सामूहिक स्वच्छता (Public Hygiene)
15 मिनट का पाठ
पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए जिस प्रकार व्यक्तिगत स्वच्छता आवश्यक है, उसी प्रकार सामूहिक स्वच्छता भी अनिवार्य होती है। सामूहिक स्वच्छता का अर्थ है— घर की सफाई, मुहल्ले की सफाई, सार्वजनिक स्थानों की सफाई और गांव या नगर की सफाई।
यदि हम केवल अपनी शारीरिक स्वच्छता का ध्यान रखें और सामूहिक स्वच्छता के लिए कोई उपक्रम न करें तो उसका कुप्रभाव भी हमारे निज के स्वास्थ्य पर पड़े बिना नहीं रह सकता। सामूहिक अस्वच्छता के दूषित वातावरण से निजी शारीरिक स्वच्छता के सारे प्रयत्न धूल में मिल जाते हैं।
घर की सफाई
केवल कमरों के फर्श को जल्दी-जल्दी झाडकर, कूड़ा इकट्ठा करके दरवाजे के बाहर गली या सड़क पर फेंक देने को ही घर की सफाई नहीं कहा जा सकता। मकान के कोने-कोने को झाड़कर, दीवालों या छतों के किनारों में लगनेवाले जाले-घोंसले को भी नित्य हटाना चाहिए। सदा एक ही स्थान पर रक्खी रहनेवाली आलमारी, सन्दूक, सोफा, मेज-कुर्सी और पलंग आदि चीजों के नीचे से भी नित्य कूड़ा निकालना चाहिए।
घर की सफाई का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल है। सुबह ही मकान के सब दरवाजे और खिड़कियाँ खोलकर झाडू लगाना चाहिए, फिर कपडे के झाढ़न से, घर की सभी वस्तुये और दरवाजे तथा खिड़कियों के किवाड़ों को पोछ - फटकार कर साफ करना चाहिए।
ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों को नित्य फटकार कर तह करके एक स्थान पर रखना चाहिए। विशेषकर वर्षाऋतु में बिछोनो को थोड़ा धूप दिखाना अच्छा होता है। पलंग-चारपाई को भी सप्ताह में एक बार धूल झाड़कर धूप में रखने से खटमल आदि का डर नहीं रहता।
घर की स्वच्छता और सफाई के लिए प्रत्येक वस्तु को एक निश्चित स्थान पर व्यवस्थित रखने का अभ्यास बड़ा सहायक होता है। घर में इधर-उधर बिखरी चीजें देखने में बुरी लगती हैं और उनसे निश्चित गंदगी बढ़ती है तथा यथास्थान व्यवस्थित रक्खी चीजों की सफाई में भी असुविधा होती है। इसलिए घर की हर चीज को झाड़-पोंछकर आकर्षक ढंग से एक निश्चित स्थान पर ही रखना चाहिए। हर कमरे में आवश्यक और उपयोगी सामान ही रखना चाहिए। बहुत प्रकार की चीजों से कमरे को भर देने से सजावट नहीं होती, उलटी उससे सफाई में असुविधा होती और कमरा कबाड़खाना-सा बन जाता है। इसी प्रकार दीवारों पर भी अधिक चित्रादि नहीं टांगना चाहिए।
कमरों का फर्श यदि पक्का हो तो उसको नित्य पानी से धोना चाहिए। कच्चा हो तो गोबर से लीपते रहना चाहिए। गोबर में थोड़ा गोमूत्र मिलाने से वह कीटाणुनाशक भी हो जाता है।
रसोई बनाने-खाने की जगह विशेष रूप से बहुत साफ-सुथरी रखना आवश्यक है। धुएँ और जाले-घोंसले से भरे रसोई घर में, इधर-उधर बिखरे बर्तन, खाने की वस्तुये या सामग्री, रसोई घर को गंदा और असुन्दर बनाती है। ऐसे स्थान का भोजन आनन्ददायक और स्वास्थ्यप्रद नहीं होता। इसलिए रसोई घर को नित्य पानी से धो देना चाहिए। खाने-पीने की वस्तुओं को रखने के लिए रसोई घर में जालीदार आलमारी अवश्य रखना चाहिए; जिससे उन पर मक्खी न लगे। साफ बर्तन और जूठे बर्तन, एक दूसरों से दूर अलग रखना चाहिए।
घर के सन्डास की भरपूर सफाई के प्रति, अक्सर लोग लापरवाह रहते हैं, यह बड़ी नादानी है। संडास में शौच करने के बाद हर मर्तबा मल के ऊपर चूना या थोड़ी राख डाल देनी चाहिए। दैनिक सुबह पाखाना साफ कराके संडास को फिनाईल मिले पानी से धुलवा डालना चाहिए।
