आरोग्य-प्रकाशसूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार

8 मिनट का पाठ

संसार में प्रचलित व्यायामों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वसुलभ और सबके करने योग्य पूर्ण वैज्ञानिक व्यायाम 'सूर्य नमस्कार' है। इसे बालक - वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं। आयुर्वेद तो अपने जन्मकाल से ही सूर्य को आरोग्य का देवता मानता आ रहा है। अब यूरोप और अमेरिका के सभी विख्यात पुरुषों ने भी हाइजी-निया की जगह सूर्य को ही आरोग्य का देवता स्वीकार कर लिया है 'फिजि-कल कल्चर' मासिक पत्रिका जुलाई १९२६ में डा० गार्डनर रोन ने लिखा है-- ' "वस्त्र रहित होकर धूप में बैठो। सूर्य वैद्यों तथा औषधियों का राजा है शास्त्र कहता है कि "सूर्य आरोग्य का मूल है"।

सूर्य नमस्कार - एक ऐसा व्यायाम है, जिससे शारीरिक बल तो बढ़ता ही है, मानसिक उन्नति भी होती है; क्योंकि कसेरु- संकोच (सूर्य नमस्कार का छठा आसन) तथा कसेरु - विकसन (सूर्य नमस्कार का सातवाँ आसन) से स्नायु मण्डल का व्यायाम होता है, जिससे स्नायु मण्डल सशक्त होकर मानसिक बल प्राप्त करता है। हिन्दू सूर्य को ईश्वर का प्रतीक मानते हैं एवं उसकी उपासना द्वारा निश्चित रूप में आध्यात्मिक उन्नति करते हैं।

इस प्रकार सूर्य नमस्कार से सर्वाङ्गीण-शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। प्रातः काल जब तक सूर्य का रंग लाल रहता है, तब तक उसमें से नील- लोहितातीत (Ultra violet Rays) नाम की किरणें निकलती हैं। आज कल कृत्रिम नीललोहितातीत किरणों (Ultra violet Rays) द्वारा कई दुःसाध्य रोगों को दूर किया जाता है फिर प्राकृतिक नील-लोहितातीत किरणों (Ultra violet Rays) में सूर्य नमस्कार व्यायाम किया जाय तो कितना लाभ होगा; यह प्रत्येक विचारशील मनुष्य स्वयं समझ सकता है।

सूर्य नमस्कार के विषय में औंध के राजा साहब श्री भगवान राव श्रीनिवासरावजी पन्त ने अपना अनुभव इस प्रकार लिखा है-- "अपनी युवावस्था में मैंने पंजाब के स्व० प्रसिद्ध पहलवान इमामुद्दीन से कुश्ती की शिक्षा प्राप्त की थी। कुश्ती के अलावा जोर-जोड़ी, बैठक आदि भी मैं करता था। पुरानी व्यायाम पद्धति के अनुसार आवश्यक स्निग्ध और भारी चीजें भी मेरे खाने में आने लगी। इन सबके फलस्वरूप मेद बढ़ने लगा।

“सन् १८९८ में मैंने व्यायामपटु सैण्डो के सम्बन्ध में कुछ पुस्तकें पढ़ीं। तुरन्त ही मैंने सैण्डों के व्यायाम का साहित्य मँगवाया और पूरे दस वर्ष तक इस पद्धति से नियमित और अव्याहत व्यायाम किया। उनसे छाती के घेर में तो कुछ फर्क नहीं पड़ा; परन्तु कमर और पेट कुछ कम हुए।"

"आगे चलकर मेरे परम मित्र श्रीमान् राजा गङ्गाधर राव उर्फ बाला साहब पटवर्धन के उदाहरण सहित उपदेश के अनुसार, मैंने सन् १९०८ से नित्य नियम से पद्धतियुक्त और मन्त्रयुक्त सूर्य नमस्कार करना आरम्भ कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले का भारीपन नष्ट हुआ और शरीर हलका हो गया। पेट का घेरा १४ इंच कम हुआ और छाती ४३ इंच ही कायम है। वृत्ति आनन्दपूर्ण एवं उत्साहयुक्त हुई और मालूम होने लगा कि मुझे जवानी की फुर्ती फिर प्राप्त हो गई है। सर्वोत्तम लाभ यह हुआ कि २५ वर्ष से ज्वर आदि विकारों से मैं बिलकुल अलिप्त हूँ। यही नहीं, बल्कि डॉक्टरों के मतानुसार सर्दी-खाँसी आदि जो सामान्य विकार अनिवार्य हैं वे मेरे पास नहीं फटके।

