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पुस्तकालय

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार

वर्ग संख्या D/215- आगत संख्या ०५६७४

पुस्तक विवरण की तिथि नीचे अंकित है। इस तिथि सहित ३० वें दिन यह पुस्तक पुस्तकालय में वापस आ जानी चाहिए। अन्यथा ५० पैसे प्रति दिन के हिसाब से विलम्ब दण्ड लगेगा।

वैद्य धर्मदत्त स्मृति संग्रह

इस ग्रन्थ की दो लाख से अधिक प्रतियाँ निकल चुकी हैं।

आरोग्यप्रकाश

वैद्यराज पं० रामनारायण शर्मा

श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लिमिटेड

आरोग्य-प्रकाश

निरोग रहने के नियम, रोगों के निदान तथा चिकित्सा की सर्वोत्तम व्यावहारिक पुस्तक

(संशोधित, परिवर्द्धित और परिष्कृत उन्नीसवाँ संस्करण)

लेखक

पं० रामनारायण शर्मा, वैद्य आयुर्वेदोपाध्याय

प्रकाशक

श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लिमिटेड कलकत्ता : पटना : झाँसी : नागपुर : नैनी (इलाहाबाद)

१९ वाँ संस्करण, जनवरी १९७७ १५,००० प्रतियाँ

पिछले १८ संस्करणों में इसकी २ लाख १० हजार प्रतियाँ निकल चुकी हैं

मूल्य ६-००

प्रकाशक :

श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लिमिटेड ग्रेटनाग रोड, नागपुर-१० (रजि० कार्यालय : १, गुप्तालेन, कलकत्ता-६)

मुद्रक :

शिवशक्ति प्रेस प्रा. लि. ग्रेटनाग रोड, नागपुर-१०

प्रस्तावना

श्री रामनारायण शर्मा वैद्य द्वारा लिखित “आरोग्य-प्रकाश” का स्वास्थ्य प्रकरण मेरे विचार से बहुत उपयोगी पुस्तक है। उन्होंने स्वास्थ्य-रक्षा पर और युक्ताहार-विहार के द्वारा रोगों से मुक्त रहने के मूल सिद्धान्तों का सुबोध विवेचन किया है। बड़ी मेहनत से उन्होंने आयुर्वेद के शास्त्रों से स्वास्थ्य का महत्त्व बताने वाले आरोग्य-प्राप्ति के साधन-सूचक श्लोक अपनी पुस्तक में दिये हैं और आधुनिक आहार-विज्ञान का अभ्यास करके अनेक खाद्य-पदार्थों की व्याख्या भी की है। साथ ही यह भी बताया है कि किस-किस खाने की वस्तु में से क्या-क्या पौष्टिक पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं। शरीर-निर्माण और शरीर की मशीन को तन्दुरुस्त रखने के लिये प्रोटीन की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया है और बताया है कि प्रोटीन दाल-सब्जी इत्यादि में से तो प्राप्त होते ही हैं, मगर अमुक मात्रा में इनके अलावा दूध, घी अथवा मांस-मछली और अण्डे इत्यादि से लेनी आवश्यक होती है। एक अण्डा एक पाव दूध के बराबर गुणकारी होता है—ऐसा उन्होंने बताया है। सब्जी, फल आदि की आवश्यकता-अंकुरित चने, मूंग इत्यादि में से पौष्टिक तत्त्व प्राप्ति का महत्त्व, खाना सही प्रकार से तैयार करना ताकि पौष्टिक पदार्थ खो न जायें--इन सभी प्रश्नों के बारे में उन्होंने आवश्यक सलाह-मश्वरा दिया है । नशीली वस्तुओं से क्या नुकसान होता है यह भी उन्होंने समझाया है । आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य और संयम का स्वास्थ्य-रक्षा के साथ कितना निकट का संबंध है, इसका उन्होंने विशेष वर्णन किया है। साथ ही व्यायाम के कुछ तरीके भी बताये हैं । स्वास्थ्य के लिए शरीर, घर की और गली-मुहल्ले की सफाई कितनी आवश्यक है--इस पर भी अपनी पुस्तक में उन्होंने पर्याप्त ध्यान दिया है । स्वास्थ्य के लिये सदाचार पर विशेष बल देते हुए उन्होंने दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का भी विवेचन किया है। स्त्री-स्वास्थ्य के साधनों पर भी पुस्तक में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

