आरोग्य-प्रकाशभोजन के पौष्टिक पदार्थ

भोजन के पौष्टिक पदार्थ

21 मिनट का पाठ

दूध

क्षीरघृताभ्यासी रसायनानाम् श्रेष्ठतमः।

आयुर्वेद के मतानुसार शरीर को परिपुष्ट और एक प्रकार से नया बना देने वाले रसायन तत्वों में दूध और घी सर्वश्रेष्ठ हैं। दूध में शरीर की क्षतिपूर्ति करके रस रक्तादि धातुओं को विवर्द्धित कर अंग-प्रत्यंग का विकास करने वाले तत्त्व प्रभूत मात्रा में होते हैं।

विश्ववन्द्य महात्मा गांधी ने 'आरोग्य की कुंजी' नामक पुस्तक में दूध के विषय में लिखा है कि— "मैं शाकाहार का पक्षपाती हूँ। मगर अनुभव से मुझे यह स्वीकार करना पड़ा है कि दूध और दूध से बनने वाले पदार्थ जैसे मक्खन, दही आदि के बिना मनुष्य शरीर पूरी तरह टिक नहीं सकता।.... मैं १९१७ में सख्त पेचिस का शिकार बना। शरीर हाड़-पंजर हो गया।

मैंने हठपूर्वक दूध या छाछ लेने से इन्कार किया। शरीर किसी तरह बँधता ही नहीं था।.... जो भी हो बकरी का दूध तुरन्त आया और मैंने वह लिया। लेते ही मुझमें नया चेतन आया। शरीर में शक्ति आयी। मैं खाट पर से उठा। इस तरह से और ऐसे अनेक अनुभवों से मैं लाचार होकर दूध का पक्षपाती बना हूँ।"

दूध वस्तुतः पूर्ण आहार है। जन्म से ही केवल माता का दूध पीकर बालक स्वस्थ रहकर विकास पाता है। यह दूध के पूर्ण आहार होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पर्याप्त मात्रा में केवल दूध लेकर मनुष्य आनन्द से पूरा जीवन बिता सकता है। केवल दूध पर निर्भर रहने के लिए उसकी मात्रा अधिक होनी चाहिए। थोड़ा भी अन्न साथ लेने से दूध की मात्रा कम ही चल सकती है।

युवा अवस्था का व्यक्ति यदि केवल दूध दिन भर में तीन सेर से कम लेवे तो उसका वजन घटने लगेगा, परन्तु दस तोला ही अन्न एक सेर दूध के साथ लेते रहने से शरीर का वजन और शक्ति यथावत बनी रहेगी। दूध को आम के रस में मिला कर लेने से शरीर की उत्तम पुष्टि होती है इसी प्रकार दही के साथ केले का प्रयोग भी शरीर का वजन बढ़ाने में अद्वितीय है। केवल आम या केला से कुछ नहीं होता, जब कि दूध या दही अकेला ही पर्याप्त मात्रा में लेने पर वजन बढ़ा सकता है।

दूध सदा ही स्वस्थ पशु का लेना चाहिए। बीमार पशु का दूध लेने से मनुष्य का रोगी हो जाना निश्चित है, क्योंकि अन्य आहारीय पदार्थों की अपेक्षा दूध में जीवाणु - पोषक शक्ति सर्वाधिक होती है। रोगी पशु के दूध में उसके रोग-कीटाणु अधिक सशक्त होते हैं, इसलिए उससे जीवाणुजन्य रोग होने की अधिक संभावना रहती है। दूध से उत्पन्न होने वाले रोग का आरम्भ तत्काल होता है और दूध का सेवन बन्द करते ही एकदम रोग बन्द हो जाता है।

जिसका बच्चा जीवित हो ऐसी स्वस्थ गाय का दूध अमृत समान है। स्वच्छ पात्र में दुहा हुआ धारोष्ण दूध यदि तुरन्त ही स्वच्छ वस्त्र से छानकर पिया जाय तो वह सर्वोत्तम होता है। दुहने के बाद यदि १०-१५ मिनट भी दूध रक्खा रहे तो वह विकृत हो जाता है। दूध को एक उफान देकर गर्म कर लेने से उसके रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। अधिक देर आग पर रखने से भी दूध के उत्तम गुण क्षीण हो जाते हैं, और पचने में गरिष्ट भी हो जाता है।