"मेरे शरीर-सामर्थ्य एवं रोग प्रतिबन्धक शक्ति का आश्चर्यकारक प्रमाण यह है कि मैंने चार बार प्लेग का टीका लगवाया, उससे बुखार आना या सूर्य-नमस्कार में रुकावट डालने वाली रीति से शरीर का दुखना आदि बातों का मुझे बिलकुल अनुभव नहीं हुआ।

"आज पच्चीस वर्ष के पूर्ण अनुभव से मैं अधिकारयुक्त वाणी में जोर देकर कहता हूँ कि सब व्यायाम पद्धतियों में सूर्य नमस्कार-पद्धति अति उत्तम हैं। परमोत्तम शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य प्राप्त करा देने वाली है तथा किसी भी विकट परिस्थिति में या मानसिक आपत्ति में अचल एकाग्रता एवं मनोधैर्य प्राप्त करा देने वाली है। अतएव मैं निश्चित रूप से कहता हूँ सूर्य नमस्कार पद्धति अन्य सभी व्यायाम पद्धति से श्रेष्ठ है। "

नित्य प्रति सूर्य नमस्कार करनेवाले का अनायास ही प्राकृतिक व्यायाम होकर शारीरिक अंग-प्रत्यङ्ग सुदृढ़ व बलवान होता है और किसी प्रकार के रोग-शोकादि पास नहीं फटकते। सूर्य भगवान जैसे भौतिक जगत् में अन्धकार मिटा कर प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही आन्तरिक जगत् में भी उनके प्रकाश-प्रसार से अशुभ और असुखमयी अन्धकार की शक्तियों का नाश हो जाता है।

सूर्य नमस्कार के विभिन्न आसन

१. दोनों हाथ मिलाकर, छाती सामने निकाल कर, पीठ सीधी रखनी चाहिए। दोनों पैरों की अँगुलियाँ मिली हुई रहनी चाहिए, तथा पंजों में एक इंच का अन्तर रहना चाहिए। सीधे तनकर खड़े रहना चाहिए। दृष्टि नासिकाग्र के ऊपर रखनी चाहिए।

२. दोनों हाथों को नीचे लाकर पैरों के सामने रखना चाहिए। इस समय घुटने सामने की ओर न झुकने चाहिए।

३. दूसरी स्थिति में रखे हुए हाथ तथा बायें पैर को आगे रखकर दाहिना पैर जितना पीछे की ओर ले जा सकें, ले जाना चाहिए। छाती सामने निकालकर दृष्टि ऊपर आकाश की ओर रखनी चाहिए।

४. तीसरे आसन में रखा हुआ बाँया पैर पीछे लाकर दाहिने पैर के साथ मिलाना चाहिए। हथेली तथा अँगुलियाँ सभी जमीन पर लगी हुई रहनी चाहिए।

५. हथेलियाँ अपने स्थान से न हटाएँ। छाती दोनों हाथों के बीच जमीन पर लगाएँ; मस्तक और घुटने भी जमीन को छुएँ। इस स्थिति में आठों अंग जमीन का स्पर्श करते हैं। [इस चरण का बीच का कुछ पाठ OCR में अधूरा है।]

६. पांचवें आसन की स्थिति में दोनों हाथ पूरी तरह सीधे होने तक जमीन पर लगा हुआ मस्तक तथा छाती धीरे- धीरे ऊपर की ओर लानी चाहिए। तथा दृष्टि आकाश की ओर रखनी चाहिए।

७. सिर और छाती को हाथों के बीच में से लाते हुए चौथे आसन की दशा में आना चाहिए।

८. इसमें बाँया पैर पीछे ही रखकर दाहिना पैर दोनों हाथों के बीच में लाना चाहिए।

९. दूसरे आसन की तरह करना चाहिए।

१०. पहले आसन की तरह करना चाहिए।

हाथ-पैर आगे-पीछे करते समय, पहले नमस्कार में दाहिना, दूसरे में बायाँ, तीसरे में फिर दाहिना, इस तरह क्रमशः करना चाहिए।

