ब्रह्मचर्य अर्थात् संयम
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आहार और निद्रा के बाद पूर्ण स्वास्थ्य का तीसरा आधार ब्रह्मचर्य (संयम) है।
आयुर्वेदोक्त स्वास्थ्य - प्रसंग में ब्रह्मचर्य का अभिप्राय यह नहीं है कि काम-वासना का एकदम ही दमन कर दिया जाय। स्वास्थ्य-रक्षा के विचार से काम-वासना का उचित और सम्यक् उपयोग भी ब्रह्मचर्य ही माना जाता है। काम-वासना की अति सर्वथा ही स्वास्थ्य का नाश करनेवाली हैं।
जन्म से पच्चीस वर्ष की आयु तक के समय में सर्वरूपेण शरीर का विकास होता है और शरीर की रस, रक्तादि धातुयें परिपक्व होती हैं। इस विकास काल में ही यदि शरीर के तत्त्वों का खर्च होना आरम्भ हो जाय तो विकासक्रम तो अवरुद्ध हो ही जाता है, शरीर की धातुयें भी परिपक्व नहीं हो पाती, जिससे फिर जीवन भर पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है; इसलिए पच्चीस वर्ष की आयु तक तो पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन सर्वथा अनिवार्य है।
इस अवस्था के बाद मानसिक आनन्द के लिए उचित और थोड़ी मात्रा में काम-वासना का उपभोग किया जाय तो वह हानिकारक नहीं होता। आयुर्वेद ने अन्य वेगों की भांति कामेच्छा के वेग को रोकना भी अनुचित बताया है।
इसलिए हमारा उद्देश्य यहाँ इन्द्रिय-दमन का उपदेश करना नहीं है, प्रत्युत इस तथ्य को ही स्पष्ट करना है कि शारीरिक स्वास्थ्य और आरोग्य की रक्षा के लिए काम-वासना का उपयोग कम से कम ही करना चाहिए। इस प्रकार का ब्रह्मचर्य स्वास्थ्य-साधन का सब से मुख्य अंग है।
"ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाध्नत" के अनुसार ब्रह्मचर्य मृत्यु पर भी विजय करनेवाला होता है। मानसिक सुख-शान्ति और दीर्घजीवन का सर्वोपरि साधन ब्रह्मचर्य ही है। एक प्रकार से पूर्ण स्वास्थ्य की नींव ही ब्रह्मचर्य है। उसके बिना स्वस्थ रहने की कल्पना ही व्यर्थ है।
विद्याध्ययन में सफलता के लिए जिस बौद्धिक तेजस्विता की आवश्यकता होती है, वह ब्रह्मचर्य के बिना कदापि संभव नहीं। आजकल प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि पढ़ने की आयु में ब्रह्मचर्य का पालन न करने वाले विद्यार्थी एकदम तेजहीन, दुबले-पतले, निर्बल, निरुत्साही, भुलक्कड़ और प्रतिभाहीन दिखाई देते हैं। इसलिए विद्यार्थी अवस्था में ब्रह्मचर्य का सर्वथा पालन करना नितान्त आवश्यक है। ब्रह्मचर्य से बुद्धि प्रखर होती है। एक बार पढ़ा हुआ कभी भूलता नहीं। कठिन से कठिन विषय को समझने में देर नहीं लगती और आनन-फानन में प्रश्नों का हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मचर्य से ही आकर्षक व्यक्तित्व और सुन्दर शरीर का निर्माण होता है।
ब्रह्मचर्य पालन से असीम कार्यशक्ति बढ़ती है, इसका उदाहरण वर्तमान युग के महात्मा गांधी, नेहरूजी, विनोबा भावे, राजर्षि टण्डन जी आदि महापुरुषों के जीवन में देखा जा सकता है।
ब्रह्मचर्य और महात्मा गांधी
वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तिका 'आरोग्य की कुंजी' में लिखा है -- "आरोग्य की बहुत-सी कुंजियां है और उनकी आवश्यकता है; परंतु उन सब में 'ब्रह्मचर्य' मुख्य है। अच्छी हवा, अच्छी खुराक और अच्छे पानी से हम थोड़ा-बहुत आरोग्य-सम्पादन करते हैं; परन्तु जिस भाँति हम जितना पैसा कमावें, उतना ही खर्च कर दें, तो फिर हमारे पास क्या बच सकता है।" मेरा अपना अनुभव भी इसी प्रकार है। एक रत्ती भर रति (सम्भोग सुख) के लिए हम एक मन भर से विशेष अपना बल एक पल में खो बैठते हैं। तब हम निस्सत्त्व हो जाते हैं। दूसरे दिन प्रातःकाल हमारा शरीर भारी रहता है। हमें चैन नहीं पड़ता, हमारा शरीर शिथिल हो जाता है। मन ठिकाने नहीं रहता।
ब्रह्मचर्य पर संत विनोबा
आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ सन्त और नैष्ठिक ब्रह्मचारी श्री विनोबा भावे ने ब्रह्मचर्य पर विचार व्यक्त करते हुए लिखा है-- "हिन्दू धर्म ने विशिष्ट आचार के लिए ऐसा शब्द बनाया है, जो अन्य दूसरे धर्मों में नहीं देख पड़ता है। वह है -- ' ब्रह्मचर्य'। ब्रह्मचर्याश्रम की व्यवस्था हिन्दू धर्म की विशेषता है। अंग्रेजी में ब्रह्मचर्य के लिए शब्द ही नहीं है। लेकिन उस भाषा में शब्द नहीं है -- इसका मतलब यह नहीं है कि उन लोगों में कोई संयम हुआ ही नहीं। ईसामसीह स्वयं ब्रह्मचारी थे।
वैसे वहाँ भी अच्छे-अच्छे लोग संयमी जीवन बिताते हैं। लेकिन ब्रह्मचर्याश्रम की वह कल्पना उन लोगों में नहीं है, जो हिन्दू-धर्म में पायी जाती है। ब्रह्मचर्याश्रम का लक्ष्य यह हैं कि मनुष्य-जीवन को प्रारम्भ से ही अच्छा खाद मिले। जैसे वृक्ष को जब वह छोटा रहता है, तब खाद की अधिक आवश्यकता होती है बड़ा हो जाने के बाद खाद देने से जितना लाभ है, उससे अधिक लाभ जब वह छोटा रहता है, तब देने से होता है।
यही मनुष्य-जीवन का हाल है। यह खाद अगर अन्त तक मिलता रहे, तो अच्छा ही है; लेकिन बराबर नहीं मिले, तो कम-से-कम बचपन में तो बहुत आवश्यक है। हम बच्चों को दूध देते हैं। उन्हें वह अन्त तक मिलता रहे, तो अच्छा ही है; लेकिन बराबर नहीं मिले, तो कम-से-कम बचपन में तो मिलना ही चाहिए। शरीर की तरह आत्मा और बुद्धि को भी जीवन के आरम्भ काल में अच्छी खुराक मिलनी चाहिए; इसलिए ब्रह्मचर्याश्रम की कल्पना है।"
"विषयवासना मत रखो - - यह ब्रह्मचर्य का 'निगेटिव' या अभावात्मक रूप हुआ। सब इन्द्रियों की शक्ति आत्मा की सेवा में खर्च करो, यह उसका भावात्मक रूप है। 'ब्रह्म' यानी कोई बृहत् कल्पना। अगर मैं चाहता हूँ कि इस छोटी-सी देह के सहारे दुनिया की सेवा करूँ; उसके ही काम में अपनी सब शक्ति खर्च करूँ तो यह एक विशाल कल्पना हुई। विशाल कल्पना रहते हुए ब्रह्मचर्य का पालन हो जाता है।"
"इन्द्रियों का निग्रह करना" यही एक विचार हमारे सामने हो, तो हम गिनती करने लग जायेगे कि इतने दिन हुए और अभी तक कुछ फल नहीं हुआ; लेकिन किसी बृहत् कल्पना के लिए हम इन्द्रिय-निग्रह करते हैं तो हम करते हैं ऐसा 'कर्तरी प्रयोग' नहीं रहता; 'निग्रह किया जाता है' ऐसा कर्मणि प्रयोग हो जाता है, या यों कहिए कि निग्रह हमें करना हैं। भीष्म पितामह के मन में एक कल्पना आ गयी कि पिता के सन्तोष के लिए मुझे संयम करना है।