घर के आँगन या छतों पर कहीं भी कूड़ा-कर्कट नहीं रहना चाहिए। आंगन में गन्दे पानी का कीचड़ रहना बड़ा हानिकारक होता है। नाली और परनाले को पानी से धोकर साफ करते रहना चाहिए।
यदा-कदा विसंक्रमण के लिए घर में राल या गूगल का धुआं करते रहना चाहिए और वर्ष में कम-से-कम एक बार पूरे मकान की पुताई अवश्य करानी चाहिए।
घर की बनावट
घर ऐसे स्थान पर बनाना चाहिए जहाँ भूमि कुछ ऊँची हो, जिससे घर में सीलन का प्रभाव न हो। गंदी और घनी बस्ती, पशुओं के इकट्ठे होने की जगह, श्मशान, ईटों या चूने का भट्ठा, पानी का डबरा या नाले के निकट मकान नहीं बनवाना चाहिए।
घर बनाते समय उसकी कुर्सी भूमि से दो-तीन फीट ऊँची रखनी चाहिए; जिससे घर में पानी न भर सके और नालियों में काफी ढलाव रखा जा सके। प्रत्येक दीवार की मोटाई साधारणतः डेढ़ फीट और ऊँचाई लगभग दस फीट होनी चाहिए। गर्म देशों में कमरों को ठंडा रखने के लिए मकान ऊँचा और दो मंजिला बनाना अधिक उपयुक्त होता है। कमरों में हवा के खूब आवागमन हेतु कई खिड़की और दरवाजे अवश्य रखने चाहिए। हर कमरे में कम से कम दो खिड़की आमने-सामने बनानी चाहिए। इसे क्रॉस वेंटिलेशन कहते हैं।
रसोई का कमरा इस ढंग का बनाना चाहिए कि उसमें धुआं निकलने का विशेष प्रबन्ध हो, जिससे, उसकी दीवारें, बर्तन और अन्य सामग्री धुएँ में खराब न हो। रसोई का धुआं घरके अन्य कमरों तक भी न पहुँचे, इसलिए वह सोने-बैठने के कमरों से अलग बनाया जा सके तो अच्छा रहता है।
घर का संडास रसोई घर और सोने-बैठने के कमरों से सर्वथा अलग और पूर्ण वैज्ञानिक ढंग से बना होना चाहिए। सुविधा पूर्वक भरपूर सफाई हो इसलिए संडास चौड़ा, हवादार और प्रकाशयुक्त बनाना चाहिए।
रहने के घर में ही पशुशाला कदापि नहीं रखनी चाहिए। प्रायः गाँव वाले ऐसा ही करते हैं जो अत्यन्त अस्वास्थ्यकर हैं। पशुओं के रहने की जगह मकान के बाहर और थोड़ी दूर पर हो तो हितकर होता है।
घर हर दशा में ऐसा होना चाहिए कि उसमें पर्याप्त सूर्य का प्रकाश और भरपूर हवा आती हो। घर में खुला आँगन अवश्य बनाना चाहिए जो सर्वथा समतल हो। आंगन और सभी कमरों का फर्श यथासंभव पक्का, धोने योग्य ढाल बनाना चाहिए और उसमें पानी निकालने के लिए नाली अवश्य होनी चाहिए।
घर के गंदले पानी और मल-मूत्र की नियमित सफाई के लिए कमरों और आंगन में छोटी-छोटी नालियाँ बनाकर उसका सम्बन्ध घर की प्रधान नाली से जोड़ देना चाहिए। हर नाली और घर के बाहर तक जानेवाला परनाला ऐसा ढालू बनाना चाहिए कि उसमें कहीं भी पानी या कीचड़ जमा न हो सके और गंदला पानी सर्राटे से बाहर निकल कर सार्वजनिक नाली में मिल जावे।
घर का कूड़ा-कर्कट और जूठन आदि डालने के लिए घर में एक नियत स्थान बनाना चाहिए जो ढका रक्खा जा सके। इसी प्रकार पानी के रखने के लिए भी एक छायादार स्थान नियत रखना चाहिए जो सर्वदा स्वच्छ रहता हो।
इस प्रकार व्यवस्थित बना हुआ घर रहने के लिए किराये पर भी लेना चाहिए, जिसमें भरपूर सफाई की सुविधा हो।
मुहल्ले की सफाई
गली-मुहल्ले में कूड़ा-कर्कट, कीचड़ और अन्य गंदी वस्तुओं की सड़ाँध से सारे क्षेत्र का वायु-मण्डल दूषित हो जाता है, जिससे वहाँ रहनेवाले हर व्यक्ति का रोग ग्रस्त और अस्वस्थ होना संभव है। इसलिए घर की सफाई के साथ ही मुहल्ले की गली या सड़क की गंदगी रोकने के लिए हर व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी है।
