स्वास्थ्य-साधन - १ कसरत : व्यायाम
30 मिनट का पाठ
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धनी देहव्यायामसंज्ञा। --चरक
जिस चेष्टा से शरीर को स्थैर्य और बल प्राप्त हो उस चेष्टा को व्यायाम (कसरत) कहा है। जिन्दगी के लिए जिस प्रकार भोजन करना जरूरी है, ठीक उसी प्रकार तन्दुरुस्ती के लिए कसरत करना भी अनिवार्य है। जिस अंग से जितना अधिक परिश्रम करने का अभ्यास किया जायगा, वह अंग उतना ही मजबूत और ताकतवर होगा। दाहिने हाथ से ज्यादा काम करने के कारण ही उसमें बायें हाथ की अपेक्षा ज्यादा शक्ति रहती है।
कसरत से लाभ
वाग्भट ने लिखा है।
लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः।
विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते॥
अर्थात् कसरत करने से शरीर हल्का रहता है, जो कुछ भी अंट-संट खाया जाय ठीक से पच जाता है, काम करने की शक्ति बढ़ती है, शरीर सुन्दर और मजबूत हो जाता है, दोषों का नाश हो जाता है और किसी रोग के होने का भय नहीं रहता। इसलिए प्रत्येक समझदार आदमी को किसी न किसी प्रकार का शारीरिक परिश्रम जरूर करना चाहिए, नहीं तो जल्दी ही तन्दुरुस्ती खराब हो जायगी, क्योंकि बैठे-बैठे लिखा-पढ़ी आदि काम करने वाले बिना कसरत के जल्दी ही रोगी हो जाते हैं।
प्राचीन काल में लोग जंगलों में रहते थे वहाँ बाघ, सिंह आदि हिंस्र पशुओं से आत्म-रक्षा करने तथा भोजन प्राप्त करने के लिए शिकार या खेतीबाड़ी के कामों में उनको बराबर कठिन परिश्रम करना पड़ता था। इस प्रकार उनके दैनिक जीवन में स्वाभाविक रूप से ही काफी व्यायाम हो जाता था। इसके बाद उन्हें अलग से कृत्रिम व्यायाम करने की आवश्यकता नहीं रह जाती थी।
परन्तु अब स्थिति बदल गई है। लोग जंगलों और देहातों से आकर बड़े-बड़े शहरों में बस गये हैं। अब राज्य पर जनता की रक्षा का भार है और रुपये के बल पर घर बैठे ही जीवन-सामग्री मिल जाती हैं। परिस्थितिवश स्वाभाविक व्यायाम छूट जाने के कारण अच्छा आहार करने पर भी हमारे नवयुवकों का स्वास्थ्य समुन्नत नहीं है। यह सत्य है कि बिना उत्तम भोजन के मनुष्य स्वस्थ और बलवान् नहीं रह सकता।
साथ-साथ यह भी सत्य है कि उत्तम भोजन के साथ यदि मनुष्य व्यायाम न करे, तो वह भी स्वस्थ नहीं रह सकता। हम सब प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिनको अच्छा भोजन मिलता है, वे भी व्यायाम के अभाव में स्वस्थ और बलवान् नहीं रहते। खासकर बड़े शहरों में रहनेवाले सम्पन्न लोगों की स्थिति व्यायाम के अभाव में दयनीय है। इसलिये व्यायाम का नियमित अभ्यास करना स्वास्थ्य के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि सन्तुलित भोजन।
व्यायाम और भारतवर्ष
भारतवर्ष में व्यायाम की परम्परा बहुत प्राचीन है और अभी तक उस परम्परा की रक्षा यहाँ की जाती है; अतः आज भी भारतवर्ष के पहलवान संसार में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। कुश्ती, हॉकी और पोलो के खेल में भारतवर्ष अब भी विश्व विजयी है। इसका एकमात्र कारण यही है कि भारतीय व्यायाम का ढंग अन्य देशों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ है। समय के अभाव से उसमें कुछ दोष अवश्य आ गये हैं; जिससे पहलवानों की आयु कम और बुद्धि मन्द हो जाती है। यह दोष प्रोफेसर राममूर्ति के ध्यान में आया था और उनके प्रयत्न से अब वह करीब-करीब दूर भी हो गया है।
व्यायाम का वैज्ञानिक आधार
शुद्ध रक्त ही स्वास्थ्य का प्रधान आधार है। जिस व्यक्ति के शरीर में जितना ही अधिक शुद्ध रक्त बनता है, वह उतना ही अधिक स्वस्थ और सबल होता है। भोजन से रस और रस से रक्त की उत्पत्ति होती है। रक्त सारे शरीर में भ्रमण करता है। इस भ्रमण काल में शरीर के मृत कोष (सेल्स) उसमें मिलते हैं और वह अशुद्ध हो जाता है।
अशुद्ध रक्त की शुद्धि प्राणवायु की सहायता से फेफड़े और हृदय करते हैं और रक्त में जो दोष होता है, वह निःश्वास के द्वारा विषैले वायु (कार्बन डाइआक्साइड) के रूप में बाहर निकल जाता है। जब हम व्यायाम करते हैं, तो हमारे रक्त की गति बढ जाती है, और रक्त तेजी के साथ फेफड़ों में पहुँचने लगता है। इससे श्वास-प्रश्वास की गति भी बढ़ जाती है, जिससे रक्त में प्राणवायु का अधिक मिश्रण और विषैले वायु का अधिक निष्कासन होता है।