इसलिए दूध को एक उफान आने पर आग से उतार कर, शीतोष्ण करके पी लेना चाहिए। आजकल वैज्ञानिक पद्धति से डेरीयों में ताजा दूध शुद्ध बोतलों में 100 सेण्टीग्रेड तक उबाल कर और 0° सेन्टीग्रेड तक ठण्डा करके भरा जाता है इसे दूध का पाश्चुरीकरण कहते हैं। इस विधि से दूध जीवाणु रहित हो जाता है, और उसे सीधा बिना उबाले लिया जा सकता है।

बाजारू दूध विश्वास योग्य नहीं होता और वह लाभ के स्थान पर हानि ही करता है। इसलिए किसी पूर्ण विश्वस्त ग्वाले या अच्छे डेरी फार्म का ही दूध लेना चाहिए। वैसे सबसे अच्छा तो यह है कि अपने घर में ही एक गाय रखें। इससे उत्तम दूध तो मिलेगा ही, गोबर के रूप में जलाने के लिए ईंधन या खेती-बारी अथवा बागवानी के लिए उत्तम खाद भी प्राप्त होगा।

गाय न रख सके तो स्वस्थ बकरी ही रक्खें। इस से कम दैनिक व्यय में ही एक सेर शुद्ध दूध मिलेगा। बकरी का दूध अधिक हल्का, सुपाच्य और गुणदायक होता है। गाय का उससे कम और भैस का दूध तो इन दोनों की अपेक्षा पचने में गरिष्ट और बुद्धिनाशक होता है; क्योंकि भैस स्वयं बुद्धिहीन पशु है। नीचे तालिका दी जा रही है।

विविध प्राणियों के दुग्धों की संगठन तालिका

प्राणी जल % वसा % शर्करा % प्रोटीन % राख % आयुर्वेदीय गुण
[पशु का नाम अस्पष्ट: कुत्ती] 86.5 3.1 5.6 4.0 0.8
कुतिया 75.4 9.6 3.1 11.2 0.7
गधी 90.0 1.3 6.5 1.7 0.5
भैंस 87.35 3.75 8.75 3.4 0.75
बकरी 86.0 4.6 4.2 4.8 0.8
भेड़ 79.4 8.3 4.3 6.7 1.00
[पशु का नाम अस्पष्ट: मुर्गिया] 80.9 7.9 4.5 5.9 0.8
स्त्री 89.6 4.8 3.4 1.3 0.9
हथिनी 67.8 19.6 8.8 3.9 0.7

दूध को पूर्णाहार की संज्ञा दी जाती है। इसमें जैसा कि तालिका से प्रकट है आहार के सभी घटक अच्छी मात्रा में पाये जाते हैं। दूध की प्रोटीनें बहुत उच्च प्रकार की होती है। इसमें कसीनोजन, लैक्टैल्ब्यूमिन तथा लैक्टोग्लोब्यूलिन नामक प्रोटीनें होती हैं। कार्बोजों में लैक्टोज मिलता है जो आंतों में ग्लूकोज तथा गैलेक्टोज में विभक्त हो जाता है। लैक्टोज लैक्टिक एसिड में बदल कर आन्त्र की सड़नक्रिया करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देता है।

दूध में घी बहुत सूक्ष्म बिन्दुकों के रूप में होने से बड़ी जल्दी पच जाता है। दूध में कई खनिज लवण जैसे - कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम और सोडियम अच्छी मात्रा में होते हैं। वास्तव में दूध ही कैल्शियम प्राप्ति का सामान्य भारतीयों के लिए एक प्रमुख साधन है। दूध में विटामीन ए, बी, रीबोफ्लेवीन तथा सी मिलते हैं। डी की मात्रा कम होती है। दूध के उबालने से विटामिन सी की मात्रा बहुत कम हो जाती है पर पाश्चुरीकरण से उसको कोई हानि नहीं होती। दूध को तेज रोशनी में खुला रखने से उसकी रीबोफ्लेवीन नामक विटामिन नष्ट हो जाती है।