घरों से नित्य निकलने वाला कूड़ा-कचरा, कागज और कपड़े की चिन्धियां, राख, सड़ी शाक-सब्जी, सड़ा या बासी अन्न, रसोईघरका कचरा, जानवरों की लीद या खराब घास आदि को घर के बाहर ही गली या सड़क पर न डालकर सदा ही बस्ती के बाहर या मुहल्ले के लिए निश्चित कूड़ा घर में ही डालना चाहिए।
प्रायः सामान्य घरों के लोग अपने बच्चों को घर के बाहर ही गली या सड़क पर नाली के किनारे टट्टी फिराते हैं। यह आचरण सामूहिक स्वच्छता के लिए अभिशाप है | इससे बच्चों की आदत और स्वास्थ्य भी खराब होता है, और गली-मुहल्ले की गंदगी बढ़ती है। जिससे रोग फैलने में बहुत मदद मिलती है | मुहल्ले में चाहे जहाँ मल-मूत्र करना, पीक डालना, जूठे दोने-पत्ते या कूड़ा डालना आदि सामूहिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकर होता है और यह एक अपराध भी है।
नगरों में म्यूनिसिपल्टियों की ओर से गली, सड़क के कूड़ा और नालियों की सफाई का प्रबन्ध रहता है। घरों का कूड़ा-कर्कट एक स्थान पर एकत्र करने के लिए कूड़ा घर बने रहते हैं या स्थान-स्थान पर लोहे के बड़े-बड़े ढोल रक्खे रहते हैं। कूड़ा-कचरा इनमें ही डालना चाहिए और स्वच्छता के लिए सभी सरकारी नियम-आदेशों का, कर्त्तव्य मानकर पालन करना चाहिए। यदि सफाई के लिए नियुक्त सरकारी कर्मचारी सफाई में ढील करें तो उन्हें एक दिन भी क्षमा नहीं करना चाहिये और उच्च अधिकारियों तक उनकी लिखित शिकायत अवश्य पहुँचानी चाहिए।
गाँव की सफाई
स्वच्छता के विषय में व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही दृष्टियों से हमारे गाँव बहुत पिछड़े हुए हैं-- यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। यदि ग्रामवासी भाई अपनी अज्ञानता और लापरवाही त्याग कर स्वच्छता पर ध्यान देने लगें तो प्राकृतिक सुखों से सम्पन्न स्वर्ग के समान ग्रामों का जीवन नारकीय न बने।
गाँवों में घर के कूड़ा-कचरा के अतिरिक्त पशुओं के मल-मूत्र और घास-पात की गंदगी भी बहुत बढ़ती है। सबसे बड़ा दोष यह है कि गाँव में लोग रहने के मकान में ही अपने पशु रखते हैं। एक तो वैसे गाँवों के घर छोटे-छोटे, प्रकाशहीन और पर्याप्त हवादार न होने से अस्वास्थ्यकर होते हैं, उस पर, घरों में ही पशुओं का गोबर, घास, कूड़ा का ढेर रहने से सदा ही घरों का वातावरण दूषित एवं रोगों का केन्द्र बना रहता है।
राष्ट्रीय सरकार ने अब ग्रामों के विकास पर ध्यान दिया है और वहाँ स्वच्छता का प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौप दिया है। पंचायतों को प्राथमिक प्रबन्ध यह करना चाहिए कि पशुशालायें रहने के घरों से सर्वथा अलग बनाई जावें। ऐसे गड्ढे बस्ती से दूर बनाये जावें जिसमें पशुओं का मल-मूत्र, घास-पात और घरों का कूड़ा-कचरा इकट्ठा किया जा सके। ऐसा करने से ग्रामों में घरों और गलियों की गंदगी कम होगी और पशुओं का मल-मूत्र गड्ढों में रखने से बढ़िया कम्पोस्ट खाद तैयार होगा जो खेती के काम में आकर अधिक अन्न उत्पादन में सहायक होगा और कृत्रिम खाद की आवश्यकता न रहेगी।