परिश्रम के कारण जो पसीना आता है, उससे भी रक्त का बहुत कुछ मैल बाहर निकल जाता है। व्यायाम के द्वारा हमारे भीतर के संस्थान भी शुद्ध और सबल हो जाते हैं। यकृत ठीक से पित्त-स्राव करता है और आँतें भी अपना काम बहुत अच्छी तरह करती हैं। गुर्दे भी पेशाब बनाने का काम बहुत ठीक से करते हैं। इन सब यथावत् कामों से भीतरी अंगों को निरन्तर सफाई होती है।
कोई विकृत पदार्थ शरीर में एकत्रित होकर अपने विष से रक्त को दूषित नहीं कर सकता। जो लोग नियमित व्यायाम नहीं करते, उनकी अंतडियाँ कमजोर हो जाती हैं फलस्वरूप उनमें बहुत-सा मल जमा हो जाता है। वह मल सड़ता रहता है, जिससे रक्त दूषित हो जाता है, और मनुष्य रोगी तथा कमजोर होने लगता हैं। शरीर की दृढ़ता और सबलता के लिए मांस-पेशियाँ प्रधान रूप से काम करती हैं।
वे मांस पेशियां छोटे-छोटे तन्तुओं (टिस्यूज) से बनी होती हैं। उन तन्तुओं के मूल होते हैं कोष (सेल्स)। ये कोष रक्त के द्वारा बनते हैं और जो कोष नष्ट होते हैं. वे रक्त में मिलते जाते हैं। इन कोषों (सेल्स) की उत्पत्ति और स्थिरता प्राणवायु से होती है। यह प्राणवायु व्यायाम के द्वारा प्रचुर मात्रा में हमको मिलता है। शरीर के नष्ट हुए कोष विषैले वायु (कार्बनडाइ आक्साइड) के रूप में बाहर निकाल दिये जाते हैं।
व्यायाम का स्वास्थ्य से सम्बन्ध
हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि शरीर के जिस अंग से विशेष काम लिया जाता है वह सुदृढ़ शक्तिशाली हो जाता है। दाहिने हाथ से अधिक काम लेने के कारण वह बाएँ हाथ की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है। पहाड़ी लोग एक साथ बहुत-सा वजन लेकर पहाड़ों पर चढ़ते हैं, जिसमें उनको पैरों से अधिक काम लेना पड़ता है। फलस्वरूप उनके पैर बड़े शक्तिशाली एवं सुदृढ़ होते हैं। इसी प्रकार लोहार के हाथ भी बहुत मजबूत होते हैं। कोई व्यक्ति यदि शरीर के किसी अंग को पुष्ट करना चाहे, तो यह व्यायाम के द्वारा ही सम्भव है। इस तरह व्यायाम और स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध है। यदि शरीर से काम न लिया जाय, तो वह निश्चय ही निर्बल हो जायगा। बीमारी के कारण महीने - दो महीने खाट पर पड़े रहने वाले रोगी को जब पहले-पहले खड़ा किया जाता है तब उसके पैर कांपने लगते हैं। इसी प्रकार जिस मशीन से काम नहीं लिया जाता, उस पर भी जंग चढ़ जाता है। सैनिकों से यदि दैनिक व्यायाम (कवायद) न कराया जाय, तो वे बलवान और फुर्तीले नहीं हो सकते। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि हमारे देश के धनी लड़के पुष्टिकारक भोजन बेफिक्री के साथ करके भी स्वस्थ और सबल नहीं है; जबकि नित्य व्यायाम करने वाला साधारण श्रेणी का युवक स्वस्थ, सुन्दर और बलिष्ठ है। इसलिए यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि भोजन, विश्राम और संयम की तरह व्यायाम भी स्वास्थ्य का एक प्रधान आधार है। जो लोग अज्ञानवश या आलस्यवश नियमित व्यायाम नहीं करते वे जल्दी ही अपने स्वास्थ्य को नष्ट कर देते हैं। शरीर के किसी भी अवयव से यदि काम न लिया जाय, तो वह उस अवयव का हीन योग हुआ। इससे उस अवयव का क्षय होगा।
कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्याऽतिमात्रकः।
सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम्॥
ऐसे ही क्षय को पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्र में (Atrophy due to disuse) कहते हैं।
भारतवर्ष गर्म देश है। यहाँ ८-१० महीने गर्मी पड़ती है। यह गर्मी हमारे शरीर और विशेष कर स्नायुमण्डल को दुर्बल बनाती है, जिससे स्नायु-दौर्बल्य, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि रोग पैदा होते हैं। पाचन शक्ति को कमजोर करती है, जिससे कब्जियत या पतले दस्त की बीमारी हो जाती है तथा कई तरह के चर्मरोग एवं अन्य बीमारियां भी पैदा कर देती है। इनसे बचने का एकमात्र उपाय नियमित व्यायाम है। नियमित व्यायाम करनेवाले व्यक्ति को न तो स्नायु संबंधी और न ही मन्दाग्निमूलक रोग होते हैं।
नियमित व्यायाम करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि वह शक्ति से अधिक न किया जाय। अति मात्रा में शरीर के अवयवों से काम लेने से पहले उनकी कुछ वृद्धि होती है, किन्तु बाद में क्षय होने लगता है। इसको पाश्चात्य चिकित्साविद् Hypertrophic Atrophy कहते हैं। क्षय के निदान-चतुष्क में इसका उल्लेख इसीलिए आता है।
व्यायाम और सुन्दरता