अन्य उच्चवर्गीय प्रोटीनों की अपेक्षा दूध की एक बड़ी विशेषता है। इसकी राख का क्षारीय होना जब कि मांस और मछली की राख अम्लीय होती है। इससे दूध पीने से शरीर का क्षारीय स्राव बढ़ता है। दूध के द्वारा आन्त्रस्थ जीवाणुओं (इंटेस्टाइनल फ्लोरा) का संरक्षण होता है जो मानव स्वास्थ्य एवं विटामिन उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

दूध के अतिरिक्त उससे बनने वाले अन्य पदार्थ भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकर होते हैं। कमजोर हाजमे वालों या पेट के रोगियों के लिए दूध से बना दही, छाछ, मट्ठा और छेना आदि दूध से अधिक हितकारक होते हैं, क्योंकि इनमें चिकनाई का अंश कम रहता है, इसलिये हजम करने में शरीर को अधिक श्रम नहीं करना पड़ता। जिन्हें दूध कठिनाई से पचता हो, पेट में वायु करता हो या दस्त लगता हो, उन्हें दूध के स्थान पर दही लेना चाहिए। गर्म जलवायु वाले स्थानों और विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में सर्वत्र दही का उपयोग ही उचित होता है।

शरीर में दही की क्रिया अच्छा प्रभाव डालती है, क्योंकि दही के रस से आँतों में रहने वाले हानिकर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों में भी दही को दीर्घ जीवन देने वाला माना गया है।

दही को मथकर उसमें से घी निकाल लेने के बाद जो मट्ठा (छाछ) बचता है, उसको कुछ लोग फेंक दिया करते हैं या पशुओं को पिला देते हैं। ऐसा करना बड़ा अज्ञान है। घी निकाला हुआ मट्ठा और मक्खन निकाला हुआ दूध यदि एक सेर लिया जाय तो वह भी एक पाव असली दूध के बराबर पुष्टई करता है। मन्दाग्नि अर्थात् कमजोर हाजमे वालों के लिए यह बहुत ही काम का होता है, क्योंकि पचने में काफी सुगम होता है। उसमें घी के अतिरिक्त शेष सभी तत्व रहते हैं। मट्ठा या तक्र की तुलना भावमिश्र ने अमृत से की है। तक्र देकर ठीक किये रोग फिर उत्पन्न नहीं होते। लिखा है :

यथा सुराणाममृतं हिताय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः।

दूध से बनने वाले पदार्थों में मक्खन बहुत हल्का होता है। उसका समूचा भाग आँतों में प्रचूषित हो जाता है। विशेषकर बच्चों के लिए मक्खन ही अधिक हितकारक होता है। दूध से ही पनीर या छेना बनाया जाता है। इनमें छेना तो कुछ हलका होता है, परन्तु पनीर में २० प्रतिशत प्रोभूजिन, २५ प्रतिशत स्नेह और ६ प्रतिशत लवण होता है। स्नेह की अधिकता से यह पचने में कठिन होता है, फिर भी जिन्हें पचता हो उनके लिए पनीर बहुत पौष्टिक खाद्य है। पौष्टिकता के विचार से पनीर मांस से दो गुना अधिक पुष्टिकारक होता है।

गाँधीजी के विचार से दूध शाकाहार न होकर प्राणिज भोजन है।

अण्डा

दूध की भाँति अण्डा भी पूर्ण आहार है। यह सस्ता भी पड़ता है। मुर्गी या जल-मुर्गी रखने में अधिक खर्च नहीं होता। देखा जाय तो मुर्गी और बकरी पाल कर ही हमारे देश के निर्धन वर्गीय मुसलमान और हरिजन भाई अपने शरीर को पुष्ट रखते हैं। सवर्ण हिन्दू धार्मिक भावनावश अण्डे को असात्त्विक और घृणित मान कर नहीं खाते। शाकाहार की नई परिभाषा में आजकल अण्डा भी शाकाहार में सम्मिलित किया जा रहा है।