दो-चार बातें उनकी मेरी समझ में नहीं आईं। उन्होंने कहा है कि विषय-भोगी पुरुष शूर-वीर नहीं हो सकता, वह व्यापारी हो सकता है, धनी हो सकता है, किसी हद तक ईमानदार हो सकता है, त्यागी हो सकता है। मैं समझती हूँ कि विषय-भोगी पुरुष त्यागी नहीं हो सकता और ईमानदारी का पालन करना भी उसके लिये अत्यन्त कठिन होता है। इसी प्रकार उन्होंने लिखा है कि तेज-भूख और विषयेच्छा के वेग को रोकना स्वास्थ्य के लिये अच्छा नहीं है। मैं समझती हूँ उनका विचार उन्होंने दूसरी जगह पर जहाँ संयम पर जोर दिया है, उसके साथ मेल नहीं खाता । ब्रह्मचर्य पालन के लिये उन्होंने लड़के-लड़कियों को साथ-साथ न पढ़ाने की सलाह दी है। मैं समझती हूँ कि जो लड़के-लड़कियाँ बचपन से साथ-साथ पढ़ते हों और शिक्षक उनका सही मार्ग-दर्शन करते हों, वे एक-दूसरे के प्रति सही व्यवहार सही तरीके से पालन कर सकते हैं। उनके गलत रास्ते पर चलने की संभावना कम होती है। सफाई के अध्याय में श्री रामनारायण जी ने लिखा है कि पाखाना करने के लिये सदा ही खुले मैदान में जाना अच्छा होता है । यह बात पुराने जमाने में, जब जनसंख्या कम और जमीन बहुत थी, शायद चल भी सकती मगर आज तो उसमें उल्टे नुकसान होता है। पंजाब और कई दूसरे प्रान्तों में खेतों में पाखाना जाने के कारण लगभग ४० प्रतिशत लोग हुक-वर्म के रोग से पीड़ित होते हैं। अच्छा तो यह है कि खुले मैदान में पाखाना न जाय, लेकिन यदि ऐसा करना ही पड़े तो पाखाना जानेवाला व्यक्ति अपने साथ एक खूर्पी रखे और खोद कर सूखी मिट्टी से मैले को ढक दे। श्री रामनारायणजी ने भी अपनी इस पुस्तक में अन्यत्र लिखा है कि खुले खेतों में चाहे जहाँ मल त्याग करने की आदत अच्छी नहीं । ग्रामों में बापू द्वारा बताई सफाई शौच व्यवस्था को वैद्य जी ने उपयोगी माना है। इसी प्रकार उन्होंने लिखा है कि बीच-बीच में एनिमा ले कर आंतों को साफ करते रहना चाहिए। मैं इसे बहुत उपयोगी नहीं समझती। बिना जरूरत के नियमित रूप से एनिमा लेते रहने से आंतें कमजोर पड़ सकती हैं। बीमारी में लेना अलग बात है, मगर एनिमा अस्वाभाविक है। स्वयं वैद्य जी ने भी एनिमा लेने का परामर्श खुश्की और कोष्ठबद्धता से पीड़ित लोगों के लिये दिया है । स्वस्थ मनुष्य को इसकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए । इसी प्रकार हाईड्रोजन-पर-आक्साइड ऐसे ही कानों में नहीं डालते रहना चाहिए । खास आवश्यकता होने पर और सलाह दें तभी इसका इस्तेमाल करना चाहिए । नहाने में साबुन का उपयोग नहीं करना ही अच्छा है क्योंकि उससे त्वचा की स्वाभाविक स्निग्धता नष्ट हो जाती है, ऐसा इस पुस्तक में कहा गया है, मगर उसके स्थान पर क्या उपयोग हो सकता है, यह नहीं बताया । हर रोज नहीं तो दूसरे-चौथे दिन साबुन या किसी दूसरी ऐसी चीज से नहाना आवश्यक होता ही है जिससे शरीर साफ रह सके और चमड़ी के रोगों से व्यक्ति मुक्त रहे । घर की सफाई का जिक्र करते हुए वैद्य जी ने घर का कूड़ा-कर्कट गली-मुहल्ले में न डालने की सलाह दी है । यह अच्छी बात है । इसके लिये घर में कूड़े का एक बक्सा रहे तो अच्छा है । वैद्य जी ने भी लिखा है कि घर का कूड़ा-कर्कट और जूठन आदि डालने के लिये घर में एक नियमित स्थान बनाना चाहिए जो ढका रखा जा सके । कूड़े के बक्से को उठा कर मुनासिब जगह फेंकना आसान रहता है । उन्होंने लिखा है कि वर्षा ऋतु में हरी सब्जियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । मैं समझती हूँ कि यदि उसे अच्छी तरह साफ कर लिया जाय और लाल दवा के पानी से धो लिया जाय, तो उसके प्रयोग में कोई नुकसान नहीं है । इसी प्रकार वे कहते हैं कि बरसात में नदी या तालाब का पानी नहीं पीना चाहिए । मैं समझती हूँ कि नदी तालाब का पानी कभी भी नहीं पीना चाहिए और यदि पीना आवश्यक हो, तो उबाल कर पियें । क्षय रोग के थूक को राख या चूने से ढक देना चाहिए--ऐसा वैद्य जी ने लिखा है । क्षय रोग के कीटाणु कालरा के कीटाणुओं की तरह, आसानी से नहीं मरते । उनको समाप्त करने का सब से अच्छा तरीका यह है कि मरीज के थूक को तीन मिनट तक पानी में उबाल दिया जाय । मरीज एक छोटे-से सिगरेट के टीन या दूसरे बर्तन का थूकदान रखे उसमें पानी रहना चाहिए । सुबह-शाम जलते कोयलों पर रखकर उसे तीन मिनट तक उबाल लेना