ग्रामीण भाई शौच करने के लिए गाँव के बाहर जाते हैं, फिर भी खेतों में चाहे जहाँ मलत्याग करने की उनकी आदत अच्छी नहीं। ग्रामों में महात्मा गान्धीजी द्वारा सुझाई गई शौच-व्यवस्था बड़ी उपयोगी हो सकती है। गाँव से बाहर किसी स्थान पर एक फीट चौड़ी और ६-७ फीट गहरी एक लम्बी नाली बनाई जाय। उस पर ऊपर बैठने लायक एक पटिया लगा हो, जिसमें बीचो बीच गोलाकार छेद हो, जिससे त्यागा हुआ मल नाली में गिरा करे।
एक व्यक्ति के बैठने लायक स्थान के चारों ओर पर्दे के लिए जूट या चटाई की बाड़ बनाई जा सकती है। शौच करने वाला इसमें मल-त्याग के अनन्तर मल पर मिट्टी डाले। [मल ढकने वाला वाक्य OCR में अधूरा है।] जब नाली का गड्ढा भर जाए, तब शौचालय की पटिया को आगे बढ़ाकर नया संडास बना लिया जाय। ऐसा करने से मल उस नाली में एकत्र होता जायगा, जो बदबू या गंदगी नहीं फैलायेगा और कुछ दिनों बाद नाली में एकत्र मल से बहुत बढ़िया खाद तैयार हो जायगा।
ऐसी नाली सामूहिक रूप से सारे गाँव के लिए एक स्थान पर बनाई जा सकती है, अथवा एक-एक परिवार अपने लिए पृथक-पृथक भी बना सकते हैं।
नगर की सफाई
नगरों में नालियों, सड़कों, अन्य सार्वजनिक स्थानों और संडासों के मैले की सफाई का प्रबन्ध म्युनिसिपैलिटी आदि स्थानिक संस्थाओं के स्वास्थ्य विभाग के नियन्त्रण में रहता है। ये विभाग विभिन्न विधियों से सफाई की व्यवस्था करते हैं।
नगर में गंदगी उत्पन्न करने के साधन मुख्यतः मनुष्यों और पशुओं का मल मूत्र, घरों का कुड़ा-कचरा, रसोई घर, नहाने-धोने, कारखानों और वर्षा का पानी इत्यादि होते हैं। पानी आदि को बस्ती से बाहर करने के लिए सफाई विभाग, सारे नगर में छोटी-बड़ी नालियों का जाल बिछा देता है, जिससे नगर का सारा गंदा पानी बस्ती के बाहर किसी नदी या जलागार में छोड़ दिया जाता है।
संडास के मैले को साफ करने की दो पद्धति नागरिक क्षेत्र में हैं। एक जमादार द्वारा राख डालकर मैला उठाना, दूसरा संडास में खूब पानी डालकर मैले को नाली में बहा देना। राख डालकर मैला उठाना अच्छा है, और मैले को नाली में बहाना बहुत बुरा है यदि खड्डी वाला संडास हो तो, शौच के लिए पानी मल स्थान से आगे खसक कर नाली में लेना चाहिए, जिससे मल पर पानी न गिरे और वह संडास के बाहर न बहे।
मल पर राख डालते रहना चाहिए जिससे वह सूखा रहे और बदबू न फैले। नगर पालिका द्वारा मैल और अन्य कूड़ा-कर्कट की सफाई के लिए मुख्यतः तीन साधन काम में लाये जाते हैं;
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गाड़ियों या हाथठेलों से बस्ती का कूड़ा और मैला एकत्र कर बस्ती के बाहर फेंक देना, जला देना या पृथक्-पृथक् गड्ढों में दबाकर खाद बनाना।
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मैले को सुखाकर फेंक देना या गाड़ देना।
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मल-मूत्र को भूमि के नीचे बनी नालियों द्वारा पानी की सहायता से नगर के निकट बहने वाली नदियों में छोड़ देना।
इनमें पहली दो पद्धतियों से, जहाँ फ्लश की टट्टियाँ नहीं होती, वहाँ नगर का मल-मूत्र साफ किया जाता है; परन्तु जहाँ बड़े नगरों में फ्लश के संडास होते हैं वहाँ अधिकांश तीसरी 'जल वहाऊ' पद्धति से काम लिया जाता है।