अण्डे के विषय में महात्मा गांधीजी ने लिखा है : "अण्डे सामान्यतः मांसाहार में गिने जाते हैं, मगर दरअसल वे मांस नहीं है। आजकल तो अण्डे ऐसे तरीके से पैदा किए जाते हैं कि मुर्गी, मुर्गे को देखे बिना ही अण्डे देती है। इन अण्डों में चूजा (जीव) कभी बनता ही नहीं। इसलिए जिन्हें दूध पीने में कोई संकोच नहीं, उन्हें इस प्रकार के अण्डे खाने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए।"

शीघ्र पुष्टई देने वाले पदार्थो में अण्डा उत्तम है। आयुर्वेद में भी अण्डे को सुपाच्य, मधुर, दाह न करने वाला और तुरन्त बल देने वाला कहा गया है।

क्षीणरेतःसु कासेषु हृद्रोगेषु क्षतेषु च।
अण्डानि हितानि।

अर्थात शारीरिक धातुक्षय के अनेक रोगों में अण्डा बहुत उपयोगी है; क्योंकि यह अत्यन्त धातु-पुष्टकर खाद्य है। क्षीण गर्भाशय वाली स्त्रियों के लिए अण्डा बहुत ही लाभकर है।

एक अण्डा एक पाव दूध के बराबर गुणकारी होता है। अण्डे में खनिज दूध से भी अधिक होता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत सुपाच्य होता है। अण्डे का ९५ प्रतिशत भाग अन्त्र में ही प्रचूषित हो जाता है। केवल पाँच प्रतिशत का मल बनता है। इतनी सात्मीकरणता अन्य किसी भी खाद्य में नहीं हैं। खून की कमी, मन्दाग्नि, यक्ष्मा और पाण्डु से पीड़ित रोगियों के लिए अण्डा बहुत अच्छा पथ्य है। नीरस होने के कारण कच्चा अण्डा पाचक रसों को उत्तेजित नहीं कर पाता, इसलिए ही उसका पाचन आमाशय में न होकर आन्त्र में हुआ करता है। उबाला हुआ अण्डा प्रोभूजिन जम जाने से कुछ दुष्पाच्य हो जाता है।

अण्डे में किसी प्रकार की मिलावट की सम्भावना तो नहीं है, फिर भी खाने के लिए केवल ताजा अण्डा ही लेना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में तो वासी अण्डा प्रायः सड़ जाता है। अण्डे के विषय में आधुनिक आहार शास्त्रियों ने बहुत अध्ययन किया है। इसके अनुसार मुर्गी के अण्डे के विविध भागों का औसत संगठन निम्न प्रकार का होता है :

जल % प्रोटीन % वसा % राख %
पूर्ण अंडा 74% 13% 11% 1.0%
अंडे की सफेदी 88% 10.5% स्वल्प 0.8%
अंडे की जर्दी 49% 17% 31.5% 1.4%

अण्डे की जर्दी कुल अण्डे की एक तिहाई और सफेदी दो तिहाई होती है।

अण्डे की वसा में प्रायः लेसिथिन की मात्रा अधिक होती है।

स्नेह पदार्थ (घी और तेल)

दूध और अण्डा के बाद भोजन के पौष्टिक पदार्थों में घी बहुत महत्वपूर्ण है। बल-वीर्य और आयु की वृद्धि तथा मस्तिष्क के स्नायु मण्डल को शक्ति पहुँचाने में घी के बराबर शक्तिशाली दूसरा पदार्थ नहीं। विशेषकर अण्डा और मांस आदि से परहेज रखने वाले भारतीयों के भोजन में पोषक तत्व के रूप में घी का रहना नितान्त आवश्यक है।

