आरोग्य-प्रकाशब्रह्मचर्य के बाधक कारण

ब्रह्मचर्य के बाधक कारण

14 मिनट का पाठ

१- अष्टविध मैथुन

स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्।
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च ॥
एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति विचक्षणाः।
विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम् ॥

१. स्मरण - पूर्व देखे सुने मैथुन का ध्यान आना, सम्भोग योग्य व्यक्ति का ध्यान आना।

२. कीर्तन - मैथुन की बातें करना, अश्लील कहानी, नाटक उपन्यास अथवा अन्य कोई पुस्तक, जिससे मैथुन करने की इच्छा को प्रोत्साहन मिले, पढ़ना। अश्लील गाने -- जैसे आजकल सिनेमा, रेडियो और होली जैसे त्योहारों पर गाये जाते हैं -- गान, अश्लील-गालियाँ बकना आदि सब मैथुन है।

३. केलि — काम क्रीड़ा, हँसी-मजाक में हाथापाई करना, चिकोटी - काटना, ऐसे ही अन्य प्रकार की छेड़-छाड़ करना और हाथ, पाँव, भों, आँख-मुंह से गन्दे इशारे करना भी केलि में शामिल हैं। यह सब मैथुन में सहायक होने से मैथुन हैं।

(४) प्रेक्षण -- जिससे विषय भोग की इच्छा उत्पन्न हो अथवा बढ़े इस प्रकार किसी को छिपकर अथवा सामने आकर देखना, यह भी मैथुन में सहायक होने के कारण मैथुन है।

(५) गुह्य भाषण -- मैथुन सम्बन्धी गुप्त बातें करना अथवा स्त्री-पुरुष का कहीं छिपकर बात-चीत करना; कीर्तन से इसमें छिपने मात्र का भेद है।

६. संकल्प - मैथुन करूँ ऐसी तरंग मन में उठना।

(७) अध्यवसाय -- मैथुन करने का उपाय करना - जैसे मैथुन करने के लिए पैसे देकर राजी करना अथवा नौकरी देना, अपराध मुक्त करना या अन्य - कोई सहायता देना, गलियों में चक्कर लगाना या इस प्रकार के अन्य उद्योग करना।

(८) क्रिया-निर्वृत्ति -- जानबूझ कर लिंगेन्द्रिय से वीर्यपात क्रिया करना। यह तो साक्षात् मैथुन ही है। यह आठ प्रकार का मैथुन ब्रह्मचर्य का नाशक है। इससे बचना ब्रह्मचर्य है।

२ - सिनेमा

हमें सिनेमा से इसलिए बचना है कि इनके जरिये बहुत दिनों से जो सामग्री हमें दी जा रही है, वह हमारे स्वास्थ्य और सामयिक आवश्यकता, दोनों के विपरीत हैं। मनोरंजन के नाम पर स्त्रियों के सुन्दर-मृदु और अर्धनग्न अंगों को दिखाकर, विद्यार्थियों और नवयुवक नवयुवतियों के मन में जिन इच्छाओं को जन्म दिया जाता है अथवा बढ़ाया जाता है, वह उन्हें कामोपभोगी, लम्पट बनाकर उनके स्वास्थ्य का सर्वथा नाश करता है।

झाँसी-निवासी प्रमुदत्तजी ब्रह्मचारी लिखते हैं कि " सब से बड़ा विष तो सिनेमाघरों में बोया जाता है। यह मनोविनोद नहीं है। चरित्र के पतन और ब्रह्मचर्य के विनाश का खुला द्वार है। छात्रावस्था में सिनेमा देखने का बहुत व्यापक, घातक प्रभाव होता है। युवक-युवतियों के मन को चंचल कर वीर्य अपने स्थान से चलित हो जाता है। आजकल के नवयुवक, जो ९० प्रतिशत वीर्य विकार से पीड़ित है, उसका कारण सिनेमा है।" अतः सिनेमा देखना स्वास्थ्य के लिए घातक है।

सिनेमा के धार्मिक चित्रों में भी अर्धनग्न दृश्य या शृंगार रस के गानें गाये जाते हैं। अतः सिनेमा के बुरे प्रभावों से बचने के लिए उनका न देखना ही श्रेयस्कर है।