बस पिता का सन्तोष ही उनका ब्रह्म हो गया और उससे वह आदर्श ब्रह्मचारी बन गये। ऐसे ब्रह्मचारी पाश्चात्यों में भी हुए हैं। एक साइन्टिस्ट के बारे में कहा जाता है कि वह दिन-रात प्रयोग में मग्न रहता था। उसकी एक बहन थी। भाई प्रयोग में लगा रहता। उसकी सेवा करने के लिए कोई नहीं है, यह देखकर ब्रह्मचारिणी रहकर भाई के ही पास रही और उसकी सेवा करती रही। उस बहन के लिए 'बन्धु-सेवा' ही ब्रह्म की सेवा हो गई।"
" अध्ययन करने में अगर हम मग्न हो जाय, तो इस दशा में विषय-वासना कहाँ से रहेगी? मेरी माता काम करते-करते भजन गाया करती थी। रसोई में कभी-कभी 'भूल से नमक दुबारा पड़ जाता था, लेकिन वह चिन्तन में इतना मग्न रहती थी कि उसको इसका पता ही नहीं चलता था।"
"वेदाध्ययन करते समय मैंने अनुभव किया कि देह मानो है ही नहीं। कोई लाश पड़ी है- ऐसी भावना उस समय हो जाती थी। इसलिए ऋषियों ने कहा है कि बचपन से वेदाध्ययन करो।' मैंने अध्ययन के लिए ब्रह्मचर्य रखा उसके बाद देश की सेवा करता रहा। वहाँ भी इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता थी। लेकिन बचपन में इन्द्रिय - निग्रह का अभ्यास हो गया था, इसलिए बाद में वह कठिन नहीं मालूम हुआ। मैं नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य आसान चीज है। हाँ, विशाल कल्पना मन में रखोगे, तो आसान है। ऊँचा आदर्श सामने रखना और उसके लिए संयमी जीवन का आचरण करना, इसको मैं ब्रह्मचर्य कहता हूँ।"
"यह हुई एक बात। अब एक दूसरी बात है। किसी एक विषय का संयम और बाकी के विषयों का भोग यह ब्रह्मचर्य नहीं हैं। बोलने में, रहन-सहन में हरएक बात में संयम की आवश्यकता है। मिट्टी के बर्तन में छोटा-सा छिद्र हो, तो क्या उसमें पानी भरेंगे? एक भी छिद्र घड़े में है, तो वह पानी भरने के लिए बेकार ही है। ठीक उसी तरह जीवन का हाल है। जीवन में एक भी छिद्र नहीं रहना चाहिए। चाहे जैसा भी जीवन बिताते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे, यह मिथ्या आकांक्षा है। बात-चीत, भोजन, स्वाध्याय सभी बातों में संयम रखना चाहिए।"
आधुनिक शिक्षित और संयम
आधुनिक शिक्षित कहते हैं कि इस प्रकार के कठिन ब्रह्मचर्य का पालन भला कैसे हो सकता? यह केवल आदर्शवादियों की एक कल्पना मात्र हैं। ऐसे कठिन ब्रह्मचर्य के पालन से यदि कोई विशिष्ट लाभ है, तो उसकी प्राप्ति के लिए आजकल कोई प्रयत्न क्यों नहीं करता? इसी प्रकार की ओर भी अनेक शंकाएँ ये लोग करते हैं। ऐसी शंकाओं के कारण, हमारा गलत शिक्षण है। ऐसा गलत शिक्षण हमें शताब्दियों से दिया जा रहा है, जिससे हममें गुलामी की भावना पनपती रहे। हम शरीर से दुर्बल, निस्तेज, मन से दुखी, दब्बू और निरुत्साही बने रहे। उसी शिक्षण का फल है कि ब्रह्मचर्य जैसे प्रत्यक्ष फलप्रद साधन पर भी हमें विश्वास नहीं है।