दैनिक भोजन में एक छटांक घी लेते रहने से शरीर को पूर्ण चिकनाई और पौष्टिक तत्व मिल जाते हैं। घी में सौ प्रतिशत स्नेह होता है। प्रोभूजिनयुक्त दाल आदि खाद्य पदार्थ यदि घी सहित थोड़े परिमाण में भी खाये जावें तो उनसे शरीर की क्षतिपूर्ति होती है। बिना घी के प्रोभूजिनयुक्त पदार्थ अधिक मात्रा में लेने पर भी उतना लाभ नहीं करते।

उष्णता जनन करनेवाले स्नेह तथा उदांगारतत्व शरीर में आवश्यक गर्मी और पाचकाग्नि को ठीक रखते हैं। घी में उत्तम पौष्टिकता के अतिरिक्त सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह शरीर में उष्णताजनन का कार्य बहुत सफलतापूर्वक करता है। एक तोला मांस या चीनी खाने से जितनी उष्णता उत्पन्न होती है, उससे ढाई गुनी एक तोला घी खाने से होती है। इससे ही भोजन में घी के महत्व का अन्दाज लगाया जा सकता है।

स्नेह द्वारा उष्णताजनन का कार्य, यों तो तेल खाने से भी हो सकता है; परन्तु घी, मक्खन आदि प्राणिज स्नेह, तेल की अपेक्षा पचनीय और जीवतिक्ति (विटामिन) युक्त होते हैं। उष्णताजनन के अतिरिक्त वे ऊर्जोत्पादन, धातु-वृंहण, शरीर की क्षतिपूर्ति, स्थैर्य और शक्ति का कोष संचित करने में भी सहायक होते हैं।

तथापि, आजकल बाजार में दूध-दही से भी अधिक, असली घी का मिलना कठिन हो गया है। पूरी निश्चिन्तता के साथ शुद्ध घी उसको ही कहा जा सकता है, जो घर में ही, या अपने सामने ही निकाला गया हो। गाँवों से आने वाले देशी घी को भी सहसा पूर्ण शुद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ग्रामीणों ने घी में मिलावट करने के ऐसे बढ़िया तरीके अब सीख लिए हैं, कि आश्चर्य होता है।

दूध में वनस्पति तेल मिला कर दही जमाते हैं और उससे निकाला हुआ मिलावटी घी, शुद्ध देशी के नाम से मँहगा बेचते हैं। ऐसे मिलावटी घी पर पैसा खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। विश्वस्त और पूर्ण शुद्ध घी न मिले तो उसके स्थान पर शुद्ध और ताजा तेल खाना ही अधिक हितकर है।

शुद्ध घी गो या भैस के मक्खन से बनाया जाता है। गो का घी रंग में पीला और भैंस का सफेद होता है। शुद्ध घी की परीक्षा करने का ढंग यह है। कि थोड़े घी में थोड़ा-सा नमक का तेजाब डालना चाहिए। यदि उसमें वेजिटेबल घी मिला होगा, तो उसका रंग कुछ लाल हो जायगा।

आजकल बाजार में मिलने वाले जिस पदार्थ को लोग वनस्पति घी कहते हैं, वह वास्तव में तेल का जमाया हुआ रूप है, जो कि तेल से भी निकृष्ट होता है। तेल को जमाकर उसको घी का रंग-रूप देने में जो क्रिया करनी पड़ती है, उससे तेल के बहुत-से गुण नष्ट हो जाते हैं और अनेक विपरीत अवगुण आ जाते हैं। जमा हुआ होने से यह पहचानना भी कठिन है कि यह किस चीज का तेल है और कितना पुराना है।

वस्तुतः उसमें शुद्ध और ताजे तेल के भी गुण नहीं होते। इस तथाकथित बनावटी वनस्पती घी की इतनी खराबियाँ सिद्ध हो चुकी है कि यदि शुद्ध और ताजा तेल भी न मिले तो रूखा-सूखा ही भोजन अच्छा परन्तु यह नकली और बनावटी घी नहीं बरतना चाहिए।

खाने के लिए तेल भी सर्वथा शुद्ध और ताजा लेना चाहिए। तिल का तेल सर्वोपरि होता है। उसके बाद सरसों और मूँगफली का तेल भी खाने के काम में लाया जाता है। गुजरात में शींगदाणा के नाम से मूंगफली का तेल खूब इस्तेमाल किया जाता है।