३ - अश्लील साहित्य

अश्लील साहित्य, जिसमें कामवासनाओं को जगाने की सामग्री का अधिक वर्णन होता है, विद्यार्थियों के लिए किसी समय भी पढ़ना अच्छा नहीं है। गृहस्थों की देखा-देखी विद्यार्थी भी रेल के सफर में, रविवार की छुट्टियों के समय बिताने के लिए अश्लील कहानी, उपन्यास, नाटक आदि पढ़ने लगते हैं। ऐसे साहित्य के पढ़ने से मन में सम्भोग की इच्छा पैदा होती है। कामदेव जागता है। उसका नाम 'मनोभव' और 'मनोमथ' है।

वह मन से पैदा होता है और मन को मथ (विलो) डालता है। गन्दे साहित्य के पढ़ने से मन में गन्दापन अवश्य आता है। कोई प्रच्छन्न पाप करने की प्रवृत्ति पैदा होती है, जिससे विद्यार्थी हस्तमैथुन जैसी बुरी आदतों के शिकार बन जाते हैं। उससे स्नायु जाल ढीला हो जाता है। धातु-स्राव, स्वप्न-दोष, इन्द्रिय-दौर्बल्य, सिर में चक्कर, कमर दर्द भूख की - कमी, पेचिश, संग्रहणी तथा वीर्य विकार से पैदा होनेवाली व्याधियों के सिलसिले बँध जाते हैं।

इन बुरे परिणामों की जड है मन में बुरे भावों की उत्पत्ति होना। इससे बचने के लिए अश्लील साहित्य और गन्दे चित्रों से परहेज करना हमारा प्रधान कर्त्तव्य है।

४- पूर्ण अवस्था के पहले सम्भोग

युवावस्था में स्त्री का मन पुरुष की ओर पुरुष का मन स्त्री की ओर आकृष्ट होता है। यह आकर्षण स्वाभाविक है और मिलने के योग्य अवस्था अर्थात् स्त्री की सोलह वर्ष और पुरुष की पच्चीस वर्ष की अवस्था होने से पहले ही इस आकर्षण का प्रभाव दोनों के मन में पड़ने लगता है। ऐसी कच्ची अवस्था में मिलन होने से पुरुषों में प्रमेह, स्वप्न में वीर्य-स्राव, नपुंसकता, शीघ्रपतन आदि रोग और स्त्री में प्रदर, सोम, योनिव्यापद्, मासिकधर्म की अनियमितता और कृच्छ्रता आदि रोग पैदा होते हैं।

इसलिए इस कच्ची अवस्था में पुरुष को स्त्री के मिलन से बचाना परमावश्यक है। परस्पर दर्शन, परस्परालाप, परस्पर मनो-विनोद की बातें और अधिक सहचार से मिलने की इच्छाओं की वृद्धि होती है। इसलिए विद्यार्थी कच्ची अवस्था में अर्थात् पच्चीस वर्ष से पहले दोनों को इस प्रकार की स्थितियों से बचना आवश्यक है।

५- सह - शिक्षा

नवयुवक और नवयुवतियों को महाविद्यालय में एक साथ शिक्षा देना स्वास्थ्य - सिद्धान्त के विपरीत है। अध्ययन काल में अष्टविध मैथुन का परिहार करना आवश्यक है। सह-शिक्षा में उससे परहेज होना असम्भव है। सह-शिक्षा के दुष्परिणाम दूसरे देशों में, जहाँ वह पहले से चली आ रही है, अति प्रसिद्ध हैं। भारत में भी, जब से यह आरम्भ हुई है, वही परिणाम होने लगे हैं। यह स्वाभाविक बात है -

घृतकुम्भसमा नारी तप्तांगारसमः पुमान्।
तस्मात् घृतं च वह्नि च नैकत्र स्थापयेद्बुधः।

घी भरे बर्तन को प्रज्वलित अग्नि के पास रखकर देखें। जो स्वाभाविक परिणाम होगा वह स्त्री और पुरुष के एक साथ रहने से कैसे रुकेगा? ऐसे दुष्परिणामों से बचने के लिए सह-शिक्षा को बन्द ही करना होगा।

६- घरों का वातावरण

यदि हम चाहते हैं कि विद्यार्थियों को घर में रखकर ही विद्याभ्यास करावें तो उनका शरीर, मन, बुद्धि रखने के लिए घर का वातावरण शुद्ध रखना होगा। घर के वातावरण और नित्य के व्यवहार का हृदय पर बड़ा असर पड़ता है। आजकल के साधारण पुरुषों के घर को देखें-- उनमें मन को उत्तेजित करने की सामग्री भरपूर मिलेगी। रेडियो के अश्लील गीत, सुन्दर युवतियों के हावभाव भरे चित्र, गन्दे साहित्य का अध्ययन, रङ्गबिरंगे वस्त्रों से बनावटी सजावट यह सारा मानसिक स्वास्थ्य का विरोधी वातावरण है।