चाहिए । इसमें कोई भी विशेष खर्च या मेहनत नहीं होती और हम कीटाणुओं से पूर्णतया सुरक्षित हो जाते हैं ।

मैं समझती हूँ कि वैद्य श्री रामनारायण जी की यह पुस्तक हर एक को पढ़नी चाहिए । स्त्री और पुरुष सभी को इसमें से ज्ञान मिल सकता है । मेरी दृष्टि में यह पुस्तक विद्यार्थियों के लिये बहुत उपयोगी है । विद्यार्थी-जीवन से ही मनुष्य में स्वास्थ्य-रक्षा के संस्कार पड़ जावें, तो हमारी आगामी पीढ़ियों में आरोग्य-स्थापन में बड़ी सहायता हो सकती है । आशा है वैद्य जी की पुस्तक इस दिशा में उपयोगी सिद्ध होगी ।

नई दिल्ली
२६ जनवरी, १९६३
डॉ० सुशीला नायर
(केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री)

निवेदन

लगभग ५५ वर्ष पूर्व जब मैं यकृत् रोग से पीड़ित हुआ तो मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि खान-पान में जरा-सी भी अनियमितता का परिणाम कितना भयंकर होता है । उस पीड़ा से ४-५ वर्ष तक मैंने बड़ा कष्ट उठाया । स्वास्थ्यकर जलवायुवाले स्थान में निवास और काम-काज छोड़ कर पूर्ण विश्राम करने से, तथा यदा-कदा किसी औषध से कुछ समय तक लाभ मालूम होता था, स्थायी लाभ किसी दवा से नहीं हुआ । अन्ततः स्वास्थ्य-नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने से ही मैं निरोग हुआ । उसके बाद, अपनी जैसी अवस्था के निरन्तर रोगी रहनेवाले अनेक व्यक्तियों को भी, औषध के साथ आयुर्वेदोक्त स्वास्थ्य-नियमों का पालन कराके मैंने देखा कि आश्चर्यजनक लाभ होता है । इसी अनुभव से मिली प्रेरणा ने 'आरोग्य-प्रकाश' लिखने को, मुझे सर्वाधिक प्रोत्साहन दिया ।

