राजयक्ष्मा (तपेदिक)
12 मिनट का पाठ
वायु से फैलने वाले संक्रामक रोगों में क्षय सबसे भयंकर है । यह महारोग जीवन-सुख को नष्ट करके, अल्पायु में ही मृत्युकारक है । घर में किसी एक को होने पर यह रोग असावधानीवश परिवार के अन्य जनों की भी लग जाता है । इतना ही नहीं इसका क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक चलता है । इसलिए इस भयानक रोग से बचाव रखना प्रत्येक के लिए अत्यावश्यक है ।
वर्तमान काल में, क्षयरोग, हमारे देश के लिए एक बड़ी समस्या है । संसार भर में सबसे अधिक लोक प्रतिवर्ष भारत में क्षय के रोगी होते हैं। जनसामान्य की व्याधि-क्षमता और जीवशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाने से यह स्थिति है कि क्षय के कीटाणु, अल्पाधिक मात्रा में, प्रायः शत प्रतिशत व्यक्तियों में पाया जाना असंभव नहीं है । शरीर में क्षय के कीटाणु रहते हुए भी, बहुतसे व्यक्ति ब्याधि-क्षमता में सबल और स्वस्थ हुए तो स्वतः ही अच्छे हो जाते हैं और उन्हें सामान्यतः पता भी नहीं लगता कि कब क्षय हुआ और कब ठीक हो गया । तथापि वर्तमान काल में, विशेषकर हमारे देश में लाखों व्यक्ति क्षयग्रस्त होकर जीवन खो देते हैं ।
क्षयरोगी के थूक में क्षय के अगणित कीटाणु रहते हैं, इसलिए रोगी का थूक (कफ) सर्वाधिक संकाय कारण हो hota h थूक में mile क्षयके रोगाणु अंधेरे स्थान में तो महीनों तक जीवित रहते हैं, और उनमें रोग संक्रमण की शक्ति बनी रहती है । भली-भाँति प्रकाशित और हवादार स्थानों में भी क्षय के रोगाणु ७-८ दिन तक जीवित रहते हैं । खुली धूप में अवश्य ही ५-६ घण्टों में मर जाते हैं ।
रोगी का थूक (कफ) यदि खुला पड़ा रहे तो रोगाणु दूसरे व्यक्तियों पर निश्चित आक्रमण करते हैं । थूक सूखने पर उसके छोटे-छोटे कण हवा में मिल जाते हैं और नाक से श्वास द्वारा दूसरे व्यक्तियों में प्रवेश पा जाते हैं, अथवा थूक के वे कण ( रोगाणु) हवा की धूल के साथ खाने-पीने के पदार्थ पर जम जाते हैं; और जो भी उन पदार्थों को खाता है, उसके शरीर में पहुँच कर, क्षय के रोगाणु अपनी सृष्टि करते हैं । इसी प्रकार क्षय रोगी के प्रश्वास से निःसृत वायु में क्षय के कीटाणु होते हैं जो दूसरों के श्वास में मिलकर उन्हें रोगी बनाते हैं ।
धूल, धुआँ, बालू तथा रेशम, सूत या जूट के रेशे जिस वायु मण्डल में मौजूद हों, जूट, कपड़ा, रेशम आदि के मिलों में काम करने वाले व्यक्तियों को क्षय-रोग बहुत होता है । इसका कारण यह है कि उक्त प्रकार के वायुमण्डल में काम करने वाले लोगों के फेफड़े निश्चित रूप से कमजोर हो जाते हैं । वायु में मिश्रित धूल, धुआं, बालू या रेशे - फेफड़ों पर अपनी तह जमा लेते हैं, जिससे फेफड़े मैले और अशक्त हो जाते हैं । मैले और निर्बल फेफड़ों पर क्षय के कीटाणु शीघ्र ही प्रभाव कर लेते हैं । अधिक जनाकीर्ण गंदे, दुर्गन्धयुक्त, सील एवं दूषित हवा वाले स्थानों में निरन्तर रहने वालों को भी क्षय रोग शीघ्र होता है ।
क्षय से पीड़ित गाय-भैंस का दूध पीने से भी क्षयरोग हो जाता है । परन्तु बकरी का दूध सर्वथा निरापद है, बल्कि क्षय निवारण में सहायता करता है । क्योंकि बकरी पर क्षय के कीटाणु कोई बुरा प्रभाव नहीं कर पाते ।