सुन्दर देखने की लालसा सभी व्यक्तियों में होती है। वर्तमान काल में शरीर को सुन्दर प्रदर्शित करने के लिए लोग बहुत ही प्रयत्न करते हैं। स्त्री और पुरुष समाज में एक होड़सी लगी हुई है कि वे किसी तरह अपने को अधिक से अधिक सुन्दर प्रदर्शित करें। रंग-बिरंगे वस्त्रों द्वारा बनी हुई आधुनिक पोशाक, केशों का सजाव- बनाव और केश विन्यास एवं साबुन, तेल, स्नो, पाउडर, क्रीम, लिपस्टिक आदि शृंगार सामग्रियों का व्यवहार अपने को सुन्दर प्रदर्शित करने के लिए ही किया जाता है। लेकिन यह सुन्दरता दिखावटी मात्र है। शरीर का वास्तविक सौन्दर्य इससे सम्भव नहीं है। किसी स्त्री या पुरुष की सुन्दरता का वर्णन - उसके अंग-प्रत्यंग और रूप लावण्य से किया जाता है। भगवान् श्री रामचन्द्रजी के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए आदि-कवि वाल्मीकिजी ने कहा है :-
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः।
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः।
आजानुबाहुः सुशिरः सुललाटः सुविक्रमः।
समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्।
पीनवक्षः विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः।
अर्थात् ——भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ऊँचे कंधेवाले, लम्बी भुजावाले, शंख समान गर्दनवाले, बड़ी ठुड्डीवाले, विशाल वक्षस्थलवाले, बड़े धनुष को धारण करनेवाले, गूढजत्रू (मांस में छिपी हुई हैं दोनों हंसली जिनकी) शत्रुओं का दमन करनेवाले, जानुपर्यन्त लम्बी भुजावाले, सुन्दर सिर और सुन्दर ललाटवाले, श्रेष्ठ पराक्रमयुक्त, सम (न छोटे और न अधिक लम्बे कद के), समुचित रूप से अंगों के विभागवाले, स्निग्ध वर्ण वाले, प्रतापी, पीन (मांसल) वक्षस्थलवाले, बडी आंखोंवाले, लक्ष्मीवान्, सब प्रकार की शारीरिक शोभा से युक्त और सब शुभ लक्षणों से युक्त हैं।
शुद्ध रक्त और सुगठित मांस-पेशियां ही सुन्दरता का मूल हैं। कितना ही सुन्दर मनुष्य या सुन्दरी स्त्री हो, उसका रक्त या मांस कम कर दिया जाय या निकाल दिया जाय तो उसकी सारी सुन्दरता नष्ट हो जाती है। वह अस्थिपंजर मात्र रह जाता है और अति भयावह मालूम होता है।
हम लोग प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिनका शरीर सुगठित और पुष्ट होता है; उनको देखकर सभी लोग प्रभावित होते हैं और वैसा ही सुन्दर शरीर बनाने की लालसा रखते हैं। इस बात में तो कोई विवाद ही नहीं कि इस तरह का सुन्दर और सुगठित शरीर व्यायाम के बिना नहीं हो सकता। व्यायाम के द्वारा मनुष्य के कद में भी वृद्धि होती है और वजन में भी। वजन बढ़ने से शरीर भर जाता है, उसकी कोमलता बढ़ जाती है। यदि गौर वर्ण हो, तो कहना ही क्या! कृष्ण वर्ण भी बहुत सुन्दर लगता है। इस प्रकार का सुन्दर शरीर ही बहुत बड़ा प्रदर्शन है। उसको सजाने की क्या आवश्यकता है? इसलिए शरीर को कृत्रिम उपायों से सुन्दर बनाने की अपेक्षा व्यायाम द्वारा सुन्दर बनाना बुद्धिमानी का काम है। आजकल के नवयुवक जिस प्रकार की सुन्दरता की रचना करते हैं, वह पुरुषोचित नहीं है। उनका यह बनाव-शृंगार स्त्रियों जैसा है। स्त्रियों की कोमलता और पुरुषों की कोमलता में अन्तर है और यह तो स्पष्ट ही है कि घोर मूर्ख नवयुवक भी अबलाजनोचित सौन्दर्य पसन्द न करेगा।
व्यायाम और पौरुष
स्त्री का पुरुष के प्रति और पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षण सृष्टि का नियम है। यह आकर्षण असमानलिंगी होने के कारण ही नहीं, बल्कि बहुत अंशों में पुरुष के पौरुष और स्त्री के स्त्रीत्व पर भी निर्भर है। केवल पुरुष होना ही स्त्री के आकर्षण का प्रधान कारण नहीं है पौरुष का अर्थ है स्वस्थ और बलिष्ठ शरीर। यह तो विज्ञान से सिद्ध हो चुका है कि जिस पुरुष में पुरुषत्व नहीं होता या उसकी कमी होती है, वह चाहे जितना गुणी या जितना धनी हो, अपनी स्त्री को प्रसन्न नहीं रख सकता।
दाम्पत्य जीवन के लिए पुरुषत्व का होना आवश्यक है। अपने शरीर को बहुत सजाने, स्त्री की सुख-सामग्री इकट्ठा करने और बहुत प्रेम की बातें करने से स्त्री आकर्षित नहीं होती। वह पुरुषत्व से आकर्षित होती है। स्वस्थ बलिष्ठ शरीर ही पुरुषत्व का प्रधान लक्षण है। कुछ लोग केवल दवाओं के द्वारा शरीर को पुरुषत्वयुक्त बनाना चाहते हैं। यह बिलकुल उलटी बात है। इन स्तम्भक दवाओं में अफीम, भांग आदि मादक चीजें होती हैं, जो कुछ समय तक शीघ्रपतन को रोकतई हैं, लेकिन कुछ समय के बाद वे मनुष्य को नपुंसक बना देती हैं।