ऐसे वातावरण में रहा हुआ विद्यार्थी वैसा ही होगा जैसा वैसे घर में रहा हुआ होना चाहिए। बचपन के जीवन में तो यह सिद्धान्त शत-प्रतिशत लागू होता है। इसलिए बच्चों को घरों में रख कर ही यदि हमें पढ़ाना है तो पहले घरों के वातावरण को शुद्ध करना चाहिए। हमारा स्वयं का रहन-सहन पूर्ण भारतीय होना चाहिये।

७ - कुसंगति : बुरों की दोस्ती

कुसंगति अच्छे मनुष्य को भी बुरे मार्ग पर घसीट ले जाती है। जुआ, चोरी व्यभिचार इसी प्रकार के और भी बड़े-बड़े पापों में जहाँ अकेले मनुष्य की प्रवृत्ति संकोच या भयवश नहीं होती, कुसंगति हौसला देकर भीरु को भी आगे बढ़ा देती है। छोटेपन में बच्चों को सिगरेट पीने, जुआ खेलने, स्कूल में ऊधम करने, हाथ से इन्द्रिय को रगड़कर वीर्य निकालने और आपस में व्यभिचार (नाजायज ताल्लुक) तथा अन्य सभी बुरी हरकतें कुसंगति से ही आती है।

देश को अब पढ़े-लिखे बीमारों और बदमाशों की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब यह स्वतन्त्र देशों की श्रेणी में पहुँच गया है। अब स्वस्थ, सच्चे और सदाचारियों की इसे आवश्यकता है। इसलिए माता-पिता और मास्टरों का ध्यान पढ़ाने-लिखाने के साथ ही बच्चों को कुसंगति से बचाने की ओर विशेष होना चाहिए। अब छात्रों का ध्यान भी इस ओर विशेष होना चाहिए, क्योंकि वे भी अब स्वतन्त्र देश के बालक हैं।

अपने देश में १२ वर्ष से १९ वर्ष तक के बालक बालिकाओं की शिक्षा के साथ विद्यालय के शिक्षकों और प्रबन्धकों का यह भी कर्त्तव्य होना चाहिए कि वे देखें कि उनमें बुरी आदतें तो नहीं पनप रहीं। दुर्भाग्यवश इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति इस पर विशेष जोर देती रही है।

८- वीर्य-सम्बन्धी ज्ञान का अभाव

आजकल विद्यार्थी उचित अवस्था होने तक भी वीर्य-रक्षा का महत्त्व नहीं जानते। इसका बुरा फल हमारे सामने हैं। जब तक विद्यार्थियों को वीर्य-सम्बन्धी उचित शिक्षा प्राप्त नहीं होती, तब तक समाज अथवा व्यक्ति स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता। बड़ी अड़चन यह हैं कि गुरु, माता-पिता आदि जिनको वीर्य-सम्बन्धी उचित शिक्षा देने का अधिकार है वे लोग छोटे विद्यार्थियों के सामने 'वीर्य' शब्द का उच्चारण करने में भी लज्जा का अनुभव करते हैं, जैसे वे कोई पाप करने लगे हों।

फिर विद्यार्थियों को वीर्य-रक्षा कौन सिखायेगा? वीर्यं रक्षा में उनकी प्रवृत्ति कैसी होगी? वे स्वस्थ कैसे बनेंगे? उन्हें दोष क्यों दिया जा सकेगा? प्रकृति के नियम तोड़ने से उसका दण्ड बीमारी अथवा शीघ्र मौत के रूप में भोगना ही पड़ेगा। इन आपत्तियों से बचने के लिए वीर्य-सम्बन्धी ज्ञान छात्र के अभिभावकों को कराना चाहिए। वीर्यं सब धातुओं का सार है, रक्त से ६ गुना अधिक महत्त्व रखता है।

दस बीस बूंद रक्त गिरने से हम घबरा जाते हैं, फिर वीर्य तो रक्त से बहुत महत्त्वपूर्ण है। दूध में घी और ईख में रस की तरह वीर्यं सारे शरीर में व्याप्त रहता है। मैथुन के समय वह धातुओं में से छनकर बाहर आता है। उत्तरोत्तर एक-एक धातु के बनने में पहली पहली धातु का नियत समय तक परिपाक होता है। वीर्य सातवीं धातु है।

