शारीरिक स्वच्छता
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शरीरांगों की सफाई को ही आधुनिक विज्ञान में व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) कहा जाता है। इस प्रसंग को भी हमें दो भागों में बाटना चाहिए। एक भीतरी सफाई, दूसरी बाहरी सफाई।
शरीर की भीतरी सफाई
मनुष्य शरीर के भीतरी अवयवों की स्वच्छता ही भीतरी सफाई है। यह मानव-शरीर एक ऐंजिन के समान है। कोयले और पानी से ऐंजिन को शक्ति प्राप्त होती है किन्तु उसमें सारहीन पदार्थ राख को निकालना पड़ता है। यदि उस सारहीन पदार्थ को ऐंजिन में ही पड़ा रहने दें तो ऐंजिन बहुत जल्द खराब हो जायगा। इसी प्रकार मनुष्य जो अन्न-पानी खाता-पीता है उसका सार तत्व खून बनकर शरीर के विभिन्न अवयवों में पहुँच जाता है और निःसार पदार्थ पेट में पड़ा रह जाता है।
शरीर के भीतर से निःसार मल पदार्थ को मल-मूत्र - पसीना आदि के रूप में बाहर निकलना आवश्यक होता है। यदि इन सारहीन पदार्थों को बाहर न निकाला जाय तो शरीर रूपी ऐंजिन खराब हो जायगा और कुछ ही दिनों के भीतर जीवन - गाड़ी का चलना रुक जायगा।
शरीर की स्वचालित मशीन अपना हर काम नियमित ढंग से स्वयं करती है। यदि उसकी गति में बाधा न पड़े तो वह अपनी सफाई अपने आप कर देती है। परन्तु आजकल हर मनुष्य को अपने कार्य उद्योग और व्यस्त समय की सुविधा के अधीन ही शरीर को चलाना पड़ता है, यही कारण है कि भीतरी सफाई से सम्बन्धित शारीरिक क्रियाओं के विषय में भिन्न-भिन्न मनुष्यों के विभिन्न समय और प्रकार चल पड़े हैं। अतएव इनकी जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
शरीर की मशीन अपने भीतरी अंग-प्रत्यंगों की सफाई का काम अपने आप करती ही है, इसलिए हमें क्या करना? ऐसा सोचना उचित नहीं। हमारी अनियमितताओं के कारण, या रोगी होने पर शरीर की मशीन अपना नियमित काम विधिवत् नहीं कर पाती जब कि हम शरीर को उसकी निश्चित अवस्था और नियमित गति से नहीं चलने देते, और अपनी सुविधा से ही चलाते हैं, तो हमारा यह भी कर्तव्य हो जाता है कि उसकी भीतरी - बाहरी सफाई के लिए हम उचित उपक्रम करके उसकी सहायता करें।
हमारी चेष्टा से जिन भीतरी शरीरांगों की सफाई हो सकती हैं, उसमें आंतें (मलाशय) गुर्दे, और फेफड़े मुख्य हैं। इन अंगों की सफाई का ध्यान न रखने से शरीर को भयंकर हानि और रोग का होना निश्चित है।
मल-त्याग
हम जो कुछ खाते-पीते हैं, वह पहले आमाशय में पहुँचता है, फिर छोटी आँत में और उसके बाद बड़ी आँत (पक्वाशय) में। यहाँ तक पहुँचने से पहले ही भोजन का सारभाग प्रचूषित हो चुकता है। बड़ी आँत में केवल सारहीन पदार्थ पहुँचता है। उसमें मल और विषैले तत्त्व होते हैं, जिनके नित्य-नियमित शरीर के बाहर निकलने से आँतों की सफाई होती है।
शौच क्रिया (पाखाना जाना) आँतों की सफाई के लिए सबसे सहज और प्राकृतिक तरीका है। इसलिए बचपन से ही नियमित रूप से नियमित समय पर पाखाना जाने की आदत डालनी चाहिए।
दिन-रात में कम से कम दो बार पाखाना अवश्य जाना चाहिए। यदि तीन बार भी जावें तो कोई हानि नहीं। मल का रोकना और दो-दो दिन तक पाखाना न जाने की आदत बहुत ही हानिकारक है। मल यदि चौबीस घण्टे से अधिक आंतों में रह जावे तो उसके सड़ने से जो विषैले द्रव्य और गैस आदि उत्पन्न होते हैं, वह रक्त में मिलकर अनेक भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।
शौच का समय नियमित होना चाहिए। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी शाम और कभी रात को शौच जाना - ऐसी प्रवृत्ति हानिकारक है। किसी कारण नियत समय पर पाखाना न उतरता हो, तो भी शौच जाना चाहिए कुछ दिन नियमित समय पाखाना जाते रहने से उसी समय शौच होने लगता है। ऐसा कुछ दिन करने से अभ्यास हो जायगा और नियत समय पाखाना उतरने लगेगा। छोटे बच्चों को आरम्भ से ही ऐसी आदत डालनी चाहिए।