क्षयरोग फैलता तो संक्रमण से ही है; परन्तु इसकी उत्पत्ति का मूल कारण शारीरिक शक्ति और रस-धातुओं का अत्यधिक अपव्यय है । निरन्तर शक्ति से अधिक परिश्रम करते रहने, अधिक मैथुन करने और भोजन में पर्याप्त पौष्टिक तत्व न लेने से जो शरीर कृश हो जाता है, वह क्षय-कीटाणुओं को अपनी सृष्टि बढ़ाने के लिए एकदम अनुकूल होता है । वास्तव में शरीर की रस-धातुओं, बल-वीर्यं और ओज के अनुचित अपव्यय से शरीर का क्षय (क्षीणता) हुआ हो। तो वह क्षय रोग है । इसलिए क्षयरोग से बचाव का सबसे उत्तम साधन पौष्टिक आहार और शारीरिक शक्तियों का अपव्यय न करना ही है । क्षय रोगी के संक्रमण से सावधान रहना भी आवश्यक है ।
जब भी देखें कि घर में किसी को निरन्तर ज्वर रहता है, साथ में खाँसी आती है और शरीर धीरे-धीरे क्षीण हो रहा है । वजन घट रहा है और चेहरा रूखा पड़ता जा रहा है, तो समझ लीजिए कि उसको क्षय हो रहा है । ऐसी स्थिति होने पर यथाशीघ्र रोगी का एक्सरे तथा थूकादि की परीक्षा करा लेनी । चाहिए और क्षय सिद्ध होने पर उसको किसी सेनिटोरियम' (क्षय चिकित्सालय ) में भरती कर देना चाहिए । ' सेनिटोरियम' में भरती कराना शक्य न हो तो घर में ही रोगी को पृथक रखने का प्रबन्ध करके सुयोग्य चिकित्सक से इलाज कराना चाहिए ।
घर में रोगी को एकदम स्वच्छ, खुले, हवादार, सुप्रकाशित, थोड़ी धूप आने-वाले शान्त स्थान में इस प्रकार अलग रखना चाहिए, कि घर के बच्चे या अन्य लोगों को रोगी के पास ही न रहना पड़े । रोगी के कमरे में किसी दूसरे का सोना हानिकर है, क्योंकि वहाँ व्याप्त रोगाणु दूसरे के श्वास में मिलकर उसे श्री क्षयरोगी बनावेंगे ।
ऐसा प्रबन्ध होना चाहिए कि क्षयरोगी चाहे जहाँ न थूक कर, एक नियत और ढक्कनदार पात्र में ही थूका करे और उसमें तुरन्त राख या चूना डालकर ढक दिया करे ।
रोगी के उपयोग में आने वाले बर्तन और वस्त्रादि को भलीभांति स्वच्छ किये बिना अन्य लोग उपयोग करे तो उन्हें भी क्षय हो जाता है । क्षय रोगी के साथ लेटने सोने वाले को तो निश्चित ही क्षय रोग लग जाता है ।
रोगी के थूक आदि से सने हुए वस्त्रों को खूब उबालकर साफ करके विसंक्रमित अवश्य ही करना चाहिए ।
क्षयरोगी के कमरे को सदा ही विशेष रूप से स्वच्छ रखना आवश्यक है । झाडू से झाड़ने मात्र की अपेक्षा कमरे को जीवाणुनाशक घोल से धोना चाहिए अथवा घोल में भीगे कपड़े से साफ करना चाहिए । कमरे का फर्श कच्चा हो तो उसको गोमूत्र मिले गोबर से नित्य लीपना चाहिए । कमरे में गोमूत्र छिड़कना, चूना डालना और गूगल या राल की धूप जलाना, कीटाणुनाशन के लिए हितकर है ।
रोगी के ओढने - बिछाने के कपड़ों को नित्य नियम से कुछ देर धूप में सुखाना चाहिए । इससे रोगाणुओं का नाश होता है ।
क्षयरोगी को भरपूर विश्राम, दूध और पाचन शक्ति के अनुरूप यथोचित पौष्टिक भोजन देना रोग मुक्ति में सहायक होता है ।
वैसे तो आजकल ऐसी औषधे और चिकित्सा सुलभ है कि क्षयरोग अच्छा हो जाता है; तथापि क्षय का रोगी होना ही जीवन का सर्वनाश समझना चाहिए । जब रोग होगा, तब दवा कर लेंगे - ऐसा सोचने के बजाय, हितकर यह है कि पहले से ही सावधान रह कर रोग को उत्पन्न ही नहीं होने देना चाहिए ।