इसलिए पुरुषत्व-प्राप्ति का निश्चित और वैज्ञानिक मार्ग यही है कि मनुष्य व्यायाम का अभ्यास करे। व्यायाम के द्वारा स्नायु दौर्बल्य निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है और पुरुषत्व की प्राप्ति होती है।
प्रतिकूल परिस्थिति
भारतवासियों का पुराना रहन-सहन प्रायः बदल चुका है, और जो कुछ शेष है, वह भी बड़ी तेजी से बदल रहा है, जिनमें बुद्धिजीवियों की संख्या अधिक है। सरकारी कर्मचारी, विद्यार्थी, अध्यापक, व्यापारी, मुनीम, दुकानदार, डाक्टर, वकील, दफ्तरों के क्लर्क, आफिसर, जज, बैरिस्टर आदि का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया है, जो केवल बुद्धि से काम लेता है, शरीर से काम नहीं लेता और शरीर से श्रम करना निकृष्ट या अनावश्यक समझता है।
वे लोग व्यायाम प्रायः नहीं करते। स्त्रियां तो कतई व्यायाम नहीं करतीं। दिन-भर छोटे-से कमरे में बन्द रहती हैं। ऐसे परिवार का स्वास्थ्य हमेशा खराब रहता है और इनको अन्य खर्चों के साथ-साथ चिकित्सा पर भी नियमित खर्च करना पड़ता है। एक विश्वविद्यालय के स्थान पर दस हजार छात्रों के स्वास्थ्य की जांच की गई, तो उनमें से चालीस प्रतिशत छात्र रोगी निकले। बाकी आठ प्रतिशत छात्रों को हम रोग-रहित कह सकते हैं, पर पूर्ण स्वस्थ नहीं कह सकते।
ऐसी बदली हुई प्रतिकूल परिस्थिति में व्यायाम का प्रचार अत्यन्त आवश्यक है। जो लोग केवल बुद्धिजीवी हैं, उनके लिए तो यह उतना ही आवश्यक है जितना कि जीवन के लिए हृदय की धड़कन।
छात्रों के लिये ब्रह्मचर्य अत्यावश्यक क्यों?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षितों की संख्या बहुत बढ़ी है और बढ़ रही है। बहुत प्रयत्न और सिफारिश के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं मिलती। एक बाबू की आवश्यकता पर सैकड़ों बाबू उपस्थित होते हैं। मजदूर या घर का नौकर खोजने से भी नहीं मिलता, शिक्षित बेकार मारे-मारे फिर रहे हैं। इस जटिल परिस्थिति का सामना वही छात्र आसानी से कर सकता है जो शरीर और मन से पूर्ण उन्नत है। शारीरिक और मानसिक उन्नति के लिए छात्रावस्था में पूर्ण ब्रह्मचर्य अत्यावश्यक है। छात्रावस्था में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला व्यक्ति खेती, बागवानी, फार्म, व्यापार, उद्योग-धन्धा आदि स्वतन्त्र कार्य भी बड़े आनन्द से कर सकता है, क्योंकि वह मानसिक तथा शारीरिक स्थिति से दृढ़ है।
आपदां कथितः पन्थाः, इन्द्रियाणामसंयमः।
तज्जयः सम्पदां मार्गो यथेष्टं तेन गम्यताम्।
इन्द्रियसुख भोग का मार्ग आपत्तियों का मार्ग है। इन्द्रियों को वश में रखना सम्पदा का मार्ग है। मनुष्य यथेष्ट मार्ग में जाने के लिये स्वतन्त्र है।
शारीरिक व्यायाम - प्रणाली
संसार में बहुत तरह के व्यायाम प्रचलित हैं। इन व्यायाम प्रणालियों पर बहुत-सी पुस्तकें भी हैं। अनेक संस्थाएँ भी हैं, जो व्यायाम का प्रचार करती हैं और इसकी उपयोगिता बतलाती है। हर गांव या शहर में अखाड़े भी हैं जो सभी जाति और धर्म के लोगों को समान भाव से शारीरिक बल प्राप्ति के उपाय सिखलाते हैं। इन अखाड़ों में ब्राह्मण, शूद्र, मुसलमान, मेहतर आदि का कोई भेद नहीं होता।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नाम की संस्था को लोग प्रायः जानते हैं। इसने भारतीय विद्यार्थियों में व्यायाम का प्रचार किया है। यह संस्था विना उपकरण वाले देशी खेलों के द्वारा बहुत उत्तम व्यायाम कराती है। इसके व्यायाम की एक विशेषता यह भी है कि इससे शारीरिक विकास के साथ-साथ बौद्धिक विकास भी होता है। ' भारतीय अखाड़ों में शरीर का विकास तो अवश्य होता है; परन्तु बुद्धि का विकास नहीं होता। इसके दो कारण बतलाये गए हैं। पहला कारण है श्वास-प्रश्वास पर ध्यान न देना, श्वास खींच कर व्यायाम करना; और दूसरा है गर्दन पर आघात होना। पर इन दोनों दोषों को दूर किया जा सकता है। पहले बताया है कि जो शारीरिक प्रचेष्टा शरीर को स्थिर और दृढ़ बनाये, उसी का नाम व्यायाम है | बालक जन्म से ही व्यायाम करता है।
रोकर या प्रसन्न होकर जोर-जोर से बच्चा हाथ-पैरों को जो चलाता है, वह उसका व्यायाम ही है। फिर दौड़ना, कूदना और अपने साथियों के साथ खेलना उसका स्वाभाविक व्यायाम है | इस स्वाभाविक व्यायाम के लिए नगरपालिकाएँ बच्चों के खेलने-कूदने के लिये पार्क बनाती हैं। स्कूलों में जो ड्रिल (कवायद) होती है, वह भी एक अच्छा व्यायाम है | अब तो सरकार ने कॉलेज के लड़कों के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी है।