यदि एक ही बार शौच जाना हो तो उसके लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। विद्यार्थियों को विशेष कर सुबह सोकर उठते ही सबसे पहले शौच जाना चाहिए। दो बार जाना पड़े तो सुबह-शाम जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब भी शौच जाने की इच्छा हो तो उसे दबाना नहीं चाहिए। नियत समय पर या इच्छा होने पर शौच न जाने से कोष्ठबद्धता, कब्जियत, मंदाग्नि और गैस बनना आदि रोग हो जाया करते हैं। कब्ज होने से जीभ पर मैला फफूड़न छा जाता है, भूख मर जाती है, सिर में दर्द होने लगता है, स्वभाव रूखा-चिड़चिड़ा और खिन्न हो जाता है। तब मन का उत्साह मर जाता है।
पाखाना फिरने के लिये पुराने लोग खुले मैदान को पसन्द करते थे। अब गाँवों तक में जगह नहीं रही इसलिये नये ढंग से पाखाना बनाना आवश्यक हो गया है। नये ढंग में फ्लश का संडास सर्वश्रेष्ठ होता है। जहाँ फ्लश के पानी बहने के लिये जमीन के नीचे गटर न हो वहाँ दो होज बनाने से दुर्गन्ध रहित शौचालय बन जाता है। पुराने कस्बे या शहरों के शौचालय तो नरक का दृश्य उपस्थित करते हैं।
ये रोगाणुओं के भन्डार होते हैं। भयानक दुर्गन्ध सारे घर का वातावरण दूषित कर देती है। यूरोप अमेरिका में तो सोने के स्थान से भी स्वच्छ शौचालय बनाते हैं। इसलिये वे लोग स्वस्थ भी हैं। अब भारतवासी भी स्वास्थ्य पर विचार करके स्वच्छ शौचालय बनाने लगे है। पुराने और दुर्गन्धयुक्त शौचालय में फिनाइल ब्लीचिंग पाउडर, चूना या राख नियमित रूप से छिड़क कर सफाई की जाय तो वे भी अच्छे रह सकते हैं।
देहातों में स्त्रियों को पाखाना फिरने का बहुत कष्ट है अब सभी जगह ग्राम पंचायते हो गयी हैं उनको प्रत्येक गांव में इनके लिये उचित प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये स्वच्छ पेय जल तथा स्वच्छ शौचालय स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक हैं।
संडास हों या मैदान, शौच का स्थान ऐसा होना चाहिये जिससे मन सुस्थिर और सहज प्रसन्न रह सके। मन की सुस्थिर और एकाग्र अवस्था में ही शौचक्रिया ठीक प्रकार से होती है। आजकल के नये पढ़े-लिखे लोगों को शौच में बैठकर कुछ पढ़ने या सोचने की आदत पड़ गई है। यह आदत अत्यन्त बुरी है। शौच के समय सारा ध्यान केवल मल त्यागने की और ही केन्द्रित रहना चाहिए, तभी पाखाना साफ होता है।
शौच क्रिया के लिए पाश्चात्य सभ्यता का कमोड वाला ढंग हमारे लिए अच्छा नहीं है। खुड्डी पर उकडुं बैठकर ही पाखाना करना चाहिए। इससे जांघों का जोर पेट और मलाशय पर पड़ता है, उस दबाव से मल शीघ्र और आसानी से उतर जाता है।
मल त्यागते समय बहुत जोर नहीं लगाना चाहिए। बार-बार काँखने से आँतों पर अनुचित भार पड़ता है, गुदा को भी हानि होती है और बवासीर आदि रोग उत्पन्न होते हैं। मल त्यागते समय पेट को भीतरी ओर संकुचित करने से आसानी से मल बाहर निकल जाता है।
जिन्हें प्रातःकाल उठते ही दस्त साफ न होता हो, उन्हें बिस्तर से उठते ही तत्काल खूब कुल्ला करके प्रकृति के अनुकूल ठंडा या गर्म पानी, एक गिलास पीना चाहिए। थोड़ा टहलना चाहिए। पानी से आँत साफ होंगी, मल पर दबाव पड़ेगा और मल की खुश्की (कठोरता) दूर होगी। टहलने से शौच का वेग उत्पन्न होकर दस्त साफ हो जायगा।
खुश्की और कोष्ठबद्धता से पीड़ित लोगों को भोजन में चिकनाई के पदार्थ अत्यावश्यक होने पर लेने चाहिए और बीच-बीच में एनिमा लेकर आँतों को साफ करते रहना चाहिए। भोजन में चोकर सहित आटे की रोटी और हरे शाकों की उबली हुई सब्जी लेने से दस्त साफ होता है। पपीता, अमरुद, नीबू आदि फलों का सेवन भी कब्जियत दूर कर दस्त साफ लाता है। साल्ट लेने से स्वाभाविक हाजमा खराब हो जाता है। अधिक कब्ज रहता हो तो ईसबगोल या त्रिफला को प्रकृति के अनुसार जो अनुकूल हो उनका सेवन करना चाहिये। रात को सोते समय एक चम्मच शुद्ध कैस्टर ऑयल (एरण्ड तैल) लेने से पुरानी कोष्ठबद्धता दूर होती है।
