भोजन के सहायक पदार्थ
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मीठा
शरीर में उष्णता और शक्ति उत्पन्न करने के लिए जितने प्रांगोदीय या कार्बो-हाईड्रेट्स की अपेक्षा होती है, वे चावल, गेहूँ, दाल और घी आदि से मिल जाते हैं। फिर भी मीठा इसलिए भोजन का सहायक पदार्थ है कि उससे उत्पन्न उष्णता से पाचकाग्नि भी बढ़ती है। उचित मात्रा में मीठा खाना हितकर है, परन्तु आजकल शहरों में जिस प्रकार अधिक मीठा खाया जाता है, वह स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला होता है।
दूध-मिठाई आदि में कुल मिलाकर अधिक-से-अधिक एक छटांक मीठा प्रतिदिन खाना चाहिए। मीठे में सबसे उत्तम तो मधु (शहद) होता है; परन्तु वह आजकल सबको विशुद्ध नहीं मिलता। उसके बाद गुड़ उपयोगी है, उसमें मिश्रित पीला पदार्थ विशेष लाभदायक होता है। चीनी (शक्कर) में वह नहीं होता, इसलिए चीनी गुड़ के बराबर गुणकारी नहीं होती।
ईख (गन्ने) से बने गुड़ की अपेक्षा ताड़ या खजूर का गुड़ अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि उसमें बहुत बड़ी मात्रा में ग्लूकोज विद्यमान रहता है। बंगाल-बिहार में ताड़ का गुड़ काफी बनता है।
मीठे के स्थान पर विशेषकर पेयों में सेकरिन नामक जो पदार्थ दूकानदार प्रयोग करते हैं, वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
खनिज द्रव्य
खनिज द्रव्यों से शरीर की अस्थि, रक्त आदि धातुयें बनने और पुष्ट होने में मदद मिलती है। अन्नादि के पाचन एवं सात्मीकरण में भी खनिज सहायक होते हैं। खनिजों में नमक प्रधान है। कुल मिलाकर डेढ़ तोला खनिज दैनिक भोजन में होना चाहिए अन्य खनिज तो रोटी, दाल, शाक, चावल, दूध और मांस आदि से उचित अनुपात में मिल जाते हैं; परन्तु नमक इन पदार्थो में कम होता है, इसलिए ऊपर से मिलाकर खाना पड़ता है।
मांस में स्वाभाविक ही काफी नमक होता है, इसलिए मांसाहारियों को अतिरिक्त नमक कम लगता है। परन्तु शाकाहारी भोजन में लगभग आधा तोला नमक दाल, शाकों और आटा में मिलाकर नित्य खाना चाहिए। नमक बिलकुल न खाने से कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
अन्य मिर्च-मसाले और अचार चटनी-मुरब्बा आदि स्वास्थ्य पुष्टि की दृष्टि से बिलकुल आवश्यक नहीं। इनका उपयोग केवल रुचि उत्पन्न करने (भोजन में स्वाद बढ़ाने) के लिए किया जाता है। इन्हें आवश्यकता होने पर कम मात्रा में ही खाना चाहिए, क्योंकि इनसे उत्पन्न रुचि स्वाभाविक नहीं होती, और अन्ततः यह हानि करते हैं। बहुत मिर्च-मसाले और चाट-पकोड़ी खाने वाले कभी स्वस्थ नहीं रह सकते।
विटामिन्स (जीवतिक्तियाँ)
भोजन के साथ अल्प मात्रा में विटामिन (जीवतिक्ति) नामक तत्त्वों का लेना हितकर है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में, आधुनिक लोगों के अत्यधिक प्रचार से आजकल विटामिन्स खाने में अत्युत्साह पाया जाता है।
मांस में विटामिन्स कम रहते हैं, इसलिए मांसाहारियों को अलग से हरे साग-सब्जी, फल आदि खाकर विटामिन्स की पूर्ति करना आवश्यक है। केवल मांसाहार पर आश्रित पश्चिमी देशों में आजकल इसी कारण शाकाहार को भोजन में सम्मिलित करने पर जोर दिया जा रहा है। शाकाहार में ही हरीपत्ती, फल-अन्न आदि है।