मांस-मछली

भोजन के रूप में संसार में मांस-मछली का उपयोग किया जाता है। यह पर्याप्त पुष्टिकारक पदार्थ है। संसार की बहुत बड़ी जन संख्या मांस-मछली खाकर ही शक्ति प्राप्त करती है। तथापि हमारे देश में धार्मिक भावना के कारण इसका प्रचार कम है।

आयुर्वेद में मांसाहार को शरीरवृद्धि के लिए उपयोगी माना गया है।

शरीरबृंहणो नान्यत्वाद्यं मांसाद्विशिष्यते। चरक --
न हि मांससमं किंचिदन्यद् देहबृहत्वकृत्। -- वागभट्ट मांस में शरीर को बढ़ाने की अनुपम शक्ति है, क्योंकि मांस अत्यन्त पौष्टिक और सुपाच्य खाद्य है। खाये हुए मांस का केवल १५ प्रतिशत् व्यर्थ जाता है और लगभग ८५ प्रतिशत भाग आंतों में प्रचूषित होकर सीधा रस रक्त में मिल जाता है। कच्चा मांस दो घण्टे में, आधा उबाला ढाई घण्टे में और पूरा उबाला तीन घण्टे में पचता है। इसी प्रकार आधा भुना मांस तीन घण्टे में और पूरा भुना चार घण्टे में पचता है।

मांस की यह पचनीयता और पौष्टिकता उसके पकाने की विधि पर निर्भर करती है। इसलिए मांस को उतना ही पकाना चाहिए जितने से उसमें व्याप्त संक्रामक रोगों के कीटाणु नष्ट हो जावें और उसका जलीय अंश कम हो जावे। जिस मांस में स्नेह (चर्बी) अधिक होता है, वह पचने में उतना ही अधिक कठिन होता है।

खाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न पशुओं का मांस प्रयोग में लाया जाता है। भेड़, बकरी, जंगली सुअर और मुर्गी का मांस अधिक सुस्वादु और पौष्टिक होता है। वैसे शिकार किये हुए मृग, चीतल, बारहसिंघा, आदि जंगली जानवरों और भैंस, घोड़ा आदि पालतू पशुओं का मांस भी कुछ लोग खाते हैं।

मांसाहार में मछली काफी पौष्टिक खाद्य है, इसका लगभग १५ प्रतिशत भाग आंतों में प्रचूषित हो जाता है। दुर्बल मनुष्यों के लिए विशेष शक्तिवर्धक होती है। हमारे देश में समुद्र या नदी तट वाले स्थानों में मछली का उपयोग बहुतायत से होता है। बंगाल, उड़ीसा आदि में मत्स्याहार प्रधान है।

यद्यपि मांस-मछली पौष्टिक खाद्य है, परन्तु असावधानी से पकाने और असात्म्य ढंग से खाने पर इनसे अनेक रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। मांस बहुत जल्दी सड़ने वाला पदार्थ है। इसलिए बासी या अधिक देर का रखा मांस नहीं लेना चाहिए। विकृत होने पर मांस का रंग काला हो जाता है।

यहाँ पौष्टिक खाद्यों में मांस-मछली का उल्लेख हमें मुख्यतः इस कारण करना पड़ा कि हमारे देश में कुछ लोग तो इसका व्यवहार करते ही हैं। जो व्यवहार करते हैं उन्हें मांस-विषयक ज्ञान स्वास्थ्य - साहित्य में मिलना ही चाहिए जिससे अज्ञानतावश हानि न उठावें। दूसरी बात सर्वोत्कृष्ट पौष्टिकतत्त्व - घी दूध - का देश में निरन्तर अभाव-सा होता जा रहा है। राज्य घी-दूध का उत्पादन बढ़ाने को समुचित प्रोत्साहन नहीं दे रहा। दुधारू पशुओं के पालन-हेतु लोगों की रुचि कम होती जा रही है। इन कारणों से सर्वथा शुद्ध दूध-घी शहरों में तो मिलता ही नहीं। इस कारण लोग यदि मांसाहार की ओर आकृष्ट होते हैं तो अस्वाभाविक नहीं।