पहली ६ धातुओं के क्रमिक परिपाक से उसकी उत्पत्ति होती है। शरीर में धातुओं के सार रूप में बहुत थोड़ा-सा है। उसको व्यर्थ खोना भारी गलती है। व्यर्थ खोने से क्षय, पेचिश, मन्दाग्नि, अपस्मार और पक्षाघात आदि भयानक रोग होते हैं। इनसे बचने के लिए प्रत्येक मनुष्य को वीर्य का महत्त्व समझना आवश्यक है।

९- अनियमितता

आजकल, अच्छे नियमों को भी तोड़कर, अनियमित रहने को ही कुछ लोग स्वतन्त्रता समझते हैं। ऐसी स्वतन्त्रता अर्थात् उच्छृङ्खलता मनुष्य को बे-लगाम घोड़े के मानिन्द गड्ढे में ले गिरती है। वह जल्द ही बीमार हो जाता है।

इसलिए अपने नित्य प्रति के सब कामों में-- शौच, स्नान, संध्या, भोजन-विश्राम, कार्य-व्यवहार, खेल-कूद, सोना और जागना में अनियमितता हटानी चाहिए। ऐसा करने से कोई रोग नहीं होगा। ब्रह्मचर्य पालन में सहायता होती है।

१० - साइकिल की सवारी

सस्ती होने के कारण, आजकल साइकिल की सवारी बहुत बढ़ती जा रही है। पर इससे बड़े नुकसान होते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों की जननेन्द्रिय पर इसका सीधा प्रभाव होता है। शीघ्र वीर्यपात का रोग साइकिल से होता है। फेफड़ों की बीमारी और दिल की धड़कन साइकिल सवारी से बढ़ती है, पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है। रोटी कमाने में साईकिल की सहायता मत लो, ऐसा निषेध हम नहीं करते; पर इसका अधिक उपयोग हानिकर है। यह कहते हैं यह साथी है। जो नुकसान दे, वह साथी क्या? छोटी आयु के बालकों का स्वास्थ्य रिक्षा चलाने से बिगड़ जाता है इसका ध्यान देकर ही स्वायत्तशासी संस्थाओं को आयु निर्धारित करनी चाहिए।

११- शृंगार

शृंगार औरतों का आभूषण है; वह भी अपने पति को प्रसन्न रखने के लिए। दूसरे को आकृष्ट करने की प्रवृत्ति से व्यभिचार को प्रोत्साहन प्राप्त होता है। विदेशी शिक्षा ने भारतीयों को सबसे अधिक यही सिखाया है। अँग्रेजी भाषा. शिक्षित जन एक छोटासा हैंड-बेग अपने साथ रखते हैं, जिसमें कंघा और शीशा रहता है। बार-बार चेहरे को देखना, झाड़ना-पोंछना, स्नो-पाउडर लगाना बहुत बढ़ रहा है।

इसका उद्देश्य दूसरों को आकृष्ट करना है। 'नाकामी मण्डनप्रियः' काम वासना के बिना शृंगार प्रिय नहीं होता। अपने को सुसज्जित देखकर प्रसन्न होना, इतने छोटे दायरे में श्रृंगार करने की इच्छा नहीं समाती। कपड़े आदि से सजे-सजाये बालक को उठाकर प्यार करने की इच्छा पैदा होती है। लेकिन सजिले युवक और सजीली युवतियों में परस्पर देखकर आकर्षण उत्पन्न होता है। मिलन का अवसर न मिलने पर, दोनों के खून और वीर्य में उबाल आता है।

शरीर की उष्णता (Temperature) बढकर वीर्य को पतला और स्थान से चलित कर देती है। वह वीर्य शरीर में रुक नहीं सकता। सोते समय, स्त्री-सम्भोग के स्वप्न आकर, वीर्यपात हो जाता है। जागते में, पेशाब के आगे-पीछे या साथ में वीर्य निकल जाता है। इसीसे स्वप्नदोष और धातु-स्राव की बीमारी होती है। इससे शीघ्रपतन, नसों की कमजोरी (Nervous weak-ness), नपुंसकता होना स्वाभाविक है। आजकल के नवशिक्षित स्त्री-पुरुष में शीघ्रपतन का दोष बहुत है।