आधुनिक व्यायामशाला

यहाँ पहले जैसे अखाड़े थे, उसी तरह आजकल बड़े शहरों में आधुनिक व्यायामशालाएँ खुली हैं। वहाँ सिंगलबार, डबलबार, चेस्ट एक्सपैण्डर आदि साधन रहते हैं और शिक्षक व्यायाम की विधिवत शिक्षा देते हैं। अनुभव से देखा गया है कि शरीर के विकास की दृष्टि से ये व्यायाम प्राचीन देशी व्यायामों या खेलों से अधिक श्रेष्ठ नहीं हैं तथा खर्चीले हैं। फिर भी इनमें जाकर व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।

व्यायाम के नियम

व्यायाम प्रारम्भ करने के पहले निम्नलिखित आवश्यक नियमों की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। तभी व्यायाम से उत्तम लाभ होता है।

१. व्यायाम खुले स्थान में करना चाहिए, ताकि शरीर को शुद्ध वायु मिले। अधिक शुद्ध वायु ग्रहण करना व्यायाम का उद्देश्य है।

२. व्यायाम करते समय निःश्वास-उच्छ्वास की गति बढ़ती है। साँस नाक से ही लेनी चाहिए।

३. व्यायाम अपनी शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए। शक्ति से अधिक व्यायाम करके शरीर को अत्यधिक थकाना घाटे का सौदा होगा।

४. व्यायाम उम्र के अनुसार करना चाहिए। बालक, युवा और वृद्ध के लिए अवस्था के अनुसार अलग-अलग व्यायाम उपयुक्त हैं।

५. व्यायाम के अनुसार स्निग्ध और पौष्टिक भोजन करना आवश्यक है। भोजन सुपाच्य हो और अधिक गरिष्ट न हो।

६. व्यायाम खाली पेट करना चाहिए भोजन के पूर्व या भोजन के काफी देर बाद।

७. व्यायाम नियमित और निश्चित समय पर करना चाहिए। किसी दिन सबेरे, किसी दिन दोपहर को और किसी दिन शाम को ऐसा अनियमित व्यायाम नहीं करना चाहिए।

८. व्यायाम के साथ ब्रह्मचर्य और संयम का होना आवश्यक है।

९. व्यायाम की मात्रा को क्रमशः बढ़ाना उचित है। सहसा अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए।

१०. सबसे अन्तिम, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यायाम प्रसन्नचित होकर करना चाहिए।

व्यायाम के सम्बन्ध में प्रसिद्ध महानुभावों के अनुभव

मैं बचपन से दुर्बल रहा हूँ, परन्तु कुछ काल बाद मुझे शारीरिक शक्ति की आवश्यकता प्रतीत हुई। आज मेरी इस महानता का प्रमुख कारण मेरा नियमित भ्रमण और आरोग्य-प्राप्ति का दृढ़ आचरण है।

—महात्मा गाँधी

मानसिक स्वास्थ्य के लिए शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है। आसन-व्यायाम द्वारा ही मैंने इतनी आध्यात्मिक उन्नति की है।

—स्वामी रामकृष्ण परमहंस

मानसिक दुर्बलता को दूर करने के लिए शारीरिक शक्ति का संचय आवश्यक है। बिना आरोग्य और शारीरिक बल के पुण्य-दर्शन असम्भव है।

—स्वामी विवेकानन्द

शारीरिक उन्नति के बिना जीवन की कोई सफलता नहीं मिल सकती। अतएव हमारे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य स्वास्थ्य और शक्ति है।

—स्वामी रामतीर्थ

स्वास्थ्य और आरोग्य के सम्बन्ध में मैंने बहुत कुछ अनुभव किया है और निश्चय किया है कि प्रतिदिन व्यायाम करना और उसके साथ वॉलीबॉल की तरह का कोई खेल अवश्य खेलना चाहिए।

—थ्योडोर रूजवेल्ट

मैं तो यही समझता हूँ कि मनुष्य को अपने शरीर की मशीनरी दुरुस्त रखने के लिए प्रातःकाल का भ्रमण एक बहुत अच्छा साधन है।

—जे. पी. मॉरगन