क्षय- निवारण के लिए हमारी राष्ट्रीय सरकार, पिछले कुछ वर्षों से विशेष चिन्तित और प्रयत्नशील है । कृत्रिम रूप से जनता की व्याधि-क्षमता बढ़ाने और क्षय का संक्रमण रोकने के लिए बड़े पैमाने पर टीकों का प्रयोग किया जा रहा है । इन टीकों के प्रयोग से क्षय का प्रसार रोकने में कहाँ तक सिद्धि होगी, यह अभी नहीं कहा जा सकता ।
फिर भी यह निश्चित सत्य है कि टीका लगाकर प्राप्त की गई व्याधि-क्षमता सर्वथा कृत्रिम होती है, और उसका स्थैर्य तो निश्चित है ही नहीं । इसलिए यह अधिक उचित एवं श्रेयस्कर होगा कि क्षय-निवारण हेतु, जिन कारणों से क्षय रोग उत्पन्न होता है और फैलता है, उन कारणों के उन्मूलन का उपक्रम किया जाय, जिससे उसकी उत्पत्ति का स्रोत ही समाप्त हो ।
आजकल क्षयरोग फैलने के सर्वाधिक प्रमुख कारण -- नागरिकों की स्वास्थ्य दुर्बलता, शक्ति से अधिक परिश्रम, पौष्टिक आहार की कमी, असंयत स्त्री-संभोग, अनियमित आहार-विहार, गंदी आब-हवा और घनी तथा गन्दी बस्तियाँ हैं । इन कारणों से ही नागरिकों का स्वाभाविक स्वास्थ्य इतना निर्बल हो जाता है और शरीर की व्याधि क्षमता इतनी अशक्त हो जाती है कि उस शरीर में क्षय रोगों के कीटाणु प्रवेश करके कमजोर फेफड़ों में अपनी जड़ जमा लेते हैं । क्षय-कीटाणुओं को संक्रमण की सुविधा अशक्त शरीर में ही होती है ।
वस्तुतः क्षय के उपरोक्त मूल कारणों को दूर करने के उपाय दृढ़ता से किये जावें तो भारत में क्षय निवारण में पर्याप्त सफलता मिल सकती है । अतिकाम-संभोग क्षय रोग की उत्पत्ति का सबसे बड़ा कारण है; अतएव प्रभावपूर्ण ढंग से जनता में ब्रह्मचर्य पालन का प्रचार किया जाना चाहिए । कामोत्तेजक साहित्य, दृश्य, सिनेमा आदि पर कठोर प्रतिबन्ध होना चाहिए । विशेषकर विद्यार्थी वर्ग और नवयुवकों को विलासितापूर्ण वातावरण और काम-वासनोद्दीपक साहित्य तथा सिनेमा से दूर रखने के प्रभावोत्पादक उपक्रमों का होना आजकल बहुत आवश्यक है । ऐसा करने से उत्कृष्ट नागरिक चरित्र-निर्माण में सहायता मिलेगी और ब्रह्मचर्य पालन- प्रवृत्ति से जनसंख्या वृद्धि की राष्ट्रीय समस्या का यथार्थ एवं स्वाभाविक हल भी होगा तथा क्षय रोग की उत्पत्ति भी न होगी ।
क्षयोत्पत्ति का दूसरा प्रमुख कारण भोजन में पौष्टिक तत्त्वों की कमी है । इसके लिए भारतीय भोजन में घी-दूध आदि पौष्टिक तत्त्व अवश्य ही ग्रहण करने के लिए जनता को व्यापक रूप से प्रेरित करना चाहिए । यह पूर्ण विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि दुधारू पशुधन के पालन-पोषण पर यथार्थ ध्यान दिया जावे तो अब भी भारत में परम पौष्टिक पदार्थ दूध-घी की कमी नहीं है ।
शक्ति से अधिक और अतिशय परिश्रम करने की प्रवृत्ति को प्रचार मात्र से नहीं रोका जा सकता । मनुष्य को अपनी परिस्थिति और अनिवार्य आवश्यकताओं के अनुसार जीवन- निर्वाह के लिए परिश्रम करना ही पड़ता है । अतिशय परिश्रम का सबसे बड़ा कारण निर्धनता है; उसमें तो जब सुधार होगा, तब होगा, तथापि अतिशय परिश्रम करने वालों को भोजन में पुष्टिकारक तत्त्व मिलें तो उन्हें परिश्रम से हानि न हो ।