निश्चय ही हमारे देश में आजकल स्वास्थ्य की स्थिति बड़ी चिन्तनीय है । पाश्चात्य सभ्यता के असीमित प्रसार और जीवन की हर दिशा में आधुनिकीकरण के अत्युत्साह ने जनता को स्वास्थ्य के प्रति निश्चेष्ट और पंगु-सा बना दिया है । स्वाभाविक रूप से स्वस्थ रहने के लिए जो कर्त्तव्य भाव और सुरुचि, हमारी परम्पराओं में विद्यमान थे, वे समाप्त-प्राय हो चले हैं और पाश्चात्य चिकित्सा के बहु-प्रचार से जन-जीवन दवाओं पर अधिक आश्रित हो गया है । इसके परिणामस्वरूप, आरोग्य का महत्त्व, लोगों की दृष्टि में उतना नहीं रहा, जितना कि रहना चाहिए ।

जनता का स्वास्थ्य-स्तर जब तक उत्कृष्ट न हो तब तक किसी भी राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि को पूर्ण नहीं कहा जा सकता । हमारा विशाल देश जिस समृद्ध राष्ट्र-निर्माण की दिशा में लगा हुआ है, उसके लिए जन-जन का कठोर परिश्रम अपेक्षित है, और उसकी सफलता के लिए हर भारतीय नागरिक का पूर्ण स्वस्थ होना वांछनीय है । ऐसा पूर्ण स्वास्थ्य, चिकित्सा-साधनों के अपरिमित विस्तार से सुलभ नहीं हो सकता । उसके लिए जन-जीवन को नियम-संयमपूर्ण बनाना नितान्त आवश्यक है । चिकित्सा-प्रसार से रोगों का अन्त और जन-जीवन सुखी नहीं हो सकता । उसका एकमात्र साधन आरोग्य-प्रचार है ।

जनता में आरोग्य के प्रति कर्त्तव्य-बुद्धि की न्यूनता कुछ इस कारण भी है कि इस विषय की पूरी-पूरी जानकारी सर्वसामान्य को नहीं मिलती । हमारे देश में सार्वजनिक जनता को स्वास्थ्य और आरोग्य के विषय में वास्तविक ज्ञान देने का प्रबन्ध सुसंगठित नहीं है । शिक्षा-काल में विद्यार्थियों को जो थोड़ा-बहुत स्वास्थ्य के विषय में पढ़ाया जाता है, वह उनके अन्तर्मन में आरोग्य की भावना उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होता । हिन्दी में स्वास्थ्य-विषयक साहित्य उत्कृष्ट और यथेष्ट नहीं । इस विषय पर जो पुस्तकें हैं, वे अधिकांश पाश्चात्य दृष्टिकोण पर आधारित 'हेल्थ एण्ड हाईजिन' विषयों के अनुवाद मात्र हैं । यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने की है कि हमारा देश उष्ण जलवायु-प्रधान है, इसलिए यहाँ शीत-प्रधान पश्चिमी देशों के स्वास्थ्य नियम यथावत् कारगर नहीं हो सकते । हमारे देश की भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति तथा यहां के जीवन-दर्शन के अनुकूल भारतीय सिद्धान्त ही यहाँ की जनता के लिए हितकर, ग्राह्य एवं व्यावहारिक हो सकते हैं ।

