आरोग्य-प्रकाशमूत्रस्तम्भ और मूत्रनाश

मूत्रस्तम्भ और मूत्रनाश

3 मिनट का पाठ

बस्ति यानी पेशाब की थैली में पेशाब संचित हो, किन्तु कारण-विशेष से निकल न सकता हो, उसको 'मूत्रस्तम्भ' और बस्ति में मूत्र के अभाव को 'मूत्रनाश' कहते हैं। मूत्रस्तम्भ में नाभि के नीचे तल-पेट फूल जाता है और पेशाब करने की इच्छा होती है; परन्तु पेशाब नहीं होता है। बेचैनी, तन्द्रा, मोह, बेहोशी आदि लक्षण पैदा होने लगते हैं। सूजाक में मवाद के निःसरण का एकाएक बन्द हो जाना, पौरुष ग्रन्थि का बड़ा होना, जननेन्द्रिय-पथ का छोटा होना, पथरी आदि कारणों से भी मूत्रस्तम्भ होता है।

चिकित्सा

मूत्रस्तम्भ होने पर जननेन्द्रिय के पथ में रबर की सलाई चढ़ाने से पेशाब हो जायगा। गर्म पानी टब में भरकर उसमें रोगी को कमर तक बैठाएँ, पेशाब खुल जायगा। मूत्रनाश होने पर ईख का रस, फलों का रस, कच्चे नारियल का पानी, दूध की लस्सी आदि रोगी को यथेष्ट परिमाण में पिलाएँ, ताकि पेशाब तैयार होने लगे। साथ ही नीचे लिखी दवाओं का सेवन कराएँ, शीघ्र लाभ होगा। विबन्ध में दस्त कराने से पेशाब भी हो जाता है।

(१) कलमी शोरा को जल में मिलाकर कपड़ा भिगो लें और उसको पेशाब की थैली पर रखें, पेशाब हो जायगा।

(२) मिट्टी में कलमी शोरा मिलाकर लेप करने से पेशाब हो जाता है।

(३) भैंस के कान का मैल नाभि पर लगाने से पेशाब हो जाता है।

(४) कपूर को पेशाब के रास्ते में रखने से पेशाब हो जाता है।

(५) कम्बल के सेंक से रुका हुआ पेशाब हो जाता है।

(६) कलमी शोरा ५८.३२ ग्राम और फिटकिरी ११.६६ ग्राम को एक जगह करके मिट्टी के बर्तन में पका लें; जब पक जाय तब केले के पत्ते पर डाल दें। १ से २ ग्राम तक गर्म पानी के साथ खाने से पेशाब बनने लगेगा।

(७) जवाखार या मूलीखार पेशाब बनाने के लिए अक्सीर है।

(८) असगन्ध का काढ़ा पिलाने से बहुत पेशाब होता है।

(९) गोखरू के काढ़े में जवाखार ३ ग्राम डालकर पिलाएँ, बहुत पेशाब होगा।

(१०) कुश, काश, मूँज की जड़, ईख और दूर्वा -- इनका काढ़ा पीने से बहुत पेशाब होता है। इसका नाम 'पंचतृण' है।

(११) शुद्ध शिलाजीत २४३ से ३६४.५० मि.ग्रा. दूध के साथ सेवन करने से पेशाब खुलासा होने लगता है।

(१२) जवाखार और कलमी शोरा समभाग एक बर्तन में रखकर आग पर चढ़ाएँ। जब पानी जैसा हो जाय, तब उसमें ज़रा-सी फिटकरी मिला दें। चीनी की चाशनी में जिस तरह मैल आता है, उसी तरह उसमें मैल आता है। उसको हटाकर एक चौड़े बर्तन में डालकर फैलाकर जमा दें। इसे बहुत-से वैद्य 'वज्रक्षार' या 'श्वेत पर्पटी' कहते हैं। यह पेशाब बहुत पैदा करता है। अम्लपित्त, अजीर्ण, शोथ आदि में भी यह बहुत फायदा करता है। (सि० यो० सं० पृष्ठ ९४ देखें।)

(१३) गोक्षुरादि गुग्गुलु -- सि० यो० सं० पृष्ठ ९६ में देखें।

(१४) मूत्रहर कषाय -- सि० यो० सं० में देखें।

(१५) अश्मरीहर कषाय -- सि० यो० सं० पृष्ठ ९८ में देखें।