सैनिक शिक्षा एक उत्तम व्यायाम है | सभी खेल एक प्रकार के व्यायाम ही हैं हल जोतना, फावड़ा चलाना, लकड़ी काटना, बागवानी करना आदि व्यायाम दोहरे प्रयोजन से करने चाहिए। श्रमसम्भव कामों को नियमित रूप में करने से शारीरिक विकास होता है और देश की खाद्य - उत्पत्ति में सहायता मिलती है। कुश्ती, दण्ड, बैठक, मुग्दर घुमाना, सूर्य नमस्कार, फुटबॉल, हाकी, क्रिकेट, टेनिस, बेडमिंटन, कबड्डी, गुल्ली-डण्डा, सिंगलवार, डगलबार, मलखंब, तैरना, दौड़ना, घोड़े की सवारी, नाव खेना, आसन, लेजिम, बनेठी, फरी और गदगा, लाठी चलाना आदि सभी व्यायाम हैं। ये व्यायाम इस समय काफी प्रचलित हैं और इनसे प्रायः सभी लोग परिचित हैं।
कुश्ती -
कुश्ती सभी व्यायामों में श्रेष्ठ है। [OCR में मल्ल या पहलवान सम्बन्धी एक वाक्य अधूरा है।] दो घण्टे तक कवायद करने से शरीर का जो व्यायाम होता है, उससे अधिक आधा घण्टा कुश्ती का अभ्यास करने से हो जाता है। सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि कुश्ती का अभ्यास करने वाले युवक की बल-प्राप्ति की इच्छा हार-जीत की स्पर्धा से बढ़ती है। वह अपने बल से दूसरों को पराजित करने का प्रयास करता है।
परस्पर के संघर्ष से नस-नाड़ियों में चेतना आती है और रक्तवाहिनी सिराओं में रक्त का संचालन तेज होता है। [इसके आगे का वाक्य OCR में अधूरा है।] पन्द्रह वर्ष की अवस्था के बाद यह अभ्यास किसी योग्य गुरु से सीखना चाहिए।
दण्ड- व्यायाम
हाथ और छाती को सुदृढ़ तथा सुडौल बनाने के लिए दण्ड-व्यायाम उपयोगी है। पन्द्रह वर्ष की अवस्था के बाद इसका अभ्यास किया जाता है। [इस अनुच्छेद का कुछ पाठ OCR में अधूरा है।] दण्ड करते समय बहुत शीघ्रता करना अच्छा नहीं है।
व्यायाम-विधि: केवल हाथों की हथेलियों और पैरों के पंजों के सहारे जमीन पर आ जाएँ। दोनों हाथों और पैरों के बीच उचित अन्तर रखें। [अन्तर की मात्रा OCR में अस्पष्ट है: “एक हाथ चार”।] कमर ऊँची और गर्दन नीची रखें। ठोड़ी छाती में लगाकर पेट की ओर देखते हुए हाथों पर पूरा बल दें और नीचे झुकें। कोहनियों को मोड़ते हुए छाती को जमीन से एक इंच के अन्तर तक ले जाएँ। फिर गर्दन ऊँची उठाते हुए कमर और पेट को इतना नीचा करें कि जमीन से एक इंच अन्तर रहे। यह एक दण्ड हुआ। जितने दण्ड करने हों, उतनी बार यही क्रिया करें।
बैठक-व्यायाम
पैरों को बलवान् और सुन्दर बनाने के लिए बैठक का व्यायाम बहुत उपयोगी है। बैठक करने के लिए एडियों के बीच में कम-से-कम ६ इंच का अन्तर रखकर सीधे खड़े हो जाएँ। शरीर को ढीला छोड़ दें। छाती निकली रहे। हाथ लटके और खुले रहें और हथेलियाँ सामने की तरफ रहें। अब गहरी साँस धीरे-धीरे लें और बैठक पूरी होने तक रोके रहें। साँस खींचकर रोकने के बाद घुटनों को मोड़ते हुए पंजों पर बैठने की कोशिश करें।
नितम्ब जैसे-जैसे नीचे आएँ वैसे ही-वैसे एड़ियां ऊपर उठें; पर दोनों मिलने नहीं पाएँ। इसी प्रकार हाथों की मुट्ठी बांधकर कुहनी पर से मोड़ते हुए धीरे-धीरे कन्धों के पास ले जाएँ। परन्तु मुट्ठियों को कन्धों पर एकदम मत रखे और जाँघों को भी पिण्डलियों से कम-से-कम आधा इंच के अन्तर पर रोक दें। अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देर इस अवस्था में रहकर उलटी क्रिया करते हुए शुरू की बैठक अवस्था में आ जाएं।
बैठक करते समय कमर सीधी और सख्त रहे तथा मुट्ठियाँ काफी जोर से दबायी जाएँ। बैठक के बाद सीधे खड़े होकर रोकी हुई साँस को धीरे-धीरे छोड़ें और शरीर को ढीला छोड़ दें। यह एक बैठक हुई। इस विधि में थोड़ा-थोड़ा अन्तर करके बैठक के कई भेद हो जाते हैं, जैसे – आगे-पीछे - कूदते हुए बैठक से 'कूद बैठक' ओर चक्कर में कूदने से 'चक्कर- कूद बैठक'।
लाठी-व्यायाम
व्यायाम की दृष्टि से इसका उतना महत्त्व नहीं है, लेकिन आत्मरक्षा और दुष्टों के दमन के लिए इसका महत्त्व बहुत है। यह स्फूर्ति, बुद्धि और अवधान-वर्द्धक है। लाठी पुरुष की शक्ति है। लाठी चलाने का कौशल्य जरूर ही सीखना चाहिए।
मुग्दर- व्यायाम
बाहुबल के लिए मुग्दर-व्यायाम बहुत लाभकारी है। इससे भुजाएँ गठीली और सुदृढ़ होती हैं तथा समस्त शरीर को व्यायाम मिलता है। मुग्दर अधर में घुमाए जाते हैं, तब पैरों से लेकर सिर तक की मांसपेशियों का व्यायाम होता है और वे सुन्दर बनती हैं। मुग्दर निकालना पहलवानों की विशेषता है; इन्हें घुमाने का कौशल भी महत्त्व रखता है।