सत्य तो यह है कि हमारे देश की स्थिति और जलवायु को देखते हुए मांसाहार आवश्यक नहीं है। मांस में जो पौष्टिकता है वह अन्य कई शाकाहारी पदार्थो में भी है। उष्णताजनन, पुष्टि एवं शक्ति का संचय मांस की अपेक्षा शुद्ध घी से अधिक होता है। मांस के प्रायः सभी तत्त्व दालों में होते हैं। मांस में २९ प्रतिशत प्रोटीन होते हैं। जब कि दालों में ३० प्रतिशत तक प्रोटीन रहते हैं। इसलिए जिन्हें रुचता न हो उन्हें देखा-देखी या केवल पौष्टिकता के लोभवश मांसाहारी नहीं बनना चाहिए, क्योंकि उत्तम और संतुलित शाकाहारी भोजन भी पूर्ण पौष्टिक होता है।

दालें

दालें आहार - पूर्ति भी करती हैं और पौष्टिक भी होती हैं, इसलिए भोजन में दाल का विशेष महत्त्व है। अच्छी प्रकार से बनायी गयी दाल, रोटी या चावल के साथ लेने से उनको सुस्वादु बनाती है। चना, अरहर, मूंग, मसूर, मटर, उड़द, सोयाबीन आदि दालों में मांस से अधिक प्रोभूजिन या प्रोटीन होते हैं।

दालों के कणों पर एक विशेष झिल्ली होती है, जिसको शरीर के पाचक रस आसानी से नहीं गला पाते, इसलिए वे दुष्पाच्य होती हैं; परन्तु दालों को पर्याप्त पानी में डालकर दो घण्टे तक पकाया जाय फिर मथनी से दही की भाँति मथकर छोक दिया जाय, तो कणों की झिल्ली हट जाती है और दाल पाचक बन जाती है, खाने के लिए दाल को खूब पतला बनाना चाहिए। खूब पकी दाल को दो-तीन तोला घी या तेल डालकर रोटी या भात के साथ खाने पर वह सन्तुलित भोजन हो जाता है और उससे उतनी ही पौष्टिकता मिलती है, जितनी कि मांस, मछली, अण्डा आदि असात्त्विक भोजन से प्राप्त होती है।

अन्न

भोजन में अन्न मुख्य आहार है। आयुर्वेद में अन्न को ही प्राणियों का प्राण कहा गया है और लोकभाषा में अन्न को ही भोजन कहा जाता है।

शाकाहारी भोजन अन्नप्रधान होता है। अन्नों में विशेषकर गेहूँ, चावल, चना, ज्वार, बाजरा, मकई और जौ आदि धान्यों का प्रयोग होता है। इन धान्यों में शरीर - पोषक प्रोभूजिन, ऊष्मा आदि पदार्थ विभिन्न मात्रा में विद्यमान रहते हैं।

हमारे देश में जो दैनिक आहार ग्रहण किया जाता है उसमें गेहूँ, दाल और चावल की प्रधानता रहती है। गरीबों के भोजन में ज्वार, बाजरा मक्का और दाल की अधिकता रहती है। इनमें गेहूँ या ज्वार-वाजरा की रोटी तथा दाल, अथवा चावल और दाल खायी जाती है। जो लोग चावल अधिक खाते हैं, वे स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्बल होते हैं। चावल के साथ थोड़ी चिकनाई मिलाकर पर्याप्त मात्रा में दाल भी खायी जावे, तो वह किसी प्रकार संतुलित भोजन हो सकता है। स्नेह और दूध साथ में लेने से ही अन्नाहार पौष्टिक भोजन माना जाता है।

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे देश में ही विभिन्न प्रदेशों के भोजन और स्वास्थ्य-स्थिति में देखा जा सकता है। हमारे देश में सबसे अच्छा भोजन पंजाब वाले करते हैं। खमीर उठाकर बनाई हुई गेहूँ की रोटी, उड़द की दाल और पर्याप्त घी-दूध उनका प्रधान भोजन होता है। वे मांस - भोजी भी होते हैं। वस्तुतः अपने पूर्ण आहार में काफी घी-दूध और दही लेने के कारण ही पंजाबी भाई काफी स्वस्थ लम्बे और तगड़े होते हैं।

