ण स्वच्छता का बहुत ध्यान रखना चाहिए। प्रसूता को अजवान आदि की धूनी देनी चाहिए और प्रसूतिगृह में भी राल-गूगल, गंधक आदि जलाकर विसंक्रमण करना चाहिए।

प्रसव के बाद प्रायः प्रसूता को वायु अधिक रहती है, ऐसी दशा में प्रथम तीन दिन तक वायु शामक पदार्थ ही उसे खिलाना चाहिए। प्रथम तीन से पांच दिन तक कोई गरिष्ठ पदार्थ नहीं देना चाहिए। केवल दूध और दशमूल का काढ़ा ३ दिन पिलाने से प्रसूत सम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। फिर प्रसूता को गुड़-घी आदि में बना हरीरा पिलाना चाहिए। डेढ़ मास तक प्रसूता के लिए आहार-विहार विश्राम के नियमों का कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए। प्रसव में खोई शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिये प्रसूता को पर्याप्त पौष्टिक भोजन देना चाहिए और दशमूल क्वाथ का विधिवत् सेवन करना चाहिए और पेट पर पट्टी (Abdominal Bandage) बांधना चाहिये।

इसके साथ ही सद्योजात शिशु की ओर भी जन्मते ही ध्यान देना चाहिए। गर्भ के निकलते ही शिशु कुछ मूर्च्छित-सा होता है; तथापि स्वयं रोता है। यदि न रोये तो उसे डराकर रुलाने का उपक्रम करना चाहिए। उत्पत्ति के कुछ देर बाद जब नाभिनाल का स्पंदन बन्द हो जावे तो नाभि से दो इंच लम्बाई पर एक इंच के अन्तर से दो सूत के बंधन बांधना चाहिए और दोनों के बीच में नाभिनाल को स्वच्छ शस्त्र से काट देना चाहिए।

नाभि पर हल्दी चूर्ण डालकर पट्टी बाँध देनी चाहिए। सद्योजात शिशु को सावधानी से साफ कर स्वच्छ कपड़े से ढक कर रखना चाहिए। माता के लिये भी हल्दी का पिचु गर्भाशय के मुख पर रखना अच्छा है।

प्रथम तीन दिन तक माता का दूध बच्चे को नहीं पिलाना चाहिए। गाय के दूध में चौगुना पानी तथा तालमिश्री या ग्लूकोज मिलाकर देना अच्छा है।

शहरी क्षेत्र में आधुनिक सभ्यता के प्रसार में स्त्रियों का जो घरेलू काम-काज छूट गया है, यह भी स्त्री रोगों की वृद्धि कर रहा है। इसलिए स्वस्थ रहने की इच्छा रखनेवाली स्त्रियों को यह चाहिए कि वे भारतीय संस्कृति के अनुसार ही जीवनक्रम बनावें। घर की स्वच्छता, भोजन बनाना, थोड़ा-बहुत आटा पीसना - इतना परिश्रम का काम यदि स्त्री करती रहे तो उसका स्वास्थ्य भलीभांति सुरक्षित रह सकता है।

स्त्री-जीवन का सर्वोपरि महत्त्व सन्तान के पालन पोषण में है। मातायें अपने शिशु को शैशवावस्था में ही स्वस्थ रखने का ध्यान रक्खें तो जीवन भर के लिए स्वास्थ्य की अच्छी नींव पड़ जाती हैं। शारीरिक निर्माण के अतिरिक्त माता सन्तान में अच्छी आदतें डालने का कार्य सबसे उत्तम कर सकती है। बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा का कार्य भी माता को घर में करना चाहिए।

घर की व्यवस्था, घर के सामान की सुरक्षा, आय-व्यय का हिसाब-किताब रखने के अलावा सबसे बड़ा काम जो घर में स्त्री कर सकती है वह घर के सभी प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा का है। बीमार की सेवा और परिचर्या पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सफलतापूर्वक कर सकती है। जब घर में कोई बीमार हो तो स्वाभाविक रूप से भावुक होने के कारण स्त्री को ऐसा भाव कभी नहीं दिखाना चाहिए कि जिससे रोगी यह समझे कि वह भयंकर रूप से बीमार है।

विशेषकर जब घर में कोई बच्चा बीमार होता है या पति अस्वस्थ होता है तो हमारे यहां मातायें और पत्नियाँ विलाप तक करने लगती है। यह उचित नहीं। ऐसा करने से रोगी के मन पर दुःखकारक प्रभाव पड़ता है और उसका रोग जटिल बनता है। इसलिए घर में किसी के रोगी होने पर स्त्री को बहुत धैर्यवान् बनकर उसकी परिचर्या करनी चाहिए। धैर्यपूर्वक की गई परिचर्या औषधि से कई गुना लाभ करती है।

घर - सेवा में सबसे अधिक निपुण स्त्री स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती है। उन्हें निज का स्वास्थ्य ठीक करने के प्रति भी सावधान रहना चाहिए। प्रायः हमारे घरों में स्त्रियाँ बचा खुचा और अधिकतर वासी भोजन खाती हैं। यह बड़ा दोषपूर्ण है। भोजन में घी-दूध, आदि पौष्टिक तत्त्व जितने पुरुष के लिए आवश्यक है, उससे कुछ अधिक ही स्त्री के लिए भी जरूरी हैं, क्योंकि स्त्री को तो अपने शरीर से ही शिशु के शरीर का निर्माण भी करना पड़ता है।

इसलिए भोजन में बचा खुचा, जूठा बासी खाना खाने की आदत का परित्याग करना चाहिए। सद्गृहस्थ की स्त्रियाँ स्वभाव से कुछ कृपण होती हैं; परन्तु उन्हें अपने भोजन में ही कृपणता नहीं करनी चाहिए। सन्तुलित भोजन से ही स्वास्थ्य और सौन्दर्य बनता है।

स्नान के बाद गीले वस्त्र पहनने की आदत बहुधा ग्रामीण स्त्रियों में होती है, जो उनको खाज-खुजली आदि चर्मरोग का शिकार बनाती है। यह आदत उन्हें छोड़ना चाहिए।

जब कभी कोई स्त्री बीमार होती है तो स्वाभाविक संकोचशीलता के कारण बहुत दिनों तक तो वह अपना कष्ट किसी को बताती नहीं, चिकित्सक को दिखाने में भी संकोच करती है। इसका परिणाम यह होता है कि रोग उसके शरीर में गहरी जड़ जमा लेता है। बीमारी के मामले में कदापि कोई संकोच नहीं करना चाहिए। और जब भी थोड़ी-सी ही बीमारी का आरंभ हो चाहे वह कैसी हो, उसको घर के लोगों और वैद्यराज को सही-सही बताने में कभी देर नहीं करनी चाहिए। बीमार अवस्था में भी मामूली बुखार, खाँसी की उपेक्षा करके, घर का काम करते रहने से अन्ततः बीमारी असाध्य होकर जीवन भर के लिए गले पड़ जाती है।