[मुग्दर के भार और उसे घुमाने की विस्तृत विधि का पाठ OCR में खण्डित है। उपलब्ध अंश में “६० सेर तक” लिखा है, पर पूरा सन्दर्भ स्पष्ट नहीं है।]
दौड़ने का व्यायाम
नये व्यायामों में इसकी प्रधानता है। वास्तव में यह बहुत लाभकारी है। टहलने घूमने का व्यायाम ५० वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों के लिए है। आजकल के शिक्षित लोग जो प्रातः - सायं भ्रमण करते हैं वह बुड्ढों की चीज है। नवयुवकों के लिए दौड़ने का व्यायाम शक्तिदायक है। इस व्यायाम से शीघ्र लाभ होने लगता है। इससे मंदाग्निमूलक दोष निश्चित रूप से दूर हो जाते हैं।
विधि - धीमी गति से दौड़ें। पैरों के साथ-साथ मुट्ठी बांध कर हाथों का व्यायाम भी करें। दौड़ते समय मुंह बन्द कर नाक से सांस लें और सीधे तनकर, छाती को आगे निकालकर, जितनी दूर दौड़ सकते हों, दौड़ें। एक एक पैर को ३२ इंच की दूरी पर रखते जाये।
फुटबॉल और हाँकी का खेल
विधि -- उन्हें किसी भी टीम में शामिल होकर सीखना चाहिए। ये वर्षों के अभ्यास से आते हैं। इनसे शक्ति तो बढ़ती ही है, बुद्धि की भी वृद्धि होती है। हॉकी में तो भारतवर्ष विश्वविजयी है लेकिन फुटबॉल में कमजोर। फुटबॉल में शारीरिक बल की भी आवश्यकता होती है। जिस उत्साह के साथ भारतीय छात्र इसमें भाग ले रहे हैं, उससे आशा है कि ओलम्पिक खेलों में भी हम लोग शीघ्र ही फुटबॉल में ऊँचा स्थान प्राप्त करेंगे।
कबड्डी
यह भारत का सर्वप्रिय खेल है। यह अत्यन्त स्फूर्तिदायक और बुद्धिवर्द्धक है। यह देहातों में सर्वत्र खेला जाता है। अब इसका प्रचार हाई स्कूल और कॉलेज के छात्रों से लेकर सर्वसाधारण जन में भी बढ़ रहा है। इसकी लोकप्रियता और बढ़नी चाहिए।
कृषिकार्य और बागवानी
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ये दोनों व्यायाम बहुत महत्त्व के हैं। हल और फावड़ा चलाने का व्यायाम बड़ा तगड़ा है। पशु-पालन के लिए भी कई काम करने पड़ते हैं। वे भी यदि नियमित रूप से किये जाएँ, तो शरीर सुदृढ़ और बलवान् बनता है। बागवानी का व्यायाम तो बहुत ही उत्तम है। पागलखाने में, अत्यधिक मानसिक परिश्रम के कारण पागल हुए व्यक्तियों से, बागवानी का काम भी कराते हैं, जिससे शारीरिक व्यायाम के साथ-साथ उनकी मानसिक दुर्बलता नष्ट होती है। फल और फूल के पौधे लगाना बहुत उपयोगी और आरोग्यकारक व्यायाम है। कृषि और बागवानी से व्यायाम के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी होता है। वर्तमान समय में यह लाभ परमावश्यक है।
तैरने का व्यायाम
तैरना भी एक बहुत सुन्दर व्यायाम है। इससे शरीर के सब अंगों का व्यायाम हो जाता है। जिनके पास सुविधा हो और जो कर सकें, उनको यह व्यायाम अवश्य करना चाहिए। गर्मी की ऋतु में तैरने का व्यायाम बहुत अच्छा है।
कुछ अन्य उत्तम व्यायाम
ऊपर लिखे व्यायामों के अलावा और भी बहुत-से उत्तम व्यायाम हैं। जैसे घोड़े की सवारी के व्यायाम की प्रशंसा मुसोलिनी ने बहुत की है। नाव खेना भी एक बहुत बढ़िया व्यायाम है। घूंसेबाजी (बॉक्सिंग) कुश्ती से अधिक कठिन व्यायाम है। पोलो का खेल भी एक कठोर तथा मनोरंजक व्यायाम है।
ड्रिल या कवायत का व्यायाम
स्कूलों के बालकों के शरीर-विकास के लिए ड्रिल या कवायद करते हैं। यह सरल व्यायाम है और इसके नियमित अभ्यास से लड़कों के शरीर सुडोल सुन्दर और हृष्टपुष्ट हो जाते हैं। ड्रिल-शिक्षक योग्य और व्यायाम का ज्ञाता होना चाहिए। राष्ट्र-निर्माण के लिए यह एक बड़े महत्त्व का काम है। इस व्यायाम को बड़े प्रेम और उत्साह के साथ अपनाना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के व्यायाम
इनके व्यायाम बहुत ही उत्तम, वैज्ञानिक तथा बुद्धि और बलवर्द्धक हैं। इस व्यायाम या कवायद के आविष्कारक के हमलोग कृतज्ञ हैं। जिन्होंने बिना किसी सामग्रीवाले इतने सुन्दर और उपयोगी व्यायाम राष्ट्र में प्रचारित किये। इनके व्यायाम करने का समय, स्थान और रीति सभी वैज्ञानिक हैं। यद्यपि मैं संघ के राजनैतिक विचारों से सहमत नहीं हूँ; लेकिन यह तो मानना ही होगा कि इसके इस व्यायाम-सम्बन्धी कार्य के प्रचार और प्रसार से देश की आरोग्य-वृद्धि में निश्चित रूप से लाभ हुआ है।