इस तथ्य पर ध्यान न देकर विदेशी शासनकाल में भारतीय स्वास्थ्य-परम्पराओं को नष्ट कर पाश्चात्य स्वास्थ्यसाधनों का प्रसार किया गया । यह भी प्रचारित किया गया कि प्राचीन भारतीय-साहित्य में स्वास्थ्य-विषयक ज्ञान विशेष है ही नहीं । इस धारणा से प्रभावित होकर भारतीय लेखकों का ध्यान भी उस ओर नहीं गया, और कदाचित् इसी कारण आधुनिक काल में हमारे यहाँ जो स्वास्थ्य-साहित्य लिखा गया, वह प्रायः पाश्चात्य से प्रभावित है । वस्तुतः वह सब का सब उपयोगी नहीं है । भारत में उसके अपने ही प्राचीन स्वास्थ्य-सिद्धान्त उपादेय हैं, और उनका पुनरुत्थान देश और जनता के लिए हितकर हो सकता है ।

प्रस्तुत पुस्तक की रचना इसी दृष्टिकोण से की गयी है । पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए, आयुर्वेद में जिन मूलभूत सिद्धान्तों पर बल दिया गया है, उनका ही विवेचन, मैंने आधुनिक प्रगति के प्रकाश में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है । जिससे वर्तमान जीवन-क्रम में वह सहज ग्राह्य हो सके ।

इस पुस्तक के लिखने का मेरा मुख्य लक्ष्य यह है कि भारतीय जनता में वास्तविक स्वास्थ्य और आरोग्य के प्रति सुरुचि का संचार हो । लोग स्वास्थ्य का महत्त्व समझें, उसका ज्ञान मनन करें और तदर्थ सुगम-नियमों को जीवन के अभ्यास में उतारें । देश में आरोग्य-स्थापन का प्रयास तभी सफल हो सकता है जब लोग स्वाभाविक रूप से स्वस्थ रहने के अभ्यासी हों और केवल अनिवार्य होने पर ही औषध का प्रयोग किया करें । औषध प्रयोग भी ऐसा हो, जो एक GO रोग को दबा कर प्रतिक्रिया स्वरूप में अन्य कई रोग उत्पन्न करने वाला न हो । यह आयुर्वेद का उद्देश्य है ।

"स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च "

पुस्तक का विषय-क्रम मैंने इसी आयुर्वेदोद्देश्य के अनुसार रक्खा है । पूर्वार्द्ध में स्वास्थ्य विवेचन के साथ पूर्ण स्वस्थ रहने के सभी आवश्यक और व्यावहारिक साधन और नियमों का विशद वर्णन दिया है । उत्तरार्द्ध में रोगों की उत्पत्ति के मूलभूत कारणों पर प्रकाश डाल कर चिकित्सा - प्रकरण में रोग-विवेचन के साथ मैंने उन आयुर्वेदीय शास्त्रोक्त एवं अन्य औषध प्रयोगों को भी निर्माण विधि सहित दे दिया है, जिन्हें अपने चिकित्सा - कार्य-काल में मैंने सर्वथा सफल एवं निरापद पाया ।

"आरोग्य - प्रकाश" को वर्तमान स्वरूप में संशोधित परिवद्धित और सम्पादित करने की इच्छा बहुत दिनों से थी । पहली बार लिखने के अनंतर अनुभव आये नवीन विषयों को बढ़ाना भी आवश्यक था । इस कार्य में अपेक्षित से अधिक समय लग गया । समय-समय पर जिन स्नेही पाठकों और सहयोगियों ने अपने सत्परामर्श भेज कर मुझे उत्साहित किया, उनके प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ ।

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री माननीय डा० सुशीला नैय्यर ने पुस्तक के स्वास्थ्य-

स्वास्थ्य-मंत्री

प्रकरण को बड़े मनोयोगपूर्वक पढ़ा और कृपापूर्वक अपनी प्रस्तावना लिख कर प्रदान की, अतएव, उनका मैं अत्यधिक आभारी हूँ । पुस्तक में आये कुछ प्रसंगों पर मेरे और उनके बीच मतैक्य नहीं; अतएव, प्रस्तावना में उन्होंने अपना मत स्पष्टता से व्यक्त कर दिया है । जहां दो मत हों वहाँ ग्राह्य-अग्राह्य का विवेचन कृपालु पाठकों पर छोड़ता हूँ ।