परन्तु हमारे देश में, जहाँ का भोजन ही शाकाहार प्रधान है, वहाँ फलाहार के अधिक प्रचार की कोई अपेक्षा नहीं। शाकाहार में विटामिन्स स्वयमेव ही बहुतायत से विद्यमान रहते हैं, इस कारण अतिरिक्त लेने की आवश्यकता नहीं।
इतना ही पर्याप्त है कि प्याज, टमाटर, लूनी, हरा धनिया, पोदीना, मूली की पत्तियाँ तथा सलाद, अमरूद, ककड़ी आदि में से कुछ को लेकर भली-भाँति धोकर बारीक काट लें। उसमें नमक, नीबू का रस और अल्प मात्रा में हरी मिर्च मिलाकर चटनी या कचूमर बना लें और बहुत थोड़ा-सा भोजन के साथ ले लें। शाकाहारी भोजन में इतने से ही अपेक्षित विटामिन्स की पूर्ति हो जाती है।
विटामिन्स प्राप्ति के लिए आधुनिक लोग अधिक मात्रा में सब्जी और फल खाने पर बहुत जोर देते हैं। परन्तु केवल शाक-सब्जी-फल खाकर स्वस्थ रहने की कल्पना गलत है। विटामिन्स से ही शरीर पुष्ट होता है और वही भोजन का सार है---यह बड़ा भारी भ्रम हमारी जनता में फैल गया है। आधुनिक पढ़े-लिखे युवक इस प्रचार से बहुत गुमराह हो रहे है। एक बार मेरे एक भतीजे ने कहीं पढ़ लिया कि पपीता पेट के रोगों पर अचूक है।
उसके पेट में खराबी थी। वस, पन्द्रह दिन तक उबाले हुए पपीता पर ही वह रहा। मुझे पता लगते ही अन्नाहार शुरू कराया। परन्तु पपीता तब तक काफी 'गुण' कर चुका था। उस समय उसकी जो पपीता खाने से अग्नि मन्द हुई, वह आज कई वर्ष बीतने पर भी बनी हुई है।
सारांश यह है कि हमारे देश में विटामिन्स का अति प्रचार करके सब्जी और पत्तियों को बहुत खाने का अभ्यास कराना कदापि युक्ति युक्त नहीं है। भिण्डी, बैंगन, तोरई, कद्दू, लौकी (घिया) फूलगोभी, पत्तागोभी, गाँठगोभी, सेम तथा सहजन की फली आदि के साग यदा-कदा रुचि बदलने के लिए खाना चाहिए। शाकों में आलू का बहुत प्रयोग होता है। मांसाहारियों के लिए आलू आवश्यक है, परन्तु शाकाहारियों के लिए यह कुछ भी उपयोगी नहीं। इससे अच्छा केला है जिसमें स्टार्च के साथ कुछ लोहा भी है।
फल
फल खाने से भी अपेक्षित विटामिन्स की पूर्ति होती है। फलों में आँवला और कागजी नीबू सर्वश्रेष्ठ गुणदायी फल हैं। आम, अंगूर, अनार, सेव, सन्तरा, मौसमी, अनन्नास आदि भी स्वास्थ्यकर फल हैं। कच्चे खाने योग्य फलों में ककड़ी, खीरा, अमरूद उत्तम फल हैं। इनमें अमरूद सर्वाधिक उपयोगी है।
उसको भारत का सेव कहा जा सकता है। केला वैसे साधारण फल है, परन्तु दही के साथ खाने पर लाभदायक है। कन्दों में प्याज बहुत बढ़िया कन्द है। शकरकन्द, आलू आदि निकृष्ट कन्द हैं।
सूखे फल और मेवे जैसे बादाम, पिश्ता, काजू, खुमानी, अखरोट, चिलगोजा चिरौंजी, किसमिस और मूंगफली आदि भी पौष्टिक होते हैं। इनमें मूंगफली सबसे सस्ता और पुष्टिकारक मेवा है। इसको चीनी बादाम भी कहते हैं। श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन ने झाँसी में लक्ष्मी व्यायाम मंदिर नामक संस्था में जो पौष्टिक खाद्य का परीक्षण किया था, उसमें मूंगफली बहुत उपयोगी सिद्ध हुई। एक छटाँक मूँगफली का बीज, एक छटाँक पानी में भिगोए अंकुरित चने, आधी छटाँक गुड़ के साथ अथवा तलकर नमकीन बनाकर नित्य नाश्ते में लेने से पर्याप्त पौष्टिक खाद्य शरीर को मिल जाता है।
युवकों के लिए यह अच्छा शक्तियुक्त नाश्ता है। किस आहार द्रव्य में कौन-कौन सी और कितनी विटामिनें हैं इसे पीछे तालिकाओं में दिया गया है।