मूत्र त्याग
शरीर के भीतरी अंगों की सफाई का दूसरा साधन मूत्र त्याग है। पिया हुआ पानी, शरीर के भीतरी अंगों को धोकर तथा उनके मैल और विषों को वटोर कर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देता है। मूत्र का सम्बन्ध गुर्दों से होता है। मूत्र जब गुर्दों में पहुँचकर छनता है तब वे उसका सारहीन पदार्थ और मैल अलग निकालते हैं। मैल और शरीर के जलीय अंश का योग ही मूत्र होता है। खाये-पिये पदार्थों का आवश्यक तरल अंश गुर्दों द्वारा छनकर बस्ति में एकत्र होता है और समय-समय पर मूत्र मार्ग द्वारा बाहर निकलता है। उचित मात्रा में पेशाब होते रहने से शरीर का जहर और रक्त के विजातीय तत्व बाहर निकलते हैं।
चौबीस घण्टों में लगभग डेढ़ सेर पेशाव उतरना चाहिए। इससे अधिक और बार-बार थोड़ी-थोड़ी देर में भी पेशाब उतरना हानिकर एवं रोग का लक्षण है। इसी प्रकार बहुत कम पेशाब होना भी उचित नहीं।
स्वस्थ अवस्था में पेशाब का रंग हल्के पीले रंग का होता है। यह जब हल्दी जैसा पीला, लाल या मटमैला हो तो विकार समझना चाहिए। पेशाब कम होता हो और उसका रंग अस्वाभाविक हो तो अधिक मात्रा में पानी पीने से पेशाब साफ और उचित परिणाम में होने लगता है। प्रतिदिन लगभग ढाई किलो पानी पीने से उचित पेशाब उतरकर गुर्दों और बस्ति की नियमित सफाई होती रहती है।
पसीना
भीतर सफाई का तीसरा प्राकृतिक साधन पसीना है। रक्त सारे शरीर में घूमकर जो मैल एवं विषैले पदार्थ इकट्ठा करता है, उसको बाहर निकलने का दोहरा प्रबंध है। एक तो गुर्दों में छनकर रक्त का मैल पेशाब द्वारा बाहर निकलता है दूसरा पसीना द्वारा। सम्पूर्ण शरीर में बहुत छोटे-छोटे छिद्र बने हैं जिनमें रोयें कहे जाने वाले महीन बाल उगे हैं। इन छोटे छिद्रों से सदा ही रक्त का विजातीय तत्त्व और शरीर का मैल पसीना के रूप में बाहर निकलता रहता है।
पसीना निकलने से शरीर के भीतर की अनुचित गर्मी बाहर निकल जाती है। इसी कारण ज्वर में पसीना आ जाने पर ज्वर उतर जाता है या हल्का हो जाता है।
ग्रीष्म ऋतु में तो खूब पसीना निकलता है, जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हैं। पसीना जाड़ों में भी निकलता है, परन्तु इतना कम कि उसे देख या अनुभव नहीं कर पाते। बहुत अधिक मात्रा में पसीना निकलना शरीर को कुछ अशक्त करता है।
पसीना द्वारा रक्त और शरीर की भीतरी सफाई निर्बाध होती रहे इसके लिए रोम छिद्रों को सदा साफ रखना चाहिए जिससे त्वचा पर मैल की कोई तह न रहे, रोम छिद्र खुले रहें और पसीना निकलने में रुकावट न हो।
स्वाभाविक रूप से उचित मात्रा में पसीना न निकलता हो तो व्यायाम या अन्य खेल-कूद अथवा शारीरिक परिश्रम करके पसीना निकलने का उपक्रम करना चाहिए। शारीरिक श्रम में रक्त में गर्मी आती है और वह गर्मी मल-सहित पसीना द्वारा शरीर के बाहर निकलती है।
श्वास-प्रश्वास
भीतरी सफाई का चौथा साधन श्वास-प्रश्वास है। इससे बहुत अन्तः शुद्धि होती है। फेफड़ों की सफाई का साधन श्वास-प्रश्वास ही तो है। शरीर से बाहर निकलने वाली प्रश्वास की हवा के साथ प्रांगार द्विजाय (कार्बन डाइऑक्साइड) और फेफड़ों में एकमात्र रक्त का विषाक्त मैल अहर्निश बाहर निकलता है।
जल्दी-जल्दी और गहरी सांस लेने से फेफड़ों और रक्त की अच्छी सफाई होती है। खुली हवा में दीर्घ श्वास लेने के अतिरिक्त प्राणायाम द्वारा सांस का व्यायाम भी इसके लिए उपयोगी है।