ग्रन्थ के नवीनीकरण में अपने मित्र डा० किशोरीलाल शर्मा से मुझे बहुत प्रेरणा मिली है, इसके लिए उनका तो आभारी हूँ ही, भाषा सम्पादन में श्री द्वारिकेश जी मिश्र ने बड़ा श्रम किया है । मिश्र जी श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्राइवेट लि० के कार्यकर्त्ता हैं, इसलिए नहीं, प्रत्युत वे आयु में मुझसे छोटे और हम दोनों ही भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं, इसलिए उनकी पीठ ठोकता हूँ ।

इस नवीन संशोधित संस्करण को इस आशा से भारतीय जनता को समर्पित कर रहा हूँ कि मेरे भाई-बहन विशेषकर युवक-युवतियाँ स्वास्थ्य और आरोग्य के विषय में उचित ज्ञान के अर्जन और आचरण करने के लिए प्रेरित होंगे ।

श्री धन्वन्तरी जयन्ती

विनयावनत २०३०, विक्रम

पं० रामनारायण वैद्य

चिकित्सा प्रकरण का नवीनीकरण

मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान का पुनरुद्धार हो रहा है । इस महत्त्वपूर्ण निर्माण में मेरे व्यक्तिगत प्रयत्न और धन से विशाल आयुर्वेद भवन का निर्माण हुआ है, जिसके बाह्यकक्ष में प्रतिदिन २०० से अधिक रोगी आते हैं । अन्तःकक्ष में अभी १० शय्यायें हैं और १५ का स्थान बन रहा है । दो आयुर्वेदाचार्य वैद्य, १ वैद्या, ४ कम्पाउण्डर, १ मल-मूत्र आदि परीक्षक ( पैथोलोजिस्ट ), १ सेविका (नर्स) आदि सुशिक्षित सेवाभावी स्टाफ है । मैं स्वयं तीन घण्टा बैठता हूँ । मथुरा का यह चिकित्सा कार्य ८ वर्ष से चल रहा है । गत ३ वर्ष से मेरा अधिक समय इसी चिकित्सा कार्य में लग रहा है । वृन्दावन में निवान स्थान बनाकर रह रहा हूँ । मैंने आयुर्वेद की शिक्षा समाप्त करके वैद्यनाथ धाम ( बिहार ) में चिकित्सा का कार्य प्रारम्भ किया था । श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के प्रारम्भ में चिकित्सा ही करता था । वैद्यनाथ का विक्री कार्य बढ़ने पर औषध निर्माण और व्यापार में रुचि लेनी आवश्यक थी । करीब ५० वर्ष के बाद फिर इसी चिकित्सा कार्य में आ गया हूँ । मथुरा जन्म स्थान के इस आयुर्वेद भवन में विशुद्ध आयुर्वेद भवन में विशुद्ध आयुर्वेदीय चिकित्सा होती है । सभी दवायें बैद्यनाथ की झांसी शाखा से बिना मूल्य आती हैं । चूर्ण, क्वाथ, अवलेह, घृत, तैल, वटी, रस-रसायन आदि चिकित्सोपयोगी दवाओं का अच्छा भण्डार होने पर भी आवश्यक दवायें काढ़ा, अर्क, चूर्ण आदि मथुरा के इस भवन में भी बनाई जाती हैं । इस चिकित्सा कार्य के अनुभव से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भविष्य में भारत की राष्ट्रीय चिकित्सा आयुर्वेद-यूनानी ही होगी । इस समय की डाक्टरी दवायें बहुत तीक्ष्ण प्रभावशाली बन रही हैं । एन्टीबायोटिक्स, सल्फाड्रग्स आदि जो दवायें रोगियों को दी जा रही हैं उनसे अति शीघ्र लाभ दीखने पर भी रोग निःशेष नहीं होता बल्कि बहुत से रोगी तो इन उग्रवीर्य दवाओं के खाने से उल्टे रोगपीड़ित हो जाते हैं । डाक्टरी

(१२)

