स्त्री स्वास्थ्य
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यों तो सभी स्वास्थ्य-नियम स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी एवं पालनीय हैं। आयुर्वेदोक्त 'त्रय उपस्तंभा:'-- आहार, विश्राम और ब्रह्मचर्य का सिद्धान्त दोनों पर एक समान लागू होता है; तथापि स्त्री-पुरुष में प्रकृति ने ही जो भिन्नता और विशिष्टता रक्खी है; उसको ध्यान में रखते हुए स्त्री-स्वास्थ्य विषय में कुछ बातें अलग से विचारणीय हैं।
स्त्री-पुरुष की शरीर रचना में यह प्राकृतिक भेद है कि स्त्रियों के शरीर में गर्भाशय और स्तनदुग्ध-ग्रन्थियां विशेष होती हैं, जो पुरुष के शरीर में नहीं होती।
मनुष्य जरायुज प्राणी है। अण्डज प्राणियों में तो संतति की रक्षा और पालन-पोषण नर-मादा मिलकर करते हैं; परन्तु जरायुज जीवों की यह विशेषता है कि उनमें गर्भधारण से लेकर संतति के जन्म, दुग्धपान और पालन-पोषण आदि का भार केवल स्त्री ही वहन करती है। पुरुष उसमें सक्रिय कुछ नहीं करता। इस प्रकार मानवों में स्त्री और पुरुष का कार्य विभाजन भी प्राकृतिक रूप से है।
ऐसी स्थिति में स्त्री-पुरुष दोनों के लिये समान नियम-व्यवहार रखना अनुचित है। आजकल आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से हमारे देश में नारी को समानाधिकार देने के नाम पर स्त्री-पुरुषों के लिये जो एक जैसे नियम लागू किये जा रहे हैं और स्त्रियों को सेना, सरकारी दफ्तरों और अन्य श्रम आदि आफिसों में भरती किया जाता है, यह प्राकृतिक नियम के प्रतिकूल है। रहन-सहन, पहनावा, खेल-कूद व्यायाम, राजनीति, इत्यादि सबमें पुरुषों के समान ही स्त्रियों का अनुकरण स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी नहीं, प्रत्युत वह स्त्री की स्वाभाविक सुकुमारता पर आघात करने वाला और विकृत करने वाला है।
हमारा कदापि यह दृष्टिकोण नहीं कि भारतीय स्त्री समाज अशिक्षित, पिछड़ा हुआ, रूढ़िग्रस्त और किसी भी प्रकार पुरुष से निम्न दर्जे का बना रहे-ऐसा होना तो अभिशाप है। परन्तु स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक अन्तर की अवहेलना करना भी श्रेयस्कर नहीं। भारत में प्राचीन काल से पुरुष के लिए कठिन परिश्रम के कार्य, अर्थोपार्जन, घर के बाहर के सम्पूर्ण काम करना एवं स्त्री के लिए कोमल कार्य, शिशुओं का लालन-पालन, गृहस्थी की व्यवस्था, परिवार का स्वास्थ्यरक्षण आदि कार्य निर्धारित हैं।
यह एक प्रकार का समानाधिकारिक कार्य - विभाजन अपने आप में महत्वपूर्ण है और स्त्री-पुरुष दोनों के स्तर को गौरवपूर्ण बनाने वाला है, प्राकृतिक नियमों के आधार पर बनी हमारी इस प्राचीन परिवार व्यवस्था में मध्यकालीन युग में जो दोष आये हैं, उन्हें अवश्य दूर किया जाना चाहिए। हिन्दुओं में मुस्लिम संस्कृति की भाँति कठिन पर्दा और स्त्रियों को सदा घर के भीतर बन्द रखने की कुप्रथा अहितकर है।
