आरोग्य-प्रकाशमूत्रकृच्छ्र (पेशाब की वेदना)

मूत्रकृच्छ्र (पेशाब की वेदना)

2 मिनट का पाठ

मूत्रकृच्छ्र में बारम्बार पेशाब करने की इच्छा होती है और कष्ट के साथ बूँद-बूँद पेशाब होता है या बिल्कुल होता ही नहीं है। पेशाब करते समय भयानक वेदना होना इस रोग का प्रधान लक्षण है।

सूजाक, पथरी, कृमि, मूत्रग्रन्थि का प्रदाह, जरायु की विकृति, वृक्क (गुर्दे) का विकार, आँव आदि से मूत्रकृच्छ्र रोग उत्पन्न होता है।

सूजाक के मूत्रकृच्छ्र में सूजाक के अन्यान्य लक्षण, कृमिरोग में कृमि के लक्षण और जरायु के विकार में मासिक धर्म की गड़बड़ी वर्तमान रहती है। प्रायः मूल रोग की चिकित्सा से ही रोग आराम हो जाता है।

वृक्क (गुर्दे) के विकार से जब मूत्रकृच्छ्र होता है, तब कै और दस्त की हाजत होती है। गुर्दे से वेदना उठकर बस्ति तक या जननेन्द्रिय तक जाती है। इसमें जवाखार या अन्य मूत्रल दवा देने से लाभ होता है।

चिकित्सा

बस्ति के पास में जब आँव आकर संचित हो जाता है, तब पेशाब में भयानक वेदना होती है। एक रोगी को दो साल से पेशाब में जलन होती थी, परन्तु किस कारण से वेदना होती थी इसका कुछ पता न लगा। बहुत जिरह करने पर आँव का होना और अफीम लेने से आरोग्य होना रोगी ने स्वीकार किया। तब दस्त कराए गए और जलन बन्द हो गई। यह रोगी बहुत चिकित्सा कराकर हमारे पास आया था।

पथरी को शस्त्रक्रिया से निकलवा देना चाहिए। नये पथरी रोग में चन्द्रप्रभा वटी को गोखरू के काढ़े के साथ सेवन करने से पथरी गल जाती है। कुलथी का काढ़ा भी लाभदायक है।

सब तरह के मूत्रकृच्छ्र में गर्म पानी पीना अत्यन्त लाभदायक है। गर्म जल बस्तिशोधक है। पानी ज़रा गुनगुना पिया जाय, इससे पेशाब की वेदना में लाभ होता है। बहुत-से गर्म प्रकृति वाले रोगियों को गर्म पानी बर्दाश्त नहीं होता, इसलिए गर्म जल पीने से लाभ न हो तो छोड़ देना चाहिए। इस रोग में सूजाक, मूत्रस्तम्भ और मूत्रनाश रोग की दवाइयाँ लाभकारी हैं।