चिकित्सक साधारण ज्वर में भी स्ट्रेप्टोमाइसीन दे रहे हैं उसके साथ और भी बहुत सी दवायें देते हैं जिससे रोग से अधिक हानि इन दवाओं से होती है । इन दवाओं का खर्च इतना अधिक है कि भारतवासी उसको कभी वहन नहीं कर सकता । राज्य अरबों रुपयों की चिकित्सा कार्य में सहायता देकर भी रोगों की बाढ़ को नहीं रोक सका । इसलिये वैद्य-हकीम बन्धुओं को डाक्टरी से पराजित मनोवृत्ति को छोड़कर सेवाभावना से चिकित्सावृत्ति करनी होगी । मोटर और बंगला की महत्त्वाकांक्षा से रहित होकर हमारे पूर्वज ऋषियों की तरह शरणागत रोगी की चिकित्सा को पुण्य और पवित्र कार्य समझकर चिकित्सा करने से बहुत अच्छी तरह से योगक्षेम होगा और निर्मल यश की प्राप्ति होगी ।

हजार वर्ष की दासता के कारण वैद्यबन्धु यथार्थता से हटकर कैन्सर, हृदय रोग, कायाकल्प आदि की बड़ी २ बातें करते हैं । जो रोगी इस भवन के दवाखाने में चिकित्सा कराने आते हैं उन रोगों की संख्या पर विशेष ध्यान देने से मालूम होता है कि अम्लपित्त, यकृत् - विकृति, कब्जियत, आमपेचिश, पतले दस्त, संग्रहणी, बवासीर, साधारण बुखार, इन्फ्लुएंजा, सर्दी, जुकाम, खांसी, श्वास, वातरोग, सिर दर्द, चर्मरोग, स्त्री रोग, बालरोग आदि की संख्या सर्वाधिक होती हैं । इनकी शीघ्र लाभदायक चिकित्सा करने से वैद्य की अति-शीघ्र ख्याति हो जाती है । वर्तमान में वैद्यबन्धु रोग निर्णय से पहले दवा

।

निश्चय करते हैं । शास्त्रोक्त विधि से रोग निर्णय करना बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य है । उसके लिये 'वर्तमान विकृति विज्ञान' की सहायता से भी रोग निर्णय करना चाहिये । मथुरा के इस आयुर्वेद भवन में मलमूत्र, रक्त कफ आदि की आधुनिक परीक्षा से जटिल रोग के निर्णय करने में बड़ी सहायता मिलती है । अमीबिका प्रवाहिका रोगी के मल परीक्षण में बहुत से रोगियों के मल में अंकुशकृमि ( Gerdia) भी बहुत मिलता है जो रोगी का खून चूसता है । यह परीक्षण विधि कोई डाक्टरी की निजी सम्पत्ति नहीं है, सभी चिकित्सा पद्धतियों में उपयोगी हैं। कहने का सारांश यह है कि वैद्य बन्धुओं को आयुर्वेदीय दवाओं का पूरा भण्डार रखना चाहिये और पूर्ण रूप से रोग निर्णय करके रसादि

१३ )

दवाओं के साथ क्वाथ आदि अपने यहां तैयार करके ही रसादि के अनुपान के रूप में देना चाहिये ।

इस आयुर्वेद भवन में चिकित्सा करते हुए जो अनुभव हुए उनके ठोप आधार को सामने रखकर आरोग्य प्रकाश के चिकित्सा प्रकरण का नवीनीकरण किया गया है । इस नये संस्करण में बहुत बार के अनुभूत और सरलता से प्राप्त होने वाली दवाओं का ही वर्णन किया गया है । भाषा बहुत संक्षेप से इसीलिए लिखी गई कि ग्रन्थ विस्तार बहुत बड़ा न हो जाय । स्वर्गीय आचार्य यादवजी त्रिविक्रमजी के सिद्धयोग संग्रह से बहुत लिया गया है। उनके योग वास्तव में बहुत उपयोगी हैं। वे मेरे क्रियात्मक ज्ञान के गुरु थे । ग्रन्थ-विस्तार के भय से ही बहुत से सिद्धयोग संग्रह के योगों के नाम तथा पेज नं० दे दिये गये हैं। श्री आचार्य रघुवीरप्रसादजी त्रिवेदी ने भी इसमें बहुत से संशोधन किये थे, पर वे सम्पूर्ण न ले करके अत्युपयोगी मात्र लिये गये हैं । वैद्यराज श्री मोहनलाल चतुर्वेदी ने इस नवीनीकरण में बहुत सहायता की है । यद्यपि वे वैद्यनाथ के वेतनभोगी उच्चकर्मचारी हैं फिर भी मैं उनका आभार प्रकट करता हूँ । अन्त में सभी वैद्य बन्धुओं से प्रार्थना है कि इसमें जो भी त्रुटि आप देखें वह कृपा