पर्दा प्रथा के कारण बहुधा जो स्त्रियाँ निरन्तर घर की चारदीवारी में बन्द रहती है, उनको यक्ष्मा, चर्मरोग आदि रोगों का शिकार होना पड़ता है। इसलिए कठिन पर्दा और स्त्रियों के प्रति अन्य जो सामाजिक दुर्व्यवहार है, उनमें सुधार की निश्चित आवश्यकता है।
प्रगतिशील युग में स्त्री-शिक्षा नितान्त वांछनीय है; परन्तु आधुनिक शिक्षा की विषय- बहुलता जो अनावश्यक पाठ्यपुस्तकों के भार से बालकों के मस्तिष्क को भी थकित और कुंठित कर देती है, वह बालिकाओं के कोमल मस्तिष्क के लिए तो कदापि ही श्रेयस्कर नहीं। बालक-बालिकाओं की उच्च श्रेणी में सहशिक्षा दोनों के लिए अत्यन्त हानिकर है। १० वर्ष की उम्र तक बालक-बालिकायें साथ-साथ पढ़े तो कोई दोष नहीं है।
भारत में १२-१३ वर्ष की आयु में ही दोनों के स्नायु-मण्डल में सहज उत्तेजना आ जाती हैं, जो उनके स्वच्छन्द रूप से निकट रहने में मनोविकारों को प्रोत्साहन देता है। इसलिए बालक-बालिकाओं की उच्च शिक्षा का पृथक-पृथक स्वतन्त्र ही प्रबन्ध होना चाहिए। स्वस्थ चरित्र और उच्च नैतिक स्तर के निर्माण हेतु शिक्षाप्रणाली में यह सुधार होना वांछनीय है।
बालकों के फुटबॉल, हाकी आदि खेल और दण्ड-बैठक, कुश्ती आदि व्यायाम बालिकाओं के लिए उपयोगी न होकर हानिकारक होते हैं और उनमें शारीरिक विकृति उत्पन्न करते हैं। इसलिए शरीर रचना के अनुकूल बालिकाओं के खेल और व्यायाम भी कोमल होने चाहिए। इसी प्रकार बालिकाओं के शिक्षा का विषय उनके अनुरूप होना चाहिए। बालिकाओं को मुख्यतः पाक विज्ञान, गृह-अर्थशास्त्र, शिशु-मनोविज्ञान स्वास्थ्य विज्ञान, गार्हस्थ कलाएँ, रोगी-परिचर्या, संगीत और प्राथमिक शिक्षा-विज्ञान-इन, विषयों का ही शिक्षण दिया जाना चाहिए, जिनमें कि वे स्वाभाविक रूप से अधिक सफल हो सकती हैं और यह विषय उनके जीवन में काम भी आते हैं। कन्याओं को उच्चशिक्षा, नर्सिंग, गृहविज्ञान, मनोविज्ञान और अध्यापन विषयों की शिक्षा देना उचित है।
प्रकृति ने स्त्री-शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि वह पुरुष की अपेक्षा तन-मन और स्वभाव से अधिक कोमल, ममतामयी, सहिष्णु, सेवाभावी, संकोचशील और दयालु होती है। स्त्री का स्नायु मण्डल पुरुष की अपेक्षा सहज सुकुमार और अल्पशक्ति वाला होता है। अतएव स्त्री की शिक्षा, कार्य और व्यवहार में इस प्राकृतिक सुकुमारता का ध्यान रखकर नियम-व्यवहार रखना चाहिये।
यौन-विकास
पश्चिम के शीतप्रधान देशों में तो १७-१८ वर्ष की आयु तक भी बालिकाओं में यौवन के चिन्ह प्रकट नहीं होते। परन्तु भारतवर्ष उष्ण जलवायु का देश है, इसलिए यहाँ १०-११ वर्ष की आयु में ही बालिकाओं में योवन-विकास प्रारम्भ हो जाता है। १३-१४ वर्ष की अवस्था में हमारे यहां लड़कियां रजस्वला होने लगती है। अत्यल्प अनुपात में ऐसे भी उदाहरण हो सकते हैं कि जब कि लड़की का यौन विकास १५-१६ वर्ष तक न हुआ हो।