यह राष्ट्र की नींव का सुधार है, जिस-आधार पर हम लोग संसार के संघर्ष में जीवित रह सकते और विजयी हो सकते हैं। हिन्दुओं में शारीरिक दुर्बलता और आपसी फूट न हो, तो संसार की एक सर्वश्रेष्ठ जाति बनने में कोई सन्देह नहीं है।
आसन- व्यायाम
आसन अमीरी कसरत है। यद्यपि “अमीरी” शब्द के साथ “कसरत” शब्द मेल नहीं खाता, परन्तु ऐसे बाबू लोगों की इस देश में कमी नहीं है जिनकी प्रकृति जन्म से ही अमीराना (कोमल) है। केवल दिमागी काम करते रहने के कारण उनका शरीर ऐसी अवस्था में है कि वे दण्ड-बैठक आदि कड़ी कसरत नहीं कर सकते। उनके लिए नीचे बताए हुए आसनों का अभ्यास बड़ा अच्छा है। ये आसन एक या आधा घण्टा नियमित रूप से प्रतिदिन किए जाएँ तो तन्दुरुस्ती को बड़ा लाभ हो।
१- पादहस्तासन
पहले खड़े हो जाइए, फिर धीरे-धीरे दोनों हाथों को नीचे करके दोनों पांवों के अंगूठे पकड़िये, जब इसका अभ्यास हो जाए, तब अपनी नाक घुटनों तक ले जाइये या मस्तक दोनों घुटनों के नीचे रखिए। यह आसन प्रतिदिन १० मिनट करने से पेट में वायु जमा होने को शिकायत दूर हो जाती है। यकृत् (लीवर) का काम ठीक से होता है। मन्दाग्नि दूर होती। कब्जियत का दोष मिट जाता है और पाचन क्रिया ठीक से होती रहती है।
२- पश्चिमोत्तानासन
जमीन पर बैठकर पाँवों को आगे फैलाइए। फिर दोनों हाथों से दोनों पांवों के अंगूठों को पकड़ लीजिए। पैर सीधे ही रहने चाहिए। इसका अभ्यास ठीक हो जाने पर सिर को धीरे-धीरे झुकाते जाइए और दोनों घुटनों के बीच तक ले जाइए। ध्यान रखें, पैर बराबर सीधे रहने चाहिए।
इस आसन का यकृत (लीवर) पर बड़ा ही अच्छा प्रभाव पड़ता है। यह बवासीर को फायदा पहुँचाता है और मन्दाग्नि, अजीर्ण तथा पेट में वायु जमा होने की शिकायत को दूर करता है। एक योगाभ्यासी सज्जन ने तो मुझे बतलाया था कि इसके अभ्यास से मनुष्य उर्ध्वरेता हो जाता है। हमारे पूर्वजों ने इस अवस्था को बहुत उत्तम कहा है। शुक्र (वीर्य) का प्रवाह, जो जननेन्द्रिय की ओर रहता है, इस आसन से सिर की तरफ हो जाता है जिससे ब्रह्मचर्य का पालन अनायास ही होता है।
३- उत्तानपादासन
सब स्नायुओं को ढीला करके जमीन पर लेट जाइए। दोनों पाँव खूब सीधे रखिए और उन्हें धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाइए। जितनी मन्द गति से पाँवों को ऊपर उठायेंगे, उतना ही अच्छा फल होगा। पाँव को धीरे-धीरे उठाने से आंतों पर जोर पड़ता है, जिससे उनके सभी दोष दूर होकर काम ठीक-ठीक होने लगते हैं। जमीन से एक हाथ ऊपर जब पाँव आ जाय तब वहाँ पर अपनी शक्ति के अनुसार थोड़ी देर तक उन्हें स्थिर रखिए फिर बहुत धीरे-धीरे पांवों को जमीन पर ले जाइए। इस आसन से आंतों को बहुत शक्ति मिलती है। कब्जियत, बदहजमी आदि पेट के रोग दूर होते हैं और भूख खूब लगती है।
४ - सर्वाङ्गासन
जमीन पर लेट जाइए। दोनों पाँव उठाकर धीरे-धीरे अपने पीछे सिर के पास जमीन पर लगाइए। पाँव के अँगूठे और अँगुलियाँ ही जमीन को छुएँ। शेष भाग सीधा रहना चाहिए। हाथ सहारे के लिए कमर पर रखिए। शुरू में सहारा देना अच्छा है। प्रतिदिन १० मिनट तक इसके अभ्यास का उल्लेख है। [अभ्यास के परिणाम वाला वाक्य OCR में अधूरा है।] इससे तिल्ली और जिगर ठीक होते हैं तथा भूख खूब लगती है।
५ - उर्ध्व सर्वांगासन
नीचे जमीन पर लेटकर, दोनों पावों को जोड़कर, ऊँचा करना चाहिए। नितम्ब को जमीन में ही जमाए रखना चाहिए फिर अभ्यास करते-करते कन्धे और सिर के सहारे समस्त शरीर को तनाकर खड़ा कर देना चाहिए। शक्ति के अनुसार शरीर को ऊपर रखकर फिर पांवों को जमीन में गिरा देना चाहिए। इससे शीर्षासन के समान ही लाभ होते हैं।
शीर्षासन
इस आसन में सिर के बल खड़ा होना पड़ता है। सिर के नीचे गद्दीदार चीज रखनी चाहिए; सख्त जमीन पर सिर रखने से हानि का भय रहता है। प्रारम्भ में दीवार का सहारा और एक सहायक लेना चाहिए, जो गिरने से रोकने के लिए सतर्क रहे। अभ्यास हो जाने पर सहारे की आवश्यकता नहीं रहती। सिर को गद्दी पर अच्छी तरह टिकाकर दोनों हाथ सिर के आगे जमीन पर स्थिर रखने का उल्लेख है। [इसके बाद पैरों को उठाने की विधि का पाठ OCR में अधूरा है।] लेखक के अनुभव में शीर्षासन का रक्त-संचार पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः रक्त का दौरा ऊपर से नीचे की ओर होता है; शीर्षासन में पैरों से मस्तक की ओर प्रवाह होने का वर्णन है। लेखक इसके अभ्यास से रक्त-विकार और स्वप्नदोष में लाभ, रक्त की वृद्धि, दस्त की सफाई, नेत्र-ज्योति और शरीर की स्फूर्ति बढ़ने का उल्लेख करते हैं। सप्ताह में २–४ बार स्वप्नदोष होने पर भी अभ्यास से लाभ बताया गया है।