में

करके सूचित करें, वह भविष्य के संस्करण में सुधार दी जावेगी ।

भद्रमभ्यस्तकर्माणाम्-भद्रं भद्राभिलाषिणाम्

मंगलाकांक्षी रामनवमी

पं० रामनारायण शर्मा वैद्य संवत् २०३० सेवा में प्रस्तुत करते हुए, हमें विशेष प्रसन्नता इसलिए है कि जिस परिवर्द्धित, संशोधित और सुसम्पादित स्वरूप में हम इसका नवीन संस्करण प्रकाशित करना चाहते थे, वह काफी प्रतीक्षा के अनन्तर अब पूरा हो सका है ।

लगभग दो लाख १० हजार प्रतियां निकलने के बाद भी इस ग्रन्थ की

J ,

मांग बहुत अधिक रही । यह इस ग्रन्थ की लोकप्रियता का परिचायक तो है ही, हमें यह देखकर बड़ा सन्तोष है कि जनता में स्वास्थ्य विषयक साहित्य पढ़ने और मनन करने की सुरुचि बढ़ रही है । पाठ्य पुस्तकों को छोड़ कर कदाचित्

/

ही कोई स्वास्थ्य विषयक ऐसी पुस्तक होगी जो इतनी अधिक संख्या में बिकी हो जितना आरोग्य - प्रकाश। यह देखकर जहाँ हमें हर्ष होता है, वहां गौरव भी होता है कि स्वास्थ्य-साधन की भारतीय परम्पराओं और आयुर्वेदीय सिद्धान्तों के प्रसार का हमारा लक्ष्य सफल हो रहा है ।

इस संस्करण में आचार्य रघुवीरप्रसादजी त्रिवेदी ने अनेक नवीन बातों का समावेश किया है । आचार्य त्रिवेदी जी श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लि० के

।

शोध- परामर्शदाता (रिसर्च- सलाहकार ) हैं । आप आयुर्वेद जगत के जाने माने विद्वान हैं । अनेक ग्रन्थों के लेखक तथा अनेक आयुर्वेद पत्रों के सम्पादक हैं ।

इस संस्करण से यह ग्रन्थ, एक प्रकार से नया ही हो गया है । पूर्वापेक्षा पृष्ठ संख्या अधिक हो गयी और कई उपयोगी विषयों को बढ़ाया गया है । फिर भी मूल्य के विषय में, जैसी कि बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लि० की परम्परा है - इस सर्वजनोपयोगी ग्रन्थ का मूल्य लागतमात्र ही रखा गया है । पांच सौ साठ से ऊपर पृष्ठ संख्या की, स्वास्थ्य विषयक पुस्तक, इतने कम मूल्य में दूसरी कोई नहीं है ।

हमारा विश्वास है कि यह नवीन संस्करण पाठकों को अधिक रुचेगा और स्वास्थ्य - प्रचार की दिशा में हमारा प्रयास अग्रसर होगा ।

व्यवस्थापक

प्रकाशन विभाग,

श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लिमिटेड

मूल विषय-सूची (स्कैन)
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० रामनारायण शर्मा

आयुर्वेदोपाध्याय. स्थापक व प्रधान प्रबन्ध

निर्देशक :-

भवन लिमिटेड.

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