यदि किसी लड़की में जल्दी यौन विकास होता है अथवा देर से होता है तो ये दोनों ही स्थितियाँ चिन्ता का कारण नहीं है क्योंकि योवन - विकास आयु मात्र पर ही निर्भर नहीं प्रत्युत शरीरस्थ ग्रन्थियों की कार्यशीलता पर निर्भर करता है। यौन-विकास काल में कभी-कभी पहले एक स्तन बढ़ता है, फिर कुछ महीनों बाद दूसरा बढ़ता है - - यह बात भी चिन्ता का कारण नहीं है।
यौन विकास आरम्भ होने के डेढ़-दो साल के भीतर लड़की रजस्वला होती है। किसी-किसी लड़की को प्रारंभिक पहले और दूसरे वर्ष मासिकधर्म अनियमित और बार-बार होता है, विवाहोपरान्त मासिकधर्म में ऐसी गड़बड़ी तो दोषपूर्ण होती है, परन्तु विवाह के पूर्व हुये मासिकधर्म के प्रारंभिक रूप में ऐसा होने को रोग का कारण नहीं समझना चाहिए।
मासिक-धर्म
प्रत्येक वयस्क स्त्री के योनिमार्ग से प्रतिमास जो रक्त का स्राव होता है उसे "मासिक-धर्म" कहते हैं। इसमें बीरबहूटी के रंग जैसा गहरे लाल रंग का रक्त निकलता है जिसका वस्त्र पर लगा दाग धोने से छूट जाता है। इसके निकलने में दाह, वेदना हो अथवा बहुत कम या बहुत अधिक रक्त निकले तो रोग का कारण समझना चाहिए। २७ दिन के पहले या बाद में देर से मासिकधर्म होना भी सामान्य रोग का चिन्ह है। तीन चार दिन से अधिक मासिक रक्त निकलना भी विकार का सूचक है। रक्त के साथ लोथड़े निकलें उसका रंग पीलापन लिये हो अथवा उसमें दुर्गन्ध आता हो तो उसे विकार समझकर उसकी चिकित्सा करनी चाहिए।
मासिक-धर्म का रक्त प्रायः तीन दिन तक निकलता है। आर्तव दर्शन के दिन से लेकर सोलह दिन तक अथवा आर्तवानन्तर स्नान के पश्चात् बारह दिन तक स्त्री गर्भधारण करने योग्य रहती है।
रजोदर्शन से लेकर तीन दिन तक स्त्री को ब्रह्मचारिणी रहना चाहिए। इन दिनों में स्नान, शृंगार और किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक परिश्रम नहीं करना चाहिए। एकान्त स्थान में मुलायम आसन पर प्रायः लेटे ही रहना चाहिए। दिन में सोना नहीं चाहिए। आर्तव बन्द होने पर चौथे दिन स्त्री को सिर धोकर स्नान करना चाहिए।
मासिक-धर्म के दिनों में प्रायः स्त्रियाँ गन्दे कपड़े पहने रहती है और गन्दे कपड़े की तह योनि मार्ग पर बाँधती हैं। कोई-कोई तो कपड़ों की तह करके योनिमुख में भर लेती हैं। यह अत्यन्त खराब बात है। गन्दे कपड़े के कीटाणु योनि में प्रवेश कर भयंकर रोग का कारण बन जाते हैं, सेप्टिक (विषोत्पत्ति) का भी भय रहता है क्योंकि मासिक-धर्म में गर्भाशय की अन्त कला विदीर्ण होती है। इसलिए मासिक-धर्म में बहुत साफ-सुथरा कपड़ा पानी में उबालकर प्रयोग करना चाहिए। शहरों में इसके लिए 'सेनिटरी टावल्स' मिलते हैं, उनका उपयोग उचित है।