पाश्चात्य देशों में मांस-मदिरा आदि उत्तेजक और वृष्य आहार का सेवन अधिक होता है। उसमें पारलौकिक भावना भी नहीं है; अतः वे भले ही ब्रह्मचर्य की आवश्यकता न समझते हों, तथा वहाँ के कुछ डाक्टर औषधियों के व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए लोगों को ब्रह्मचर्य से विमुख रखने की बात कहते हों, परन्तु इस सत्य को छिपाने की शक्ति उनमें भी नहीं है।
भारतीय शास्त्रों और वेदों के अध्ययन से पता चलता है कि भारत के महान् पुरुषों ने ब्रह्मचर्य का महत्त्व समझकर मनुष्य मात्र के लिए जन्म से पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक बताया था। ब्रह्मचर्य के बल से उन्होंने न केवल स्वास्थ्य लाभ ही किया था, अकाल-मृत्यु को भी जीता "ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत।" उसी का वह फल था कि हनुमान, लक्ष्मण, मेघनाद, भीष्म, शंकराचार्य, श्रीगुरु नानकदेव, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी और विनोबा भावे जैसे विश्व-विख्यात महापुरुषों की परम्परा ने ब्रह्मचर्य के प्रभाव में शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ाकर समाज का कल्याण और देश की रक्षा की।
इसके विरुद्ध विलासी जीवन व्यतीत करनेवालों में भी एक-दो का इतिहास देख लीजिए। इनमें सर्वप्रथम स्थान चन्द्रमा का है। विलासी जीवन के कारण उनको क्षय हुआ। रघुवंश के अन्तिम राजा अग्निवर्ण भी बहुत स्त्री- लम्पट थे, उनको भी यही रोग हुआ; इसी को ब्रह्मचर्य का अभाव कहते हैं। सिक्खों के गुरुओं ने सिक्खों में ब्रह्मचर्य अर्थात् संयमी जीवन का प्रचार किया, जिससे सिक्ख जाति बहादुरी में प्रसिद्ध हो गई। थोड़े-से सिक्खों ने सारे पंजाब पर राज्य किया। किन्तु इसी जाति में भोग-लिप्सा के बढ़ते ही जो दुष्परिणाम हुआ, वह हम सभी लोगों के सामने है।
इतिहास की बात को छोड़कर प्रत्यक्ष उदाहरण देखे तो भारत के साधु-समाज को देख लें। साधारण भिक्षा करके वे लोग नित्य घी-दूध खानेवाले गृहस्थों से नीरोग, मजबूत और हट्टे-कट्टे रहते हैं। यह एक मात्र उनके संयम का फल है। स्त्रियों में भी विधवाओं को देख सकते हैं - गृहस्थ जीवन में सदा रुग्ण-रहनेवाली स्त्रियाँ भी वैधव्य जीवन में बिना दवा के रोगमुक्त होकर तन्दुरुस्त हो जाती हैं।
मन्दाग्नि और संग्रहणी जैसे भयानक रोगों के शिकार व्यक्ति भी केवल संयम से अच्छे होते देखे जाते हैं, जब कि दूसरे लोग बहुत-सी कीमती दवाओं का सेवन करके भी अच्छे नहीं होते। श्री ब्रह्मानन्दजी स्वामी वैद्यनाथ-धाम में पेट के रोगों के प्रसिद्ध सफल चिकित्सक थे। मैंने स्वयं उनसे चिकित्सा करायी और देखा कि पथ्य में वह ब्रह्मचर्य के पालन पर ही विशेष जोर देते थे।
इससे उन्हें अपनी चिकित्सा में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त होती थी। इस प्रकार सब तरह यही सिद्ध होता है कि स्वस्थ, सबल और दीर्घजीवी होने के लिए संयमी जीवन का - ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक है।
संयम की उपेक्षा क्यों?
अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचर्य यदि इतना जरूरी है, तो ब्रह्मचर्य के पालन में लोगों की अपने-आप प्रवृत्ति क्यों नहीं होती? यह ठीक है कि जीवन की इस प्रकार की विलक्षणताओं को देखकर यद्यपि मनुष्य को स्वयं विचार करना चाहिए कि संयमी और विलासी जीवन के परिणामों में कितना अन्तर है और उसको कैसा जीवन बिताना हैं, किन्तु उसके सामने कुछ ऐसी अड़चनें रहती हैं, जो उसे ऐसा नहीं करने देतीं।
उन्हें दूर करने के लिए मनुष्य को उपदेश की - गुरु- प्रेरणा की आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए ऋषियों ने शास्त्रों में ब्रह्मचर्य के पालन का उपदेश दिया है। उनका यह उपदेश हजारों पर परीक्षित है -- आप्त-वचन है; इसलिए विश्वास के योग्य है। हजारों वर्षों की लम्बी दासता के कारण भारतीय आर्यजाति एक जीर्ण रोगी के समान बल, वीर्य, तेज और उत्साह से हीन हो गई है।
ऐसी अवस्था में ब्रह्मचर्य एक महारसायन औषध के समान है। यह हमारी अतिहीन मनोवृत्ति की निशानी है कि हम ब्रह्मचर्य जैसी स्वास्थ्यकर वस्तु को व्यवहार में लाना असम्भव समझने लगे हैं। यह कार्य असम्भव नहीं, कुछ कठिन अवश्य हैं, सो भी उसके लिए, जिसके सामने कोई बड़ा लक्ष्य नहीं है। श्रेष्ठ कामों में चित्त लगाकर जुट जाने से भी ब्रह्मचर्य का पालन आसानी से हो जाता है।
भारत के गाँवों में आज भी लाखों की संख्या में ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले किसान मजदूर हैं। यद्यपि वे लोग अज्ञानता - पूर्वक और रूढ़ि-रूप में इसका पालन करते हैं। फिर भी वे ब्रह्मचर्य का महत्व समझते हैं। बहुत छोटी उम्र में विवाह करने पर भी वहाँ स्त्री-पुरुष का मिलन पूर्ण अवस्था में होता है। माता-पिता सावधानी-पूर्वक इसकी देख-रेख रखते हैं। अपढ़ और बेवकूफ समझे जानेवाले भारतीय देहाती वीर्य के महत्त्व को पूर्ण रूप से जानते हैं।
समय-समय पर अपनी सन्तान को भी अपनी भाषा में इसका उपदेश करते हैं। भगवत्-कृपा से अब तक भी हमारे गाँवों में भारतीयता जीवित है, साहित्य और शिक्षा के नाम पर मिलनेवाली कामुकता का अभाव है। कामवासना की उत्तेजना के अभाव में स्वाभाविक जीवन में जो धीरता वीरता और कार्य - शीलता एवं शीलता स्वयं आती है, वह भारतीय देहातियों में पूर्ण रूप से वर्तमान है।
वे दिन-भर कठिन परिश्रम कर सकते हैं। जंगली - हिंसक जानवरों और चोर. डाकुओं से आत्मरक्षा करते हैं। धातु-स्राव, शीघ्र पतन, नपुंसकता, मन्दाग्नि और अनिद्रा आदि से रोगी वहाँ मुश्किल से मिलते हैं। मैं स्वयं छोटे-से गांव का जन्मा और पला हुआ हूँ। साल में दो-एक मास वहाँ अब भी में रहता हूँ। मेरा गाँव, स्टेशन से २६ मील दूर, ठेठ देहात में है। यहां के लोग धातु-सम्बन्धी रोगों को तो जानते भी नहीं है।
यद्यपि अपढ़ और रूढ़िवादी हैं, फिर भी ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझते हैं। उनकी खुराक शहरवालों से रूखी होती है। दूध से घी निकालकर बेच देते हैं। किन्तु रूखा अन्न खाकर भी केवल ब्रह्मचर्य के प्रभाव में वे कठिन शारीरिक परिश्रम करते हैं। आजकल के शहरियों की तरह यदि वे लोग भी काम वासना में अनुरक्त हो जायें, तो दो-एक पीढ़ी में ही उनकी सामर्थ्य समाप्त हो जाय, किन्तु उन्होंने ब्रह्मचर्य के प्रभाव से अपने को विनष्ट होने से बचा रखा है।
संयम आज अधिक आवश्यक है