गन्दी बस्तियों का उन्मूलन करके अस्वच्छ अस्वास्थ्यकर वातावरण एवं रहने के तरीकों में तो यथाशीघ्र ही सुधार किया जा सकता है । सरकार के स्वास्थ्य विभाग और मुख्यतः स्थानिक नगरपालिकायें हो यदि अपने कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें और बस्तियों में सफाई तथा स्वच्छ वायु-संचरण का समुचित प्रबन्ध करने को प्राथमिकता दी जावे तो क्षय के अतिरिक्त अन्य संक्रामक रोगों के निवारण में भी सफलता मिल सकती है ।
मसूरिका (चेचक )
वायु-संवाहित रोगों में मसूरिका (चेचक या शीतला ) भी हमारे देश में बहुत होता है । इसके कीटाणु इतने प्रबल होते हैं कि उनके प्रहार से बचने की व्याधिक्षमता किसी में भी नहीं होती । यह बड़ा भयानक और कष्टकारक छूत का महारोग है । यह रोग बहुधा बचपन में ४-५ वर्ष की अवस्था तक अधिक हुआ करता है । आजकल तो जवानों को भी चेचक होते देखा जाता है । चेचक / की महामारी प्रायः बसन्त ऋतु में ही आती है । उष्ण जलवायु प्रधान होने से भारतवर्ष तो जैसे इसका घर ही है । प्रति ५-६ वर्ष बाद इसका तीव्र दौरा-सा आता है । एक बार यह रोग होने पर शरीर में स्वमेव स्थायी रोग-क्षमता उत्पन्न हो जाती है, इसलिए किसी को यह रोग दोबारा प्रायः नहीं होता ।
चेचक के लक्षण और रूप अब सभी जानते हैं । यह रोग यदि बढ़ जाता है तो रोगी प्रलाप करने लगता है, शरीर में कम्प बढ़ता है और अन्त में रोगी प्राण त्याग देता है ।
लगभग समूचे देश में हिन्दू जनता चेचक को रोग न मानकर शीतला नामक देवी का प्रकोप मानती है । इसलिए चेचक की चिकित्सा न कराकर अधिकतर लोग झाड़-फूक और देवी-पूजन पर निर्भर रहते हैं । चिकित्साशास्त्र के मतानुसार यह रोग स्वतः अच्छा होने वाला अवश्य है; तथापि बिगड़ जाने पर यह निश्चित मृत्यु का कारण बनता है । इसमें सन्देह करने का कोई कारण नहीं कि चेचक छूत से फैलने वाला एक भयंकर रोग है । अच्छा हो जाने पर भी यह मनुष्य को सदा के लिए कुरूप बनाकर छोड़ता है । मुख और शरीर पर इसके गहरे दाग जीवन पर्यन्त बने रहते हैं ।
बचपन में एक दो वर्ष की आयु में ही चेचक से बचाव के लिए टीका लगवा लेना चाहिए। एक बार लगा टीका १०-१२ वर्ष तक व्याधि क्षमता बनाये रहता है; इसलिए युवावस्था तक यदि प्रति पांचवे वर्ष चेचक का टीका लगवा लिया जाय तो जीवन भर इस रोग से रक्षा हो सकती है ।
चेचक में रोग का विष और संक्रामक कीटाणु रोगी की त्वचा, मुख और नाक के बलगम में, फुन्सियों की पीव की खुरन्टों में मल-मूत्र में और शरीर के प्रायः प्रत्येक स्राव में रहते हैं । अतएव रोगी के दूषित कपड़े यथासंभव जला ही देना चाहिए । रोगी के कपडे यदि अविशोधित रह जावें, तो बहुत दिनों बाद भी उनको स्पर्श करने या उपयोग में लाने से दूसरे व्यक्ति को निश्चित रोग लग सकता है । कपड़ों के साथ ही रोगी के काम में आये हुए बर्तन और अन्य वस्तुओं को भी भली-भाँति विशोधित कर लेना चाहिए ।
फुंसियों से जब खुरन्ट झरता है, तब यह रोग अत्यन्त संक्रामक हो जाता है । खुरन्टों के सूक्ष्म कणों में सर्वाधिक तीव्र संक्रमण - शक्ति होती है । इसलिए खुरन्ट निकलते समय रोगी को स्पर्श कदापि नहीं करना चाहिए । निकले खुरन्टों को सावधानीपूर्वक कपड़े झाड़कर तत्काल जला देना चाहिए । अन्यथा फुन्सियों के इस खुरन्ट में व्याप्त रोगाणु-कण वायु में मिलकर इस रोग को सर्वत्र फैलाते हैं ।