[आसन की अवधि और अन्त में दिए गए कुछ लाभों का पाठ OCR में अपूर्ण है। किसी आत्मकथा में शीर्षासन की प्रशंसा का उल्लेख है, किन्तु लेखक का नाम स्पष्ट नहीं है।]
७--धनुषासन (प्रथम प्रकार)
जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, हाथ और पैरों को पृथ्वी पर टेककर शेष शरीर को धरती से ऊपर उठा लेना चाहिए। हाथ और पाँव जितने अधिक समीप रहें, उतना ही यह आसन और उत्तम समझा जाता है।
८-- धनुषासन (दूसरा प्रकार)
जैसा चित्र में दिखाया गया है, पेट के बल जमीन पर लेटकर दोनों पावों को हाथ से पकड़ लेना और जितना शरीर को धनुष के आकार में किया जा सके, उतना करना अच्छा है। ऊपरवाला धनुषासन रीढ़ का प्रधान व्यायाम है। नवीनतम खोज से मालूम हुआ है कि मस्तिष्क की तरह रीढ़ का महत्त्व है। 'अधिक समय युवा बने रहने की जितनी विधियां हैं, उनमें भी रीढ़ व्यायाम बहुत आवश्यक है। यह आसन भी शीर्षासन की तरह बड़ा उपयोगी है।
अन्यान्य आसन
ऊपर लिखे आसनों के अतिरिक्त और भी बहुत-से आसन हैं। उनमें से अधिकांश उपयोगी भी हैं। अपनी रुचि और शरीर की स्थिति को देखकर उनका अभ्यास करना चाहिए; परन्तु योग्य शिक्षक से उनको सीखना चाहिए।
टहलने का व्यायाम
संसार के बड़े-बड़े विद्वान, राजनीतिज्ञ और पूंजीपति इस विषय में एकमत हैं कि दिमागी काम करने वालों के लिए टहलने का व्यायाम उत्तम है। महात्मा गान्धीजी जब इंग्लैण्ड गये थे, तब बीस घण्टे तक काम करने पर भी उनके भ्रमण और प्रार्थना में कभी बाधा नहीं पड़ी। सत्तर वर्ष से अधिक उम्र में भी गान्धीजी टहलते थे तो जवान आदमी भी पीछे छूट जाते थे।
वे बड़ी तेजी से चलते थे। अभी सन्त विनोबा भावे पैदल ही भारत-भ्रमण कर रहे हैं। यह भी प्रातःकाल चार बजे टहलने निकलते हैं; तब २० - २५ वर्ष के तगड़े जवानों को भी पीछे छोड़ देते हैं। गाँधीजी की तरह इनकी भी टहलने की गति चार मील प्रति घण्टे से अधिक ही होती है। तेजी से चलना ही टहलने का व्यायाम है।
जो लोग धीरे-धीरे पार्कों या बगीचों में घूमते हैं, उसको तो हम चहलकदमी ही कह सकते हैं, जो व्यायाम के अन्तर्गत नहीं आता। स्वास्थ्य के लिए टहलते समय जितना तेज चल सकें, उतना तेज चलना चाहिए। टहलने में हिसाब तेजी का ही नहीं अपितु, दूरी का भी रहता है। भ्रमण का व्यायाम वैसे तो सभी को लाभप्रद हैं; परन्तु जिनकी उम्र चालीस वर्ष से अधिक हो गई है या जो दिमागी काम करते हैं, उनके लिए अत्यन्त उपयोगी है।
आजकल शहरवालों ने चलने फिरने का क्रम छोड़ दिया है और मनुष्य की सवारी, पशु की सवारी तथा मशीन की सवारी का आश्रय लेते हैं। यह उनके पैरों की दुर्बलता का सूचक है।
प्राणायाम (श्वास- व्यायाम)
वृद्धावस्था में यह व्यायाम बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। वृद्धावस्था से पहले भी यह व्यायाम किया जा सकता है। स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्राणायाम का बहुत महत्त्व है। प्राचीन शास्त्रों में विशेषतः चित्त को एकाग्र करने के लिये योगशास्त्र में प्राणायाम का विशद वर्णन है और हमारे देश में सन्त महात्मा, योगी जन इसके विशेषज्ञ हैं। साधना के रूप में वे इसका अभ्यास करते हैं।
नये विज्ञान ने भी इसका महत्त्व स्वीकार किया है। घने शहरों में रहने वाले और आठ-दस घण्टा बैठकर काम करनेवाले लोगों के शारीरिक प्रधान अंगों में पूर्ण रूप से प्राणवायु नहीं पहुंचता। पूर्णरूप से प्राणवायु न मिलने से फेफड़े, हृदय (Heart), यकृत् आदि विकृत हो जाते हैं। उनको स्वस्थ रखने के लिए यह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए। प्राणायाम करने की कई विधियां हैं। प्राचीन आर्य-विधि किसी विद्वान् साधक से सीखनी चाहिए।
नवीन विधि भी किसी योग्य शिक्षक से सीखी जाय, तो अच्छा है। साधारण विधि यह है कि किसी खुले और ऊँचे स्थान पर सीधे तनकर खड़े होकर श्वास व्यायाम कीजिए। दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए गहरा सांस जितना खींच सकें, उतना खींचिए। सिर के ऊपर दोनों हाथ मिलने तक वह क्रिया समाप्त होनी चाहिए। फिर दोनों हाथों को नीचे लाते हुए श्वास को जितना बाहर निकाल सकें, उतना निकाल देना चाहिए। इसे प्राणायाम न कहकर लम्बा श्वास प्रश्वास भी कह सकते हैं।