यह शृंगार का दुष्परिणाम है। शृंगार-प्रिय मनुष्य के मन में निरन्तर काम-वासना ही बसी रहती है। उनका दिमाग कमजोर हो जाता है। छोटे-छोटे कामों में भूल और व्यग्रता होती हैं। दिमाग सही और मन पर काबू नहीं रहता है। वीर्य शीघ्र स्खलित होने से सम्भोग में इच्छित सुख नहीं मिलता। वह तब अफीम आदि नशीली चीजों का सहारा लेता है। उससे आरम्भ में तो कुछ सहारा मिलने से सुख प्राप्त होता है; किन्तु थोड़े दिन के बाद पहले से भी बदतर बन जाता है।

नशीली-शुष्क चीजों से शरीर का वीर्य बिलकुल सूख जाता है। इस दुःखान्त नाटक से जो बचना चाहें, उन्हें ब्रह्मचर्य की शरण में आना ही पड़ेगा। हमारे पूर्वजों ने विद्यार्थी जीवन को जो कठिन जीवन बिताना कहा है, वह शृंगार के दुष्परिणामों से बचकर स्वस्थ रखने के लिए ही कहा है।

१२- कठिन ब्रह्मचर्य के बिना भावी जीवन दुःखमय

विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य नष्ट करके जो लोग गृहस्थी में प्रवेश करते हैं, उनका जीवन अत्यन्त दुःखपूर्ण होता है। शीघ्रपतन और स्नायु मण्डल की शिथिलता से स्त्री को तृप्त न कर सकने के कारण, स्त्री के सामने आने में ऐसे लोगों को अति संकोच और लज्जा का अनुभव होता है। स्त्री को हर समय उन्मनी देखकर वह कमजोर मनुष्य या तो आत्महत्या की अथवा कहीं भाग निकलने की बात सोचने लगता है।

ऐसी दशा में कोई दवा नहीं, जो उसको ब्रह्मचारी के समान शरीर और मन से स्वस्थ बना दे। इस प्रकार की निराशा और दुःखों से रक्षा करके, गृहस्थी का पूर्ण आनन्द प्राप्त कराने के लिए विद्यार्थी को कठोर ब्रह्मचर्य पालन करने की प्रेरणा देते हैं। हमारा अभिप्राय कदापि यह नहीं कि एक स्वस्थ मनुष्य स्त्री-सम्भोग का आनन्द प्राप्त न करे। कठोर ब्रह्मचर्य केवल विद्यार्थियों के लिए और नियमित स्त्री-सम्भोग गृहस्थों के लिए स्वास्थ्यजनक है।

इसलिए हम दो प्रकार के ब्रह्मचर्य का निर्देश करते हैं। ब्रह्मचारी अध्ययनकाल में ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन नहीं करता तो गृहस्थी में दुःख ही दुःख भोगता है। गृहस्थ यदि इन्द्रियसंयम न करके स्त्री-सम्भोग करता है, तो दुःख ही दुःख भोगता है। इसलिए हमें उचित है कि ब्रह्मचर्य का नाश न करे।

१३- शक्ति के खर्च पर नियन्त्रण

ब्रह्मचर्याश्रम या विद्यार्थी जीवन शक्ति-संचय करने की अवस्था है। गृहस्थाश्रम शक्ति के खर्च का आश्रम है। सावधानी की जितनी आवश्यकता शक्ति के संचय-काल में है; खर्च में उससे भी अधिक सावधानी की आवश्यकता है। शक्ति का खर्च केवल उपस्थ इन्द्रिय से ही नहीं, मन, वाणी और कर्म -- तीनों से होता है। लौकिक पदार्थो के अधिक चिन्तन से, ज्यादा बोलने से तथा मात्रा से अधिक काम करने से शक्ति नष्ट होती है।

यह बात अनुभव करके देखी गई हैं कि आत्म-चिन्तन या ईश्वर - चिन्तन से शक्ति नष्ट नहीं होती, किन्तु लौकिक वस्तुओं के चिन्तन से शक्ति नष्ट हो जाती है। अधिक बोलने से तो शक्ति का बहुत ही अपव्यय होता है। इन सबका संयम रखने से शक्ति संचित होती है इसलिये 'ब्रह्मचर्य' शब्द से हम सब इन्द्रियों के संयम को ग्रहण करते हैं; केवल उपस्थ के संयम का ही नहीं।

विद्यार्थी जीवन में अधिक बोलना या सांसारिक पदार्थों का अधिक संग्रह करने की वृत्ति ग्रहण करना, वीर्यपात करना -- जीवन नष्ट करना ही है। गृहस्थ को भी मन, वाणी और इन्द्रियों का संयम करना चाहिए। इससे ब्रह्मचारी और गृहस्थ दोनों का स्वास्थ्य बढ़ता है।