राजस्थान की जलवायु पंजाब से कम स्वास्थ्यकर नहीं है, परन्तु भोजन-स्तर उत्तम न होने के कारण राजपूताना निवासी उतने लम्बे-तगड़े और सबल नहीं होते, जितने पंजाबी। जलवायु तथा भोजन की दृष्टि से उत्तरप्रदेश को दूसरे नम्बर पर गिना जा सकता है। वहाँ का भोजन रुचिकर तो बहुत होता है, परन्तु दुग्ध या दुग्धकृति की कमी के कारण, उसे पूर्ण पुष्टिकर नहीं कह सकते। इसलिए उत्तरप्रदेश-वासी भी पंजाववासियों से शरीर में दूसरे नंबर के होते हैं।

बिहार का जलवायु बहुत अच्छा है, परन्तु आहार की दृष्टि से हीन होने के कारण वहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं होता। जिनको पूर्ण खुराक मिलती है, वे बिहारी भी पंजाब के मुकाबले के तन्दुरुस्त होते हैं। बंगाली मद्रासी, असमी आदि केवल चावल खाने वालों के भोजन में तो घी-दूध बहुत आवश्यक है। गुजरात और महाराष्ट्र में चाय के बहुतायत प्रचार ने दूध-घी खाने की सुरुचि को नष्ट कर रखा है, फलतः इन प्रदेशवासियों का स्वास्थ्य सामान्यतः गिरा हुआ है।

पौष्टिकता के विचार से चावल से अच्छा ज्वार-बाजरा और इनसे भी उत्तम गेहूँ होता है। संसार में गेहूँ की खपत सबसे अधिक है। ८-१० घण्टा बैठ कर दिमागी काम करने वालों के लिए धान्यों में गेहूँ सर्वोपरि है। थोड़ा चना साथ मिलाकर खाने से गेहूँ स्वादिष्ट, पाचक और अधिक पौष्टिक हो जाता है। गेहूँ के बराबर स्वास्थ्यकारक तत्त्व चावल में नहीं होते। रस-धातुओं को पुष्ट एवं विवर्द्धित करने की शक्ति चावल में बहुत कम होती है। प्रधानत: वह उष्णताजनन का ही काम करता है। इसलिए गेहूँ के साथ स्वाद बदलने के लिए, थोड़ी मात्रा में ही चावल खाना चाहिए।

काजू और पोषण

काजू (Cashew) एक शक्तिप्रद मेवा (nut) है। इसकी तुलना में अन्य मेवाओं का ठहरना कठिन है। काजू गिरी का विश्लेषण करने पर इसमें निम्न-लिखित पदार्थ मिलते हैं :- - स्निग्ध पदार्थ (फैट्स) ४८ प्रतिशत - शिम्बीतत्व (प्रोटीनें) २१ प्रतिशत - शर्करावर्गीयतत्व (कार्बोहाइड्रेट्स) २२.३ प्रतिशत - कैल्शियम 0·५ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - पानी 5.9 प्रतिशत - खनिज पदार्थ २ प्रतिशत - लौह ·५ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - फास्फोरस ४ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - कैलोरी मान ५९६ प्रति १०० ग्राम काजू के फल में बहुत अधिक पोषणतत्व मिलते हैं। इसमें प्रोटीन, फैट्स, कार्बोहाईड्रेट्स, कैल्शियम, फास्फोरस और लोहा रहता है। इसके १०० ग्राम रस में २६१.५ मि० ग्रा० विटामिन सी तथा कुछ कैरोटीन मिलती है।

काजू से भी सस्ता और गुणकारी मेवा अखरोट है। अखरोट को तोड़कर ताजा गिरी खायी जाती है यह बादाम से भी अधिक पौष्टिक है तथा काजू से अधिक गुणकारी और सस्ती है। मूंगफली भी बहुत गुणकारी है।