ब्रह्मचर्य का पालन, पहले की अपेक्षा हमारे लिए आज अधिक आवश्यक है; क्योंकि अब हमारा देश स्वतन्त्र है। किन्तु, हमें यह स्वतन्त्रता ऐसी रुग्ण और कमजोर हालत में मिली है कि अपने पैरों पर खड़ा होने की हममें शक्ति नहीं है। इतनी निर्बलता में एकमात्र संयमशील जीवन व्यतीत करना ही वह अमोघ औषध है, जिससे देश सबल, स्वस्थ और सुखी होगा। स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए बल और बुद्धि की आवश्यकता है। यह दोनों शक्तियाँ ब्रह्मचर्य से ही प्राप्त होती है; इसलिए ब्रह्मचर्य हमारे लिये पहले की अपेक्षा आज अधिक आवश्यक है।
हमारी प्राकृतिक स्थिति
भारत में गर्मी अधिक पड़ती है। दस-बारह वर्ष में यहाँ की लड़कियों और पन्द्रह-सोलह वर्ष में लड़कों में यौवन के जो चिन्ह प्रगट हो जाते हैं, वह शीत-प्रधान देशों की लड़कियों तथा लड़कों में बहुत पीछे दिखाई देते हैं। गरम देश में अनियमित सम्भोग जैसा हानिकर होता है, वैसा ठण्डे देशों में नहीं होता। स्त्री-सम्भोग प्रकरण के एक वचन से इस बात की पुष्टि होती है-
सेवेत कामतः कामं तृप्तो वाजीकृत हिने।
त्र्यहाद्वसन्त शरदोः पक्षाद्वर्षानिदाघयोः ॥
वाग्भटाचार्य ने ऋतुओं के अनुसार, स्त्री-सम्भोग का यह नियम बताया है। हेमन्त और शिशिर ऋतु में (यह कड़ाके की सर्दियों के दिन हैं) स्त्री-सम्भोग के लिए छूट है; अर्थात् अमुक दिन छोड़कर ऐसी शर्त नहीं है। किन्तु नित्य वीर्यवर्द्धक पदार्थों के सेवन की शर्त जरूर है। तात्पर्य यह है कि यदि वीर्यवर्द्धक पदार्थों का पुष्कल सेवन किया जाय, तो गहरी सरदी के दिनों में प्रतिदिन स्त्री-सम्भोग करके भी मनुष्य स्वस्थ रह सकता है।
बसन्त और शरद ऋतु में तीन-तीन दिन छोड़कर एवं वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतु में पन्द्रह दिन के बाद स्वस्थ पुरुष स्त्री- सम्भोग कर सकता है। वीर्यवर्द्धक पदार्थों के सेवन की शर्त सब के साथ है। इस वचन से यह व्यक्त होता है कि जैसे अधिक सरदी के दिनों में वैसे ही अधिक ठण्डे देश में भी स्त्री-सम्भोग के लिए छूट है। तब यूरोप के ठण्डे देशों ने यदि इन्द्रिय-संयम को महत्त्व नहीं दिया तो क्या हानि है?
हानि तो यहाँ भारत में हैं, जहाँ वर्ष में दस महीने गरमी पड़ती है। फिर पाश्चात्य लोग अच्छे वीर्यवर्द्धक पदार्थों का सेवन भी खूब करते हैं। ऐसी स्थिति में रहन-सहन और आचार विचार में हमारी उनकी क्या तुलना? हमें अपने देश की जलवायु के अनुसार रहकर अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी है। एक तो हमारा देश उष्ण है, जहाँ दस मास गरमी रहती है, दूसरे हमें खुराक श्रेष्ठ नहीं मिलती, तो इन सिद्धान्तों की चर्चा में हमारा उनका मेल क्या! हमारा तो एकमात्र इन्द्रिय-संयम ही स्वास्थ्य का आधार है।
ब्रह्मचर्य एक दिव्य शक्ति है
ब्रह्मचर्य से सचमुच ही मनुष्य में दिव्य शक्तियों का संचार होता है। जब कभी हम विनोबा भावे को देखते हैं तो हमें ब्रह्मचर्य की दिव्य शक्तियों का दर्शन होता है, क्योंकि उनमें ब्रह्मचर्य के सिवा किसी अन्य ताकत का प्रवेश ही नहीं है। बदाम-पिस्ता, दूध-घी, मांस-मछली आदि शक्तिप्रद चीजों का सेवन उन्होंने आज तक नहीं किया। बहुत सस्ता और सादा भोजन वे करते हैं। कभी पहलवानों जैसी कसरत नहीं की है और शरीर भी बहुत हल्का मिला है; किन्तु ताकत में वे किसी अच्छे तगड़े शरीर वाले से कम नहीं हैं।
जब कभी अपनी नित्य की चाल से चलने लगते हैं तो एक तगड़े आदमी की क्या मजाल, जो उनके साथ चले। यह चीज मैंने अपनी आंखों देखी है। गांधीजी के बारे में भी ऐसा ही सुना जाता है। मनोबल भी दोनों का आश्चर्यजनक है ही। बड़े-बड़े अंग्रेज गांधीजी के मनोबल से प्रभावित थे। संत विनोबा ने अपने मनोबल के आधार पर ही भूदान यज्ञ में कल्पनातीत सफलता प्राप्त की है। यह सब ब्रह्मचर्य का ही प्रभाव हैं।