बड़े नगरों में भूमि के नीचे मैले मिश्रित पानी और पीने के जल के बड़े-बड़े नल प्रायः पास ही पड़े रहते हैं। एक से पीने का पानी आता है दूसरे से मैला पानी जाता है। कभी-कभी यदि यह दोनों नल कहीं फूट जाते हैं या सन्धियों से होकर मैला पानी, पीने के जल वाले नल में मिश्रित हो जाता है तो पीने का जल दूषित हो जाता है और उससे जनता रोगग्रस्त हो जाती है। इसलिए 'जल बहाऊँ' पद्धति में सुधार अपेक्षित है।
मैले का पानी नदी में छोड़ने की अपेक्षा यह अधिक हितकर एवं उपयोगी हो सकता है कि उसको नगर से बाहर दूर ले जाकर खेतों में छोड़ा जाय अथवा भूमितल में एकत्र करके सिंचाई के काम में लाया जावे। जहाँ खेतों में वह मैला मिश्रित पानी छोड़ा जाय या मैले खाद डाले जायें, वहाँ की भूमि ऊपर से कड़ी और भीतर से पोली नहीं होनी चाहिए।
जहाँ गाड़ियों या ठेलों द्वारा मैला और कूड़ा ढोने के साधन हैं वहाँ के निवासियों को घरों का कूड़ा-कचरा दिन में एक बार ही निकालना चाहिए और उस समय के पूर्व घर का कचरा कूड़ादान में डाल देना चाहिए जब कि म्युनिसिपैलिटी की कूड़ा गाड़ी उसको उठाने आती हो। नगर में स्वच्छता के मामले में हर नागरिक को सफाई विभाग के साथ पूरा सहयोग करना चाहिए।
अभी यह स्थिति है कि हम लोग खुद ही गन्दगी फैलाते हैं। गांव के चारों तरफ टट्टी पड़ी रहती है, स्त्रियाँ लज्जावश अन्धेरे में शौच करती है। गाँव घर के समीप ही जाती है; बच्चे तो घर के सामने ही टट्टी फिरने के आदि हो जाते हैं। इस तरह गन्दगी के परकोट में रहने वाले रोगी और दुःखी न हों तो आश्चर्य करना चाहिए।
सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता
सार्वजनिक उपयोग में आनेवाले स्थान, जैसे- नदी तालाब के घाट, व्यायाम तथा खेल के मैदान, हाट-मेलों की जगह कुआँ-बावड़ी, बाग-बगीचे, पब्लिक पार्क, चौपाल और देवस्थान, वट या पीपल का वृक्ष -- ये सब ऐसी जगह हैं जहाँ बहुत आदमियों के समूह एकत्र हुआ करते हैं। इसलिए इन स्थानों की गन्दगी का कुप्रभाव सामूहिक स्वास्थ्य पर बहुत पड़ता है।
खेल कूद या अन्य कामों के उपयोग में आनेवाले खुले मैदानों, नदियों या तालाबों के किनारे अथवा बाग या पार्कों में यत्र-तत्र कहीं भी शौच करने, पेशाब करने, थूकने या पीक डालने की आदत अत्यन्त निकृष्ट होती है। इसी प्रकार नदी या तालाबों में रोगी व्यक्तियों के मल-मूत्र सने कपड़े धोना या जानवरों को नहलाना हानिकारक है। नदी या तालाब के किनारे मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए।
जहाँ बहाव न हो और पानी थमा हो, वहाँ शौच के हाथ और पात्र भी पानी में नहीं धोना चाहिए। नदी, तालाब के किनारों की गंदगी और मैला, जब वर्षा होती है तब प्रवाह के साथ नदी, तालाब में ही सिमट आता है और उससे पानी में भयंकर रोगों के कीटाणु उत्पन्न होते हैं, जो अनेक संक्रामक रोग फैलाते हैं।
प्रायः जो लोग शाम को पब्लिक पार्कों में घूमने जाते हैं, वे चाट पकौडी खाकर जूठे पत्ते वहीं आस-पास फेंक देते हैं। मूंगफली के छिलके, कागज की चिन्दियाँ, बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े आदि भी यत्र-तत्र चाहे जहां डाल देते हैं, जिससे पार्कों में बहुत गंदगी फैलती हैं।
सार्वजनिक स्थानों की नियमित सफाई का कोई विशेष प्रबन्ध नहीं होता। ऐसी दशा में वहाँ गंदगी उत्पन्न करना अपराध और पाप करने के समान है। स्वास्थ्य विभाग को प्रेरित करके सार्वजनिक स्थानों की सफाई करना चाहिए। यदा-कदा सामूहिक श्रमदान करके इन स्थानों को स्वयं साफ करने का प्रयास करना